संत अकेला सडक़ पर, यह शर्म का विषय -सिद्धराज लोढ़ा

संत अकेला सडक़ पर, यह शर्म का विषय -सिद्धराज लोढ़ा

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Sidhraj Lodha

इन दिनों चातुर्मास का मौसम है। साधु-संत विहार पर हैं और समाज उनके आयोजनों की तैयारियों में व्यस्त है। हर तरफ से साधु-साध्वीजी अपने-अपने चातुर्मास स्थलों की तरफ बढ़ रहे हैं। लेकिन उनके विहार की मुश्किलों की चिंता कितने लोगों को है, यह चिंतन का विषय है। साधु भगवंत तो बड़ी सुबह और देर शाम को भी अकेले विहार कर लेते है। लेकिन सुबह के घुप्प अंधेरे में और शाम के गहराते अंधेरे के समय अकेले रास्ता पार करना साध्वी भगवंतों के लिए बहुत मुश्किल का समय है। हाईवे पर अंधेरी शाम में अकेली साध्वीजी को विहार करते देखना आम बात हैं। लेकिन सवाल यह है कि समाज के कल्याण और समस्त मानवता के उत्सर्ग के लिए जिन्होंने जीवन के सारे सुख त्याग दिये, उन साध्वीजी को अकेले हाईवे पर मुश्किल हालात पर अकेले क्यों चलना पड़ रहा है। जैन समाज कितना संवेदनशील है, इसका उदाहरण इन दिनों हाईवे पर अकेले विहार करते साधु भगवंतों को देखने से मिल रहा है। सोचिए, हमारे घर की महिलाओं को हम सुबह चार बजे अकेले कहीं जाने की इजाजत देते हैं? नहीं। तो फिर युवा साध्वियों और अत्यंत बुजुर्ग साध्वीजी को अकेले अंधेरी सडक़ पर चलते समय समाज के कुछ लोग साथ क्यों नहीं चल सकते। हम जैन होने पर अगर गर्व करते है तो हमें इस बात पर शर्म क्यों नहीं आती कि हम हमारे साधु भगवंतों और खासकर साध्वीजी को हाईवे पर अकेला क्यों छोड देते हैं?