लव जि़हाद और अंतर्जातीय विवाह – आखिऱ जैन और हिन्दू इतने बेबस...

लव जि़हाद और अंतर्जातीय विवाह – आखिऱ जैन और हिन्दू इतने बेबस क्यों?

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पिछले कुछ सालों में जैन व हिंदू समाज में लव जिहाद की घटनाये अचानक बढ़ गई है। समाज दुखी है और बेटियां परेशान। आचार्य श्री विमल सागर सूरीश्वरजी महाराज क्रांतिकारी भाषा में इस तरह की बुराइयों पर सार्वजनिक रुप से प्रहार करते रहे है। पेश है लव जिहाद और अंतर्जातीय विवाह पर उनका ओजस्वी आंकलन…

अहमदाबाद। लव जि़हाद में फंसकर एक और जैन लडक़ी पिछले सप्ताह मुसलमान बन गयी। संजीव जैन की 20 वर्षीय बेटी समीक्षा जैन को मध्यप्रदेश से भगाया गया और हैदराबाद में उसे सुन्नी मुसलमान बनाकर एक मुस्लिम युवक ने उससे निक़ाह किया। अब वह आलिया बेग़म के नाम से जानी जायेगी। बुद्धि की भ्रष्टता देखिये कि टाइट जीन्स और ऊपर शर्ट-टीशर्ट पहनने का शौक़ पालने वाली समीक्षा जैन युवती अब ताजिंदगी बुरखे में जिंदगी की समीक्षा करेगी। हमारी जानकारी के अनुसार जैन लड़कियां सबसे अधिक लव जि़हाद का शिकार बन रही है। इससे उनके बौद्धिक स्तर और उनकी मूर्खता का पता चलता है। जैन परिवारों में आ रहा खुलापन और लड़कियों को दी जा रही स्वंत्रता का यह नतीज़ा है। ख़तरनाक बनती जा रही इन विकट परिस्थितियों में भी समाज के कर्णधार साधु-साध्वी और श्रावक अपने-अपने समुदाय-सम्प्रदाय, पंथ-मान्यता, जाति-वर्ग, उत्सव-महोत्सव, क्षेत्र, संख्या, नाम और वर्चस्व में रचे-पचे हैं। अभिमान और ईष्र्या समाज मे इतने व्याप्त हैं कि सिर्फ श्रावक वर्ग ही नहीं, घर-संसार छोडक़र साधु-साध्वी बने हुए महापुरुष भी एक-दूसरे को नीचा दिखाने और गिराने की चेष्टाएं करते रहते हैं. ऐसी स्थिति में समाज और धर्म का यही हश्र होना हैं।

अब हिन्दू व जैन समाज के लिये भारतीय संविधान की समीक्षा का समय आ गया है। ध्यान रहे कि राष्ट्र, संविधान, समाज या पड़ोसी किसी की बेटी को पालकर बड़ा नहीं करते। माता-पिता संतानों के लिये दिन-रात मरते हैं। 18 वर्षों तक माता-पिता ने अपना सब-कुछ बलिदान में लगाकर जिस बेटी को बड़ा किया हों, उसे अगले ही पल मां-बाप के साथ धोखा करने का अधिकार कैसे मिल सकता है? संविधान को अभी एक सौ साल भी पूरे नहीं हुए हैं, जबकि हमारी सामाजिक-धार्मिक-सांस्कृतिक व्यवस्थाएं हजारों-लाखों साल पुरानी हैं। मनुष्य और समाज की जिंदगी संविधान के लिये नहीं हो सकती. संविधान भारतीय मनुष्य और समाज के लिये बना है. वह धर्म, समाज और संस्कृति की रक्षा के लिये हैं, उसके विनाश के लिये नहीं।

अनेकता में एकता या सामाजिक समरसता अथवा धार्मिक सद्भावना का यह अर्थ बिलकुल नहीं होता कि वह किसी की सांस्कृतिक-धार्मिक-सामाजिक परंपराओं को छीन लें। व्यक्ति से राष्ट्र नहीं चलता, समाज-धर्म और संस्कृति की नीतियों से राष्ट्र चलता है। इसलिए लोकतंत्र में व्यक्ति से ज़्यादा समाज-धर्म और संस्कृति का चिंतन होना चाहिये। माता-पिता की अनुमति के बिना शादियां असंवैधानिक सिद्ध होनी चाहियें। धर्म परिवर्तन तो कतई नहीं होना चाहिये। लव जि़हाद और अंतरजातीय विवाह की शिकार हजारों-लाखों लड़कियां आज दु:खी हैं. हजारों ऐसी लड़कियों ने आत्महत्या कर जिंदगी समेटली हैं। हजारों दु:खी लड़कियां अपने मां-बाप के घर वापस आ गई हैं। उन सबकी जि़म्मेदारी कौन ले रहा है ?

जब एक इंसान को अपने मन के मुताबिक किसी को भगाने या धर्म परिवर्तन करवाने का हक मिलता हो तो उन हजारों-लाखों दु:खी लड़कियों को भी पक्के अधिकार मिलने चाहियें।

संविधान में किसी की जि़ंदगी बिगाडऩे की बदौलत आजीवन कारावास की व्यवस्था भी होनी चाहियें। बाकी सारी बातें एक तरफ़ छोडिय़े, सबसे पहले संविधान में मझबूत परिवर्तन के लिये सभी हिन्दुओं और जैन संगठनों को एक स्वर में आंदोलन चलाना होगा. यह भी मानकर चलिये कि यदि यह काम अभी नहीं होता है, तो शायद आगे कभी नहीं होगा।

अब सिफऱ् यह देखना हैं कि समाज के प्रतिष्ठित पदों पर बैठे हुए साधु और गृहस्थ जगते हैं, या फिर समाज की बरबादी को चलने देते हैं।