भारतीय वाङमय के मनीषी श्री विजयानन्द सूरिजी ‘पुण्यतिथि पर विशेष’

भारतीय वाङमय के मनीषी श्री विजयानन्द सूरिजी ‘पुण्यतिथि पर विशेष’

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संसार एक रंगमंच है, इस रंगमंच पर सभी प्राणी अपना-2 अभिनय दिखाकर चले जाते हैं परन्तु कुछ प्राणियों की स्मृति अमर रूप धारण कर भविष्य की पीढिय़ों के लिए प्रकाश स्तम्भ का काम देती हैं। भारतीय संस्कृति की श्रमण परम्परा के महान आचार्य श्री विजयानंद सूरि उन्नीसवीं शताब्दी के ‘भारतीय सुधारÓ के प्रणेता गुरूओं व नेताओं में गिने जाते हैं। महर्षि दयानंद सरस्वती व स्वामी रामकृष्ण परमहंस के समकालीन, आचार्य विजयानंद, जिन्हें उत्तर भारत में उनके प्रसिद्ध नाम ‘आत्मारामÓ के नाम से जाना जाता है, अपने युग के महान मनीषी, लेखक एवं प्रवक्ता तथा तत्तवेता धर्मगुरू थे। मानव को उसकी महानता दर्शाकर, मानवीय गौरव बढाकर, उसे आत्मदर्शन की महान साधना में लगाकर परम हित एवं कल्याण ही उनके जीवन का मात्रा उद्देश्य रहा।

स्वयं विष पीकर विश्व को अमृत बाँटने वालों में गुरु आत्माराम का नाम सर्वाग्रणी है।

ऐसे गुरुदेव ने अपने विशिष्ट सम्यक दर्शन, ज्ञान, चरित्रा एवं नेतृत्व बल से जिनशासन के संरक्षण एवं संवर्धन मेे महकती भूमिका निभाई है। उन्होने अपनी प्रत्येक श्वास से, रक्त के प्रत्येक कण से जिनशासन को सींचा है जिसके फलस्वरूप ही हमें परमात्म शासन सम्यक रूप से मिला है। मानव को उसकी महानता दर्शाकर, मानवीय गौरव बढ़ाकर, उसे आत्मदर्शन की महान साधना में लगाकर परम हित एवं कल्याण ही उनके जीवन का मात्रा उद्देश्य रहा। उनके व्यवहार में नम्रता, सौजन्यता, सत्यता और साहस का समावेश था।

दीक्षा के प्रथम क्षण से ही उन्हें पढऩे और अपने ज्ञान बढ़ाने का, मानो, एक व्यसन सा लग गया था। उनकी बुद्धि बहुत तीक्ष्ण और निर्मल थी। उनका साहस और शक्ति इतनी अधिक थी कि वे 15 दिन में ही व्याख्यान देने लगे। उन्होंने प्रारम्भ से ही उन गुणों के संपादन की कोशिश की, जो एक सफल नेता बनने के लिए आवश्यक होते हैं। उनके द्वारा रचित गद्य एवं पद्य साहित्य के प्रत्येक गं्रथ व ग्रंथ के प्रत्येक प्रकरण के प्रत्येक विषय, विषय के परिच्छेद, परिच्छेद के प्रत्येक वाक्य और वाकय के प्रत्येक शब्द में उनके प्रकांड, अगाध एवं विशाल विद्वत्ता तथा अध्ययन, अप्रतिम प्रतिभा, सूक्ष्म दृष्टि, विषय प्रतिपादन की आकर्षक शैली, निर्भय व्यक्तित्व, अपरिमेय तर्क शक्ति, सत्य के प्रति अनन्य अनुराग और जिन शासन सेवा की ललक आदि सभी विशेषताएं उजागर होती हैं। जैन गं्रथों का आपके हाथों से बहुत उद्वार हुआ है। इन आवश्यकताओं की परिपूर्ति के लिए आचार्य श्रीमद् विजयानंद सूरीश्वरजी महाराज ने हिन्दी में बारह गं्रथ लिखें हैं जिनमें से कुछ इस प्रकार से हैं:- ‘जैन तत्वादर्शÓ, ‘ अज्ञान तिमिर भास्करÓ, ‘जैन प्रश्नोत्तरÓ, ‘तत्वनिर्णय प्रासादÓ, ‘शिकागो प्रश्नोत्तरÓ, ‘जैनमत वृक्षÓ, ‘सम्यक्त व शल्योद्वारÓ एवं ‘जैनधर्म का स्वरूपÓ ये ग्रंथ अत्यंत प्रामाणिक, ऐतिहासिक एवं पठनीय हैं।

तत्कालीन जैन धर्म और समाज मे चारों ओर यतियों के शिथिलाचार का साम्राज्य फैला हुआ था। तबउन्होंने जैन धर्म और समाज को यतियों के प्रभाव से मुक्त किया। उन्होंने अपने ओजस्वी वक्तृत्वकला के द्वारा लोगों को बताया कि भगवान महावीर स्वामी का सच्चा श्रमण – साधु, त्यागी, तपस्वी, संयमी और संसार से विरक्त होता है। यदि तुम आत्मा का कल्याण करना चाहते हो तो सच्चे, त्यागी-वैरागी और चरित्रा संपन्न के पास जाओ, उनके प्रवचन सुनो, उनकी सेवा और भक्ति करो। इसी से तुम्हारा कल्याण होगा।

वे न्याय दर्शन के महापंडित थे। तर्क करने में और तर्क का उत्तर देने में उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता था। उनकी समझाने की शक्ति इतनी सरल और हृदयगम्य थी कि सामान्य से सामान्य और अनपढ़ जन भी भलीभांति उसे ग्रहण कर लेता था। आचार्य श्री विजयानंद सूरि महान कवि थे। उनका हृदय भक्ति और समर्पण से परिपूर्ण था। जब हृदय भक्ति से भर जाता तब अपने आप भाव मुख से प्रस्फुटित होकर भजन का रूप धारण कर लेते थे। उन्हें न शब्द योजना मिलानी पड़ती थी न तुक। जो होता था सहज, अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से वह संगीत के लय, सुर, ताल तथा छंद अलंकारों में पारंगत हो गये थे, तथा उनकी बराबरी कोई संगीतज्ञ नहीं कर पाता था। महान कवि और लेखक होने के साथ साथ विजयानंद सूरि जी एक श्रेष्ठ संगीतज्ञ भी थे।

पंजाब केसरी, युगवीर जैनाचार्य श्रीमद् विजय वल्लभ सूरीश्वरजी महाराज ने उन्हें ‘तपोगच्छ गगन में दिनमणि सरीखाÓ कहा था। उनका जीवन संघर्षों की महागाथा है। वे अनगिनत कठिनाइयों में भी सत्य की खोज करते रहे। उन्होंने विकट परिस्थितियों से कभी हार नहीं मानी। वे चाहते थे कि जैन धर्म का प्रचार समग्र विश्व में हो। उन्होंने जैन धर्म को यतिवाद के उपद्रव से मुक्त किया। उनका जीवन तो अथाह गुणों का सागर था। वे गुणों के रत्नाकर थे। पंजाब प्रांत के लिए तो विशुद्ध जैन धर्म के पुनर्जन्मदाता ही आपको कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

अपने जीवन के अंतिम क्षणों में उन्होंने मुनि श्री वल्लभ विजयजी को अपने पास बुलाकर अपना अंमित संदेश दिया कि श्रावकों की श्रद्धा को स्थिर रखने के लिए मैंने परमात्मा के मंदिरों की स्थापना कर दी है। अब तुम सरस्वती मंदिरों की स्थापना अवश्य करना। उन्होंने हाथ जोडक़र सबकी ओर देखते हुए कहा- ‘लो भाई! अब हम चलते हैं और सब को खमाते हैं।Ó गुरुदेव का जीवन अनन्त प्रेरणा का स्त्रोत है। ऐसे गुरुदेव का जीवन तो वह सूर्य है जो किसी की ज्योति ग्रहण नहीं करता, बल्कि अपनी ज्योति से दूसरों को भी प्रकाशमय बनाता है।

‘सूर्य की शोभा आसमान से नहीं, अपने प्रकाश से होती है। पुष्प की प्रतिष्ठा उद्यान से नहीं, अपनी सुगंध से होती है। मानव की महिमा व्यवहार से नहीं, आत्म विकास से होती है।Ó