सरकार बदली, अब लोग भी बदलेंगे देख लेना, कल तक जो इधर...

सरकार बदली, अब लोग भी बदलेंगे देख लेना, कल तक जो इधर थे अब वो उधर दिखेंगे

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सत्ता बदल गई। महाराष्ट्र में बीजेपी गई और शिवसेना आई। शिवसेना वैसे भी आने वाली ही थी। बीजेपी मान जाती तो उसके साथ आ जाती और नहीं मानी इसलिए दुश्मनों को दोस्त बनाकर काँग्रेस और एनसीपी के साथ सत्ता में आ गई। राजनीति में वैसे भी, कोई किसी का न तो स्थायी दोस्त होता है और न ही स्थायी दुश्मन, सो दुश्मन का दुश्मन दोस्त हो गया और जो कभी दोस्त था, वह अब दुश्मन हो गया। राजनीति कुल मिलाकर संभावनाओं का खेल है। इसीलिए उद्धव ठाकरे ने अपने लिए जहां मुख्यमंत्री बनने की संभावना थी, वहां जगह पक्की कर दी। तो उन बेचारे हजारों हजार कार्यकर्ताओं की तो कोई राजनीतिक बिसात ही नहीं है, जो अपने नेताओं के आगे नत मस्तक होकर हमेशा खडे रहते हैं। नेता जब तक ताकतवर, तब तक कार्यकर्ता भी ताकतवर। लेकिन सत्ता से उतरते ही नेताजी का नूर भी उतर जाता है, तो बेचारा कार्यकर्ता तो नया नेता तलाशेगा ही। इसिलिए अब जब सत्ता बदल गई, बीजेपी चली गई और शिवसेना, एनसीपी और काँग्रेस सत्ता में आ गई है। तो देख लेना, कई सोये हुए कार्यकर्ता जंगल में  खोए राजकुमार की तरह अचानक प्रकट होकर फिर से नये नेताओं के चक्कर काटते हुए दिखेंगे। पांच साल तक जब बीजेपी सत्ता में थी, तो राजस्थानी समाज के कई छोटे-मोटे कार्यकर्ता बीजेपी वालों के पीछे भागते देखे जा सकते थे। लेकिन अब मुश्किल यह है कि सत्ता के बेदखल होने के बाद बीजेपी के नेता खुद ही भाग रहे है। तो ये छोटे-मोटे कार्यकर्ता उनके पीछे क्यों भागे। इसलिए वे अब बिल्ले बदलेंगे, झंडे बदलेंगे और नये रंग के विजिटींग कार्ड छपवाकर नयी सरकार में कोई नया नेता तलाशेंगे। छुटभैये राजनीतिक कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी मुश्किल यह है कि इसके अलावा वे कुछ कर नहीं सकते और पांच साल तक पुराने नेता के पीछे समय खराब करने का धैर्य भी नहीं है। सो, अगर आपको कोई छूटभैया इस रास्ते से बडा बनने की कोशिश करता दिखे, तो माफ कर देना।