जहां आत्मचिंता, वहीं जैन शासन: महेन्द्रसागर

जहां आत्मचिंता, वहीं जैन शासन: महेन्द्रसागर

SHARE

कराड। राजस्थानी जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ व सुमतिनाथ महाराज ट्रस्ट संघ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित समारोह में आचार्यश्री महेन्द्रसागर सूरीश्वरजी ने अपने प्रवचन में कहा कि अनंतकाल से संसार और शासन चल रहा है। उन्होंने कहा कि जहां स्वार्थ है वहां मुख्य संसार है, जहां परमार्थ है वहां मुख्य प्रभु का शासन है, जहां पुद्गल की चिंता है वहीं संसार है और जहां आत्मचिंता है वहीं जैन शासन है। आचार्यश्री ने कहा कि इस जीवन के भूतकाल में जो अनंत भव हुए आध्यात्मिक दृष्टि से नींद में गए, मनुष्य भव में जागना है। उन्होंने कहा कि अधिकांश लोग फिर से प्रमाद के बिस्तर में सो जाते हैं। आचार्य महेन्द्रसागरजी ने कहा कि जिसे हम मेरा-मेरा कहते हैं, हकीकत में वह अपना है ही नहीं और इसकी शुरुआत खुद के शरीर से होती है। उन्होंने कहा कि शरीर, कपड़े, कपाट, कमरा, मकान, गली, शहर इत्यादि मोह ममत्व है। उन्होंने यह भी कहा कि जीवन में कर्म ऐसा करना चाहिए कि जिससे भव कम हो, दुख कम हो और पाप भी कम हो। यही जीवनशैली ज्ञानियों की नजर में वास्तविक है।