श्री ओसियांजी तीर्थ / Shree Osiyaji Tirth: By her divine power,...

    श्री ओसियांजी तीर्थ / Shree Osiyaji Tirth: By her divine power, an idol of Bhagwan Mahavir was made of cow – milk and sand. This idol was installed by the Acharya as a Mulnayak.

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    श्री ओसियांजी तीर्थ / Shree Osiyaji Tirth

    मूलनायक : श्री महावीर स्वामी सुवर्ण वर्ण।
    मार्गदर्शन : ओसियां रेलवे स्टेशन जोधपुर- जैसलमेर मार्ग पर स्थित है। जोधपुर यहां से ६६ किलोमीटर दूरी पर है। जोधपुर से गंगाणी तीर्थ के दर्शन करते हुए भी ओसियां पहुंच जा सकता है। ओसिया पूर्व मारवाड़ राज्य एवं वर्तमान में जोधपुर जिले में स्थित ऐसा ग्रामीण आध्यात्मिक क्षेत्र है, जहां के प्राच्य इतिहास में क्षेत्र के सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन में अत्यधिक घनिष्ठ संबंध स्थानीय पुरातन धरोहरों में सहज ही देखा जा सकता है। जोधपुर स्टेट (मारवाड़) की महान एवं गौरवशाली संस्कृतियों में ओसिया की संस्कृति का अत्यधिक महत्व है तथा मारवाड़ के मानवीय मूल्य एवं आस्थाएं यहां की सांस्कृतिक परंपराओं से ओत-प्रोत रही हैं। प्राचीनकाल में उत्केशपुर या उकेश के नाम से लोकप्रिय ओसिया के १६ वैष्णव शैव एवं जैन मंदिर ८ वीं से १२ वीं शताब्दी में निर्मित हैं तथा प्रतिहार कालीन स्थापत्य संस्कृति का तो ओसिया सर्वोत्कृष्ट धरोहर स्थल है। कालांतर में यह जैन धर्म का केंद्र बना तथा यहां के महिषमर्दिनी मंदिर के पश्चात सचिया माता का मंदिर निर्मित हुआ, जिसकी वजह से यह हिन्दू एवं जैन दोनों धर्मावलंबियों का पावन तीर्थ बना। उल्लेखनीय है कि विद्वान भंडारकर ने ओसिया के प्राचीनतम ३ वैष्णव मंदिरों को हरिहर नाम दिया, जो कि एक ऊंचे जगत (चबूतरे) पर स्थित है। पुरातन विश्लेषणों के अनुसार वास्तव में ये तीनों मंदिर हरिहर के न होकर, विष्णु भगवान के थे तथा वर्तमान में किसी भी मंदिर के गर्भगृह में मूलनायक की कोई प्रतिमा मौजूद नह है, जबकि प्रत्येक गर्भगृह के बाहर की ओर वैष्णव प्रतिमाएं ही अंकित हैं तथा कृष्ण लीला एवं विष्णु वाहन गरूड़ प्रतिमाएं इसके प्रमाण हैं। किनारे के मंदिरों में शिव, शक्ति एवं सूर्य की प्रतिमाएं भी विष्णु मंदिर के प्रमाण की पुष्टि करती हैं। प्रथम हरिहर मंदिर के तले में भगवान बुद्ध की प्रतिमा भी स्थित हैं, जो इस बात का संकेत करती हैं कि ८ वीं शताब्दी में बुद्ध को भी हिन्दू अवतार माना जाने लगा और उनकी हिन्दू मंदिरों में पूजा होने लगी। परिसर में ही वैष्णव मंदिरों के पास एक पंचायतन स्वरूप में सूर्य मंदिर भी स्थित है जिसके गर्भगृह में कोई प्रतिमा प्रतिष्ठित नहीं है। मंदिर के ललाट बिम्ब पर लक्ष्मीनारायण की प्रतिमा स्थित है, जिसके दोनों ओर गणेश, ब्रह्मा, कुबेर एवं शिव का सुंदर अंकन है। गर्भगृह के बाहर की ओर महिषमर्दिनी, सूर्य एवं गणेश प्रतिमाओं का मनलुभावन अंकन है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि उस काल में सौर मत का वैष्णव मत में विलय होने लगा था।

    ओसिया में शक्ति मंदिर पीपला माता एवं सत्तिया माता मंदिरों के नाम से जाने जाते हैं। सूर्य मंदिर के पास ही पीपला माता का मंदिर स्थित है, जिसके गर्भगृह में महिषमर्दिनी की प्रतिमा स्थापित है, जिसके दोनों ओर कुबेर एवं गणेश की प्रतिमाएं स्थित हैं। बाहर की ओर भी महिषमर्दिनी की प्रतिमा के अलावा गजलक्ष्मी एवं क्षमकरी की प्रतिमाएं स्थित हैं। इस मंदिर के सभामंडप में ३० अलंकृत स्तंभ हैं। पास ही की पहाड़ी पर १२ वीं शताब्दी में निर्मित सत्तिया माता अर्थात महिषमर्दिनी का देवालय है, जिसके मंडप में ८ तोरण अत्यंत आकर्षण एवं भव्यता की कलात्मकता लिए हैं। मंदिर पर लेटिन शिखर स्थित है तथा चारों ओर छोटे-छोटे वैष्णव मंदिर निर्मित हैं। यहीं महिषमर्दिनी बाद में सच्चिया माता के नाम से जन-जन में लोकप्रिय हुई, जिसकी वजह से ओसिया हिन्दू एवं जैन दोनों धर्मावलंबियों का तीर्थस्थल बन गया। पश्चिम मुखी इस मंदिर का विशाल सभामंडप ८ बड़े खम्भों पर टिका है, जिनकी कलात्मकता देखते ही बनती है। मंदिर के वि. सं. १२३४ के शिलालेख से ज्ञात होता है कि इस स्थल की जंघा पर चंडिका, शीतला, सच्चिया, क्षेमकरी एवं क्षेत्रपाल अंकित हैं। भौतिक एवं लौकिक जीवन के उज्ज्वल पक्ष एवं शाश्वत और अविरल स्वरूप लिए सच्चिया माता मंदिर के चारों ओर छोटे-छोटे मंदिर भी स्थित हैं। यहां के वैष्णव मंदिर ८ वीं शताब्दी के हैं, लेकिन सच्चिया माता मंदिर के १० वीं शताब्दी में निर्मित होने के प्रमाण मिले हैं, जिसका १२ वीं शताब्दी में जीर्णोद्धार किया गया। हालांकि मंदिर की संस्कृति के मूल तत्व में तो कोई भिन्नता नहीं है, लेकिन बाह्य स्वरूप में कुछ अंतर अवश्य देखा जा सकता है। जैन धर्म के प्रचार एवं प्रभाव के पश्चात वैष्णव एवं शााक्त मंदिरों में उपेक्षा की स्थिति अवश्य उत्पन्न हुई और यह स्थिति कालांतर में बदतर होती ही गईं। यह बात सार्वभौमिक सत्य है कि मानव का समाज को योगदान उस संस्कृति के प्रभाव पर निर्भर करता है एवं संस्कृति द्वारा ही निर्धारित होता है। ऐसा ही यहां जैन दर्शन के प्रभाव के क्रम में दृष्टिगोचर होता है, कारण कि संस्कृति के इतिहास से ही मानव एवं क्षेत्र की प्रगति का इतिहास मिलता है। ओसिया के मंदिर में सुंदर घट पल्लव, कीर्तिमुख, लहर वल्लरी तथा कलात्मक तोरण द्वारों की खूबसूरती लाजवाब एवं अद्वितीय है। हरिहर मंदिर संख्या एक के केंद्रीय मूल प्रासाद में मकर वाहिनी गंगा की प्रतिमा का अंकन अतीव भव्य एवं उत्कृष्ठ स्वरूप लिए है। इसमें गंगा को अपने वाहन मकर पर तृभागीय मुद्रा में हाथों में पूर्ण घट थामे प्रकट किया गया है तथा गंगा का परिधान तथा नाक, कान, गले एवं बाहों के आभूषणों का गतिमान अंकित कर कलात्मकता की ऊंचाइयों को प्रकट किया गया है। ऐसी सांस्कृतिक धरोहर ही मानव एवं समाज के मध्य एक प्रभावशाली एवं सफल समन्वय स्थापित करती हैं।

    ओसिया के सच्चिया माता मंदिर के तीसरे लघु मंदिर की उत्तरी दीवार में शिव तथा पार्वती की संयुक्त प्रतिमा पूर्णतया शास्त्रानुसार स्थित है। पार्वती के आधे मस्तिष्क जटामुकुट स्थित हैं। शिव के हाथ में त्रिशूल है एवं पार्वती के हाथ में दर्पण हैं। इस संयुक्त प्रतिमा के आधे वक्षस्थल पर स्तन एवं हार हैं। इस प्रतिमा के दर्शन से श्रद्धालुओं को आत्मिक एवं आध्यात्मिक सत्य का आभास सहज ही हो जाता है। संयुक्त प्रतिमाओं के क्रम में ही ओसिया के ही हरि मंदिर में विष्णु एवं शिव की संयुक्त प्रतिमा को भी देखा जा सकता है, जिनमें दक्षिण में शिव एवं वामार्थ में विष्णु भगवान अनुटंकित हैं। वरदा मुद्रा धारण किए शिव के हाथों त्रिशूल है, वहीं विष्णु के हाथों में सुदर्शन चक्र एवं कमल हैं। दोनों देवों के वाहन नंदी और गरूड़ भी साथ में दिखाई दे रहे हैं। सच्चिया माता मंदिर में ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं सूर्य की एक संयुक्त प्रतिमा भी स्थित हैं, जिसके ८ हाथ हैं। प्रतिमा के दाहिनी ओर शिव का रूप हाथ में त्रिशूल एवं खडवांग लिए हैं, जबकि बायीं ओर का मुंह विष्णु भगवान का है, जिनके दोनों हाथों में शंख एवं चक्र हैं, जबकि ब्रह्मा के दोनों हाथों में कमल पुष्प हैं। इस प्रकार की संयुक्त प्रतिमाएं हिन्दू धर्म के विभिन्न मतों की धार्मिक एकता एवं सहिष्णुता की प्रतीक हैं। ओसिया के प्राचीन एवं कलात्मक मंदिरों की धरोहरों एवं उनकी प्रेरणा के मद्देनजर अंत में यही कहा जा सकता है कि यहां सनातन हिन्दू जैन एवं बौद्ध धर्मों के परस्पर सामंजस्य युक्त सांस्कृतिक स्वरूप में सांप्रदायिक सौहार्द एवं सद्भाव का अनुपम संगम देखने को मिलता है। इससे इस अनुपम तीर्थस्थल पर जन आकांक्षाओं और विचारधाराओं का प्रादुर्भाव नित तीर्थयात्रियों में होकर तीर्थ को उफत करता रहता है।