जैन संघों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करें साधु भगवंत यही...

जैन संघों को पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करें साधु भगवंत यही इस चातुर्मास की सच्ची सफलता – उगम के. जैन सोनिग्रा, पुणे

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Uttam K Jain
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हर चातुर्मास अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन इस बार का चातुर्मास कुछ विशेष अभिनव, अदभुत एवं अभूतपूर्व होना चाहिए। इसे महत्वपूर्ण बनाने के लिए जैन धर्म के समस्त साधु संत इस चातुर्मास के दौरान समाज को यदि पर्यावरण की रक्षा के लिए प्रेरित करें, तो समस्त धरती पर उनका बहुत बड़ा उपकार होगा। क्या ही अच्छा होगा कि सभी साधु भगवंत समाज को प्रेरित करें कि हर जैन संघ अपने राजस्थान के एक गांव से दूसरे गांव तक वृक्ष लगाएं एवं उनको जिंदा रखने की जिम्मेदारी लें, तो जीवदया के क्षेत्र में एक नयी शुरूआत होगी। आखिर वृक्षों में भी जीव होता है, उसकी छाया के निचे पशु-पक्षी विश्राम करते है। वृक्षों पर पक्षी अपना घर बनाते है एवं उसपर बैठते है। वृक्ष अपनी हवा से हमें जीवनदान देते हैं। धरती का पर्यावरण बचाना सभी का कर्तव्य है। पर्यावरण बचेगा, तभी संसार बचेगा। अत: समस्त जैनाचार्य, मुनिराज, साधु-साध्वीजी अपने चातुर्मास के दौरान जैन संघों को प्रेरित करे कि वे एक गांव से दूसरे गांव तक वृक्ष लगाएं, जिससे मानव एवं पक्षीयों को शीतल छाव मिले। हम सबने देखा है कि खिमेल निवासी किशोर खिमावत ने आचार्य श्री जयंतसेन सूरीश्वर महाराज की प्रेरणा से पेड़ लगाने शुरू किए, तो वे पर्यावरण प्रेमी कहलाएं और आज उनके लगाए लाखों पेड़ों से मिली ऑक्सीजन से हम लोग सांस लेते हैं। आज उन पेडों को देखते हैं, तो दिल खुश हो जाता है और हम लोग किशोऱ खिमावत को याद करते हैं। अत: जैन धर्म के प्रत्येक व्यक्ति को यदि साधु भगवंत पेड़ लगाने के लिए प्रेरित करें, प्रत्येक जैन संघ को वृक्ष लगाने का आदेश दें, तो इससे जैन धर्म का पर्यावरण प्रेम दूसरे लोगों को भी प्रेरित करेगा। आखिर, भगवान महावीर ने भी अपनी शिक्षा में पर्यावरण की रक्षा को महत्वपूर्ण माना है। अधिकाधिक पेड़ लगने से न केवल पर्यावरण बचेगा, बल्कि हरियाली बढ़ेगी, हवा स्वच्छ होगी, भूमि का दोहन कम होगा, जल के स्रोत विकसित होंगे और गर्मी कम पड़ेगी, तो अकाल की संभावना भी समाप्त होगी। जैन धर्म की महान परंपरा को पोषित करनेवाले चातुर्मास पर्व की सार्थकता इसी में है कि इस दौरान समस्त साधु महाराज पूरे चार महीने अपनी तपस्या के सथ साथ पर्यवरण के विकास को भी अहम रखें। इन चार महीनों में होनेवाले विभिन्न आयोजनों में लाखों लोग शामिल होंगे और उनको प्रेरणा देते हुए कोई आचार्य महाराज समाज को मंदिर बनाने के लिए प्रेरित करेंगे, तो कोई धर्म की आराधना से समाज को जोड़ेंगे। कोई शिक्षा व संस्कृति के संस्थान स्थापित करने की अलख जगाएंगे, तो कोई साधु महाराज जीवन को शुद्ध करने के लिए सत्य के मार्ग पर चलने के प्रवचन देंगे। लेकिन यह सबसे प्रमुख समय है, जब सभी साधु भगवंतों को समाज को पर्यावरण बचाने के लिए भी प्रेरित करें। क्य़ोंकि पर्यावरण बचेगा, तो हम बचेंगे, एवं हम बचे, तो धर्म बचेगा। यही इस चातुर्मास की सच्ची सफलता होगी।