कराड़ में आचार्य महेन्द्रसागर का भव्य चातुर्मास प्रवेश

कराड़ में आचार्य महेन्द्रसागर का भव्य चातुर्मास प्रवेश

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कराड। राजस्थान जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ में आचार्य महेन्द्रसागरजी आदि के वर्षयोग के प्रवेश निमित शोभायात्रा के रास्ते का ध्वजा-पताका, तोरण, कमान और रंगोलियों द्वारा श्रंृगारित किया गया था। कलशधारी बालिकाओं और महिलाओं ने रंग-बिरंगे वस्त्रों में सजधजकर उत्साह उमंग के साथ आचार्यश्री का अक्षत से स्वागत किया। शोभायात्रा के रास्ते में दोनों ओर बडी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने जयकारों के साथ आचार्यश्री का स्वागत किया। सामैया मीनाक्षी हॉल पहुंचकर धर्मसभा में परिवर्तित हो गया। आचार्यश्री के चातुर्मास प्रवेश में गुजरात, आंध्र, तमिलनाडू, मुंबई, बेंगलुरु, अहमदाबाद, गोवा, हुबली, गदग, धारवाड़, हडगली, मुधोल, जमखडी, बल्लारी, सूरत, लोंडा, पूना, वडगांव, इस्ममापुर इत्यादि अनेक संघों से श्रद्धालु शामिल हुए। इस अवसर पर आचार्यश्री महेन्द्रसागर ने कहा कि चातुर्मास (वर्षाऋतु) में आसमान पर बादल मंडराते हैं फिर बरसते हैं और उसके बाद किसान खुशी-खुशी खेती काम में लग जाते हैं। वर्षावास में पधारें साधुओं के लिए भी ऐसा ही होता है। पहले आगम सिद्धान्त जिनशासन गगन में मंडराते हैं, फिर गुरु मुख से जिन वाणी के रुप में झूम झूम कर बरसते हैं। आसमान से गिरी बरसात धती के कचरे को साफ करती है। अब व्यापार व शादी विवाह का समय खत्म हो रहा है, आप सब पूर्ण रुप से धर्म आराधना के लिए तैयार हो जाइए। उन्होंने कहा कि मैं यहां चौमासे में सबको दर्शन, ज्ञान, चारित्र और तप का पाठ पढ़ाने आया हँू। मुनिश्री राजपद्मसागर ने कहा किहम स्वकल्याण करना और स्वकल्याण कराने का साधु के जीवन का सबसे सबसे बड़ा आयोजन लेकर आए हैं आपका सहयोग चाहिए।