गीता जैन : खूब लड़ी मर्दानी…

गीता जैन : खूब लड़ी मर्दानी…

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Geeta Jain

मीरा भायंदर की नवनिर्वाचित विधायक गीता जैन मुंबई में ही नहीं देश भर की जैन समाज की महिलाओं के लिए एक आदर्श स्थापित करने वाली नेता साबित हुई है, जिसने निर्दलीय होते हुए भी  जबरदस्त जनसमर्थन जुटाकर भाजपा के उम्मीदवार और कमल निशानधारी नरेंद्र मेहता को चारों खाने चित कर दिया।

मुम्बई। गीता जैन अब नई भूमिका में है। पहले सिर्फ नगरसेवक थी, लेकिन अब विधायक हैं। पहले उनकी उपस्थिति एक सामान्य महिला की थी, लेकिन अब वे एक असाधारण महिला है। जो पहले से ज्यादा ताकतवर है और चुनाव जीतने के बाद एक प्रखर महिला के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करने में सफल रही है। मीरा भायंदर की स्थानीय राजनीति के साथ साथ विशेषकर मुंबई के राजस्थानी समाज की राजनीति में गीता जैन ने जो अपना दम दिखाया है, उस ताकत ने उनको राजनीतिक क्षेत्र में एक अलग किस्म का मुकाम प्रदान किया है। यह वो मुकाम है, जो कई ताकतवर पुरुष राजनेताओं के लिए भी आसान नहीं है। विधानसभा चुनाव में गीता जैन ने मीरा भायंदर से विधायक के रूप में अपनी बहुत ताकतवर नेता की छवि बनाने वाले नरेंद्र मेहता को बुरी तरह हराया। मेहता के पास भाजपा की ताकत और उसका कमल निशान था, लेकिन गीता जैन ने सिर्फ अपनी छवि के बल पर लोगों को अपने साथ जोड़ते हुए राजनीति के मैदान में अपने चुनाव निशान बैट के सामने नरेंद्र मेहता के कमल को ऐसी गुगली बनाया कि मेहता को अब तक समझ में नहीं आ रहा है कि उनके साथ अचानक क्या हो गया।

दरअसल गीता जैन मीरा भायंदर की स्थानीय राजनीति में एक नेता के रूप में कभी सक्रिय नहीं रही। उन्होंने हमेशा सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में घर-घर में अपनी जो छवि बनाई, महापौर रहते हुए जो विकास किया, यह जीत उसी की वजह से हुई। गीता जैन के लिए नगरसेविका के रूप में चुनाव जीतना महत्वपूर्ण नहीं रहा। लेकिन मीरा भायंदर के गली-गली, बिल्डिंग बिल्डिंग और घर-घर में उन्होंने अपनी उपस्थिति दर्ज करवा कर ताकतवर रूप से सेवा के जरिए लोगों को अपने साथ जोड़ा। वैसे महापौर रहते हुए भायंदर में कत्लखानों के खिलाफ अपनी जोरदार जंग छेडऩे के रूप में गीता जैन को माना जाता है। लेकिन उसके बाद जो वह राजनीतिक रूप से आगे बढ़ी तो पीछे मुडक़र कभी नहीं देखा। भले ही महापौर के रूप में भी तत्कालीन विधायक नरेंद्र मेहता ने उन्हें हमेशा दबाए रखने की राजनीति को अपने हाथ में रखा। लेकिन विधानसभा चुनाव में गीता जैन ने उनकी सारी ताकत को धूल में मिलाकर सारा हिसाब बराबर कर दिया। खास बात यह रही कि इस हिसाब किताब में पूरा जैन समाज एक तरह से गीता जैन की राजनीतिक पूंजी के रूप में उनके साथ खड़ा हो गया।

मीरा भायंदर की राजनीति में नरेंद्र मेहता को उनके आसपास के लोगों ने एक अजेय नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी। लेकिन विधानसभा चुनाव में उनकी बुरी हार ने गीता जैन की ताकत और मेहता की कमजोरी को सामाजिक रूप से भी स्थापित कर दिया। वैसे देखा जाए तो गीता जैन की राजनीतिक रणनीति तय करने में उनके पति भरत जैन और भाई संजय पुनमिया का बहुत बड़ा रोल रहा। जिन्होंने पूरे चुनाव को बहुत शक्तिशाली तरीके से लडऩे के लिए सारी डोर अपने हाथ में रखी और पूरे चुनाव को कहीं भी कमजोर पडऩे नहीं दिया। भाई संजय पुनमिया और पति भरत जैन इन दोनों को गीता की राजनीतिक ताकत गढऩे में ज्यादा मेहनत इसलिए करनी पड़ी क्योंकि सामने उम्मीदवार बहुत ताकतवर था। और दोनों ने मेहता की उसी ताकत के तोडऩे के लिए अपनी सारी ताकत लगाई तो ताकतवर मेहता की ताकत कुछ इस तरह बिखर गई कि अब वे चारों खाने चित दिखने लगे हैं। मीरा भायंदर के जैन समाज के लोग भी यह मानते हैं कि राजनीति में इतना घमंड भी कोई जरूरी नहीं है क्योंकि घमंड तो राजा रावण का भी नहीं चला। गीता जैन विनम्र है और सादगी से सबसे मिलती है और कहती भी है कि वे एक सामान्य महिला है और सब से मिलने जुलने में उनको कोई हर्ज नहीं है। जनता ने जो समर्थन दिया है, वे उसका सम्मान करते हुए उसी तरह से सक्रिय रहेंगी, जिस तरह से अब तक रही है। गीता जैन कहती है कि राजनीति में पद आते जाते रहते हैं लेकिन समाज का स्नेह साथ में रहना चाहिए। उन्होंने निर्दलीय होने के बावजूद भारी बहुमत से चुनाव जिताने के लिए जनता का आभार व्यक्त किया है।