इस चातुर्मास से सबको एक कीजिए साधु भगवंत

इस चातुर्मास से सबको एक कीजिए साधु भगवंत

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चातुर्मास शुरू हो गया है। जैन धर्म के कई बड़े और दिग्गज संत मुंबई में चातुर्मास पर बिराजमान हैं। खुशी की बात है। लेकिन असल खुशी की बात यह होगी कि हमारे साधु संत जैन समाज को हर स्तर पर एक करने के लिए कोई सार्थक पहल करें, जो कि कोई बहुत आसान तो नहीं, लेकिन मुश्किल भी नहीं है। कमसे कम इस चातुर्मास से एकता की शुरुआत तो होनी ही चाहिए।

जैन समाज में ज्यादातर व्यापारिक वर्ग के लोग में हैं। जैन धर्म के चारों फिरकों के लोग व्यावसायिक रूप से आपस में बहुत तेजी से जुड़ रहे हैं। देखा जाए, तो हम व्यावसायिक रूप से जब आसानी से एक हो जाते हैं, तो धार्मिक आयोजनों के स्तर पर एक क्यों नहीं हो सकते, यह बहुत बड़ा सवाल है। श्वेतांबर, दिगंबर, तेरापंथी और स्थानकवासी आदि सभी समुदायों के आचार-विचार एक, पूजा पद्धति एक और जीवन का व्यवहार भी बिल्कुल एक समान। संभवतया इसीलिए शादी-विवाह संबंध भी आपस में पहले भी होते थे, लेकिन अब इन संबंधों ने भी गति पकड़ी है। धर्म एक है। तो, फिर उस धर्म के उत्सवों व अवसरों को मनाने के दिन क्यों सभी के अलग अलग हैं, इस चातुर्मास में हमारे साधु संतों को यही सवाल बहुत गहरे से समझकर सभी को एक करने की जरूरत है। जैन समाज के लोग अपनी सुदृढ़ सांस्कृतिक परंपरा और धर्म की आराधना की चेतना से ही आयुष्यमान हैं। इसलिए, अपने इस पावन धर्म की प्रभावना एवं शासन की रक्षा के लिए हम सारे संगठित होकर आगे बढ़ें, यह आज के समय की जरूरत है। पूरा विश्व आज जैन धर्म का दीवाना है। लेकिन हमारी सबसे बड़ी मुश्किल है कि हम आपस में एक नहीं है। समस्त साधु भगवंतों से यही निवेदन कि कोई बात नहीं, श्रावकों को बाद में एक कीजिए, पहले आपस में तो एक हो जाइए।