नरेंद्रकुमार बलदोटा हर उतार चढाव में मजबूत रहने वाला सफल मसीहा

नरेंद्रकुमार बलदोटा हर उतार चढाव में मजबूत रहने वाला सफल मसीहा

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NarendraKumar Baldota
NarendraKumar Baldota

ईश्वर द्वारा प्रदत्त हमारी प्रकृति मौसम हर परिवर्तन का सामना करते हुए सदैव जन कल्याण में लगी रहती है। उसी प्रकार जैन समाज शिरोमणी नरेंद्रकुमार बलदोटा भी जीवन की सारी मुश्किलों को दूर करते हुए समाजहित के में सदैव तत्पर रहते हैं। वे जानते हैं कि समाज ही सब कुछ है और समाज से ही हर किसी की पहचान है। अपने सिद्धांतों के प्रति समर्पित, पूरी दक्षता और निष्ठा के साथ जीवन के पथ पर अग्रसर व्यक्ति का नाम है नरेंद्र कुमार बलदोटा। जीवन के हर पड़ाव पर विकास की राह में ढेरों रूकावटें आई, लेकिन समय की शिला पर सभी रूकावटों से संघर्ष करतें हुए वे निरंतर अपनी मंजिल की तरफ बढते रहे। दरअसल नरेंद्रकुमार बलदोटा का मानना है कि सही ही हमेशा सही होता है, फिर चाहे कोई उसे माने या ना माने। और गलत सदैव गलत ही होता है फिर चाहे उसे कितना भी नजरअंदाज किया जाए। लेकिन स्थायी सफलता हमें सत्य के मार्ग पर चलकर ही हासिल होती है, इसलिए वे मानते हैं कि जीवन में अगर सफलता प्राप्त करना है तो आवश्यक है कि हम अपने बनाए सिद्धांतों पर अडिग होकर अपने पथ पर पूरी मेहनत और अटलता के साथ आगे बढते रहें। क्योंकि अपने और अपनों के सपनो को पूरा करने का यही मात्र एक तरीका है। वो स्वयं भी इसी सिद्धांत पर चलते हैं।

कर्नाटक के होसपेट शहर में 27 दिसंबर 1940 को नरेंद्रकुमार बलदोटा का जन्म हुआ था। पिता अभेराजजी बलदोटा की गिनती जैन समाज के प्रतिष्ठित लोगों में होती थी। माताजी वसूली देवी एक घरेलू महिला होने के साथ साथ संस्कारों की धनी थी। छोटे से बालक नरेंद्र ने अपने माता पिता दोनों को ही सदा समाज से जुडे रहने और जरूरतमंदों की मदद हेतु सदैव तत्पर देखा और उसी रास्ते पर वो खुद भी चलने लगे। दूसरों के प्रति प्रेम और भाईचारे की भावना रखने वाले नरेंद्र बलदोटा ने जहां अपने पूरे परिवार को एकजुट करके रखा है वहीं पर समाज के हर वर्ग को वो एक साथ आगे लाने का सपना देखते हैं। दरअसल वो जानते हैं कि समाज का विकास भी तभी संभव है जब समाज को हर वर्ग प्रसन्न और संतुष्ट होने के साथ विकास के पथ पर चलेगा। सन 1963 में 26 अप्रेल को चित्रादेवी से उनका विवाह हुआ। विवाह के बाद अर्धांगिनी होने के सारे कर्तव्य पूरे करते हुए चित्राजी ने अपने पति नरेंद्र बलदोटा के हर कर्तव्य को अपना कर्तव्य समझकर पूरा किया और उनके साथ कंधे से कंधे मिलाकर चलती रहीं। आज दोनो का भरापूरा संसार है जिसमें उनके दो बेटे राहुल और श्रेणिक के साथ दो बेटियां लवीना और रश्मि हैं जिनके वामा, वेद, कर्मादित्य और ज्योर्तिमय नामक बच्चे हैं। पूरा बलदोटा परिवार अपने मुखिया नरेंद्र बलदोटा के दिखाए रास्ते पर चलते हुए अपनी हर जिम्मेदारी को बडी ही तन्मयता के साथ निभा रहा है। दोनो बेटे राहुल और श्रेणिक अपने पिता के साथ उनके व्यापार और सामाजिक कार्यों में पूरा सहयोग करते देखे जा सकते हैं। कुल मिलाकर नरेंद्र कुमार बलदोटा का परिवार एक आर्दश परिवार है, जिसकी समाज के सभी लोग मिसाल देते हैं।

सन 1963 में कर्नाटक के होसपेट से बी कॉम करने के बाद नरेंद्रकुमार बलदोटा मुंबई आ गए और स्वयं की सारी उर्जा व्यापार को विकसित करने में लगा दी। सन 1983 में इंडस्ट्रीयल गैसेज के वेंचर की शुरूआत की तथा 1997 में आयरन एक्सपोर्ट शुरू किया तो विंड एनर्जी की शुरूआत भी साल 2001 में कर दी। व्यापार को आगे बढाते हुए साल 2008 में शिपिंग बिजनेस भी शुरू कर दिया। इनकी गिनती देश के बडे और सर्वाधिक आयरन निर्माताओं में होती है। इनके व्यापार का विस्तार आयरन माइनिंग से लेकर इंडस्ट्रीयल गैसेज, शिपिंग और वाइंड एनर्जी के अलावा गोल्ड और भूखनिज संपदा में भी है। ग्रेटर बॉम्बे कॉपरेटिव बैंक के चेयरमैन बलदोटा पैसे से अधिक रिश्तों और परिवार का अहमियत देते हैं और अपने उद्योग समूह में कर्मचारियों का पूरा ख्याल रखते है और उनकी हर छोटी बडी आवश्यकताओं को सही समय पर पूरा करने का प्रयास करते है। क्योंकि नरेंद्र बलदोटा का मानना है कि कर्मचारियों से ही व्यापार का विकास संभव है और पूरा व्यापार व उससे जुडे सभी लोग एक विशाल परिवार हैं और परिवार के हर सदस्य का ध्यान रखना परिवार के मुखिया का दायित्व है।

पिता अभेराज बलदोटा एक प्रसिद्ध और सफल कॉपरेटिव बैंक के संस्थापक थे और जिनका जैन समाज में बहुत बडा नाम रहा। नरेंद्र बलदोटा उनसे भावनात्मक रूप से जुडे हुए हैं। उनका कहना है कि उन्हें जीवन की उर्जा अपने पिता से प्राप्त होती है। अपने पिता को अपने जीवन का सबसे बड़ा आदर्श मानने वाले नरेंद्र बलदोटा का कहना है कि वही उनके सच्चे मित्र और पथ प्रदर्शक थे। सर्व जन सुखिनो भवन्तु के सिद्धांत पर अभेराजजी ने अपने जीवन को समर्पित कर दिया और पिता की ही तरह पुत्र बलदोटा भी उसी मार्ग पर चल रहे हैं। कई पीढियों से व्यापार से जुडे नरेंद्रकुमार बलदोटा जन्म और कर्म दोनो से ही जैन हैं। उनके हर कार्य में जैनत्व की धारा का स्पष्ट देखा जा सकता है। इसीलिए उनके बारे में कहा जाता है कि वे जैन धर्म और भगवान महावीर के द्वारा दिखाए गए रास्ते पर बडे ही गर्व के साथ चलनेवाले इंसान हैं। सभी के साथ पूरी ईमानदारी और नैतिकतापूर्ण और उचित व्यवहार रखते हैं। स्वास्थ्य और आध्यात्म के लिए दिन भर में एक घंटा अवश्य देते हैं। क्योंकि वो जानते हैं कि आध्यात्म से ही मानसिक स्वास्थ्य अनुकूल बना रहता है। वे परिवार के साथ जो भी वक्त बिताते हैं वो सभी के लिए सुखद और बेहतर होता है क्योंकि उसमें बलदोटा परिवार की खुशियां और आपसी प्यार शामिल होता है। हर परिस्थिति में स्वयं को प्रसन्न रखते हैं और दूसरों को भी यही सलाह देते हैं। नरेंद्र बलदोटा का मानना है कि किसी भी व्यक्ति को अपनी सोच हमेशा बहुत विकसित, व्यापक और बेहतर रखनी चाहिए, साथ ही विपरीत परिस्थितियों का सामना करने के लिए भी हमेशा तैयार रहना चाहिए। एमएसपीएल के चेयरमैन नरेंद्र कुमार बलदोटा को व्यापार और समाज के विकास में योगदान के लिए अनेको सम्मान मिले है। उन्हें टीआईकॉन द्वारा साल 2015 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया गया। साथ ही साल 2012 में तात्कालिक राष्ट्रपति के हाथों नेशनल माइंस सेफ्टी का अवार्ड तो साल 2008 में लाइफटाइम अचीवमेंट से सम्मानित किया गया। इसके पहले बिजनेस वल्र्ड फिक्की-एसईडीएफ कार्पोरेट सोशल रिस्पोंसिबिलिटी सम्मान 2008 में मिला। इसके अलावा जमनालाल बजाज फेयर बिजनेस अवॉर्ड भी साल 2006 में मिला। नरेन्द्रकुमार बलदोटा जैन समाज की अन्र्तराष्ट्रीय संस्था जैन इंटरनेशनल ट्रेड ओर्गेनाईजेशन जीतो के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं वे इसके प्रेसिडेंट भी रह चुके है, इसके साथ ही वे श्रवण आरोग्यम एवं जेएटीएफ के ट्रस्टी भी है, इसके साथ ही वे कई सामाजिक शैक्षणिक संस्थाओं से जुडे हुए है।

नरेंद्र बलदोटा मानते हैं कि जीवन एक बहुत ही खूबसूरत सफर है जहां पर उतार चढाव दोनो ही बराबरी से आते जाते रहते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने भी गीता में कहा है कि एक आदर्श पुरूष स्थितप्रज्ञ यानी समभाव होता है जिसे ना तो सफलता का गर्व होता है और ना ही पराजय की ग्लानि। ऐसे ही समभाव और स्थितप्रज्ञ आदर्श पुरूष की भांति नरेंद्र बलदोटा भी जीवन में सदैव समभाव रखते हैं। सामाजिक कार्यों में उन्होंने जो स्थायी कार्य किए हैं, उनमें मुख्यरूप से अभेराज बलदोटा केंसर डिटेक्शन सेंटर, वसंतीदेवी बलदोटा ब्लड बैंक हॉसपेट में और बलदोटा इंस्टीट्यूट ऑफ डाइजेस्टिव साइंस और ग्लोबल हास्पिटल का मुंबई में निर्माण करवाया है। और अभी भी वो रूकना नहीं चाहते हैं क्योंकि उन्हें मालूम है कि समाज को उनकी जरूरत है और वो जनहित में और भी कार्य करना चाहते हैं। जीवन की हर परिस्थिति का सामना पूरे समर्पित भाव से करते हैं और सही शिक्षा वो दूसरों को भी देते हैं। उनका मानना है कि जो व्यक्ति सत्य के सिद्धांत के साथ चलता है उसके जीवन में मुश्किलें तो आ सकती हैं। लेकिन वो कभी भी जीवन के गलत रास्ते पर नहीं जा सकता है। समाज में संवाद की भूमिका की जरूरत को महत्वपूर्ण बताते हुए नरेंद्र बलदोटा समाचार पत्रों को संवाद का सर्वश्रेष्ठ माध्य मानते हैं। उनका कहना है कि शताब्दी गौरव दुनिया के बड़े बड़े समाचार पत्रों की तरह बहुत साधन संपन्न न होने के बावजूद समाज को एकजुट करने, आपस में संबंधों को विकसित करने और समाज के नेतृत्व को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह सराहनीय बात है। उन्होंने शताब्दी गैरव को एक सच्चे समाजसेवक के रूप में बताते हुए कहते हैं कि इसी तरह के समाचार माध्यमों के कारण ही समाज मैं एकजुटता बनी हुई है। जीवन में जब बात पसंद की हो तो मुस्कुराते हुए बलदोटा बताते हैं कि परिवार और बच्चों के साथ समय बिताना उन्हें सबसे ज्यादा अच्छा लगता है। साथ ही उन्हें पढना पसंद है इसलिए जब भी मौका मिलता है वो अलग अलग विषयों पर किताबें पढना पसंद करते हैं। संगीत उनके मन को बांधने के साथ शांति प्रदान करता है, तो हर दिन एक से डेढ घंटा निकालकर व्यायाम भी करते हैं ताकि मन के साथ तन भी स्वस्थ रहे। अनेक सामाजिक संस्थाओं से जुडे नरेंद्र कुमार बलदोटा ने ढेरों सामाजिक कार्यों और समाज के उत्थान में अपना सहयोग दिया है। वे कहते हैं कि हमेशा हमें कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। रोज कुछ न कुछ नया करो। क्योंकि जिंदगी रोज कुछ न कुछ नया करते है। फिर जिंदगी कोई रूकने का नाम नहीं है। वह तो लगातार चलती ही रहती है। तो फिर हम क्यों रुकें।