जैनों के अल्पसंख्यक होने का क्या मतलब?

जैनों के अल्पसंख्यक होने का क्या मतलब?

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कोई है, जो बताए कि उसे अल्पसंख्यक होने का फायदा मिला

जैन समाज अब अल्पसंख्यक है। जनसंख्या के आधार पर तो पहले से ही जैन समाज अल्पसंख्यक थे, लेकिन बीते चार साल से कानूनी रूप से भी जैन अल्पसंख्यक है। लेकिन अन्य अल्संख्यक समुदायों की तुलना में जैन समाज को कोई संवैधानिक संरक्षण और सरकारी फायदा नहीं मिलता। उल्टे जैनों के व्यापारी होने का फायदा सरकार लेती है। जबकि अल्पसंख्यक समुदाय के सबसे बड़े वर्ग मुसलमानों को कई तरह के सरकारी फायदे मिलते हैं, जैसे उनके शैक्षणिक संस्थानों को सहायता, मदरसों को वित्तीय सहयोग और मस्जिदों को विशेष संरक्षण तथा पढ़ाई में भी मुसलमानों के बच्चों को सरकारी सहायता। लेकिन जैन समाज को इस तरह का कोई फायदा नहीं मिलता। सामाजिक सुरक्षा भी नहीं और ना ही शैक्षणिक संरक्षण में सहायता। देश में करीब 50 लाख जैन हैं, ऐसा माना जाता है और देश में यदि सबसे ज्यादा जैन कहीं है, तो मुंबई में है। लेकिन फिर भी संभवतया मुंबई शहर में तो कोई भी नहीं होगा, जो दावे के साथ यह बता सके कि उसे व्यक्तिगत तौर पर अल्पसंख्यक होने का फायदा यह मिला।

वैसे, सच कहा जाए, तो जैन समाज के अधिकांश लोगों को तो यही नहीं पता है कि अल्पसंख्यक होने के सरकार की ओर से क्या फायदे मिलते हैं और वे फाय़दे लिए कैसे जाते हैं। हालांकि जैन इंटरनैशनल ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन (जीतो) ने जून 2017 में जैन समाज को अल्पसंख्यक समुदाय के तौर पर सरकार से मिलने वाले लाभ के प्रति समाज को जागृत करने के लिए कार्यक्रम आयोजित किया था। लेकिन उसका भी कोई फायदा नहीं हुआ। यह भी सच है कि सही मायने में जैन समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को सरकारी फायदों की जरूरत ही नहीं है। और जिनको जरूरत है, उनको पता नहीं है कि फायदे कैसे लिए जाते हैं।

दरअसल, जैन समुदाय भारत में संवैधानिक रूप से पांच अन्य अल्पसंख्यक समुदायों मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और पारसी के समान माना जाता है। कांग्रेस सरकार ने 20 जनवरी 2014 को जाते जाते जैन समाज को अल्पसंख्यक वर्ग का दर्जा दिया था। तब बहुत जोर शोर से ऐसा प्रचार किया जा रहा था कि अब जैन समाज को भी बहुत सारे फायदे मिलेंगे और ऐसी तस्वीर पेश की जा रही थी कि जैसे, जैन समाज को मिला अल्पसंख्यक वर्ग का दर्जा समूचे देश में जैन समाज को फायदे ही फायदे देगा। लेकिन न तो हमारे ट्रस्टों और मंदिरों के संचालन में हस्तक्षेप रुक पाया है और न ही मंदिरों की आय और जमीन-जायदाद पर से सरकारी कब्जे समाप्त हुए हैं। मेवाड़ स्थित हमारा सबसे प्रख्यात तीर्थ केसरियाजी मंदिर इसका सबसे बड़ा सबूत है। हाल ही में महाराष्ट्र में सरकार द्वारा मंदिरों व ट्रस्टों के पैसों से किसानों के बच्चो के विवाह के लिए सहायता करना भी अनिवार्य कर दिया गय़ा है।

कांग्रेस सरकार ने जब जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया था तब 2014 में चुनाव बिलकुल सामने थे। राजनीति में सारे काम चुनावी फायदे को दृष्टि में रखते हुए किए जाते हैं। इसी वजह से जैन समाज को अल्पसंख्यक होने का झुनझुना पकड़ा दिया गया। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में जैन समाज का कांग्रेस को कोई समर्थन नहीं मिला। उल्टे पूरा व्यापारिक समुदाय नरेंद्र मोदी के समर्थन में जा खड़ा हुआ और बीजेपी इतिहास के सबसे बड़े बहुमत से जीती। लेकिन अब लगता है कि बीजेपी सरकार भी जैनों को अल्पसंख्यक समुदाय में होने का कोई बहुत बड़ा फायदा देने के मूड में नहीं है क्योंकि बीजेपी और मोदी यही मानकर चलेंगे की जैन तो परंपरागत रूप से उन्हीं के साथ है। जैन समाज को अल्पसंख्यक समुदाय में होने का फायदा लेने के लिए अपने आंतरिक नेतृत्व को संकल्पशील होने पर मजबूर करना होगा। और संसद एवं विधानसभाओं में अपने समाज की चिंता करनेवाले प्रतिनिधियों को भेजना होगा।

हमारे ही समाज के कुछ लोगों का कहना है कि भारतीय आबादी में जैन की संख्या बहुत मामूली है, इसलिए अल्पसंख्यक होने के फायदे नहीं मिलते। लेकिन असल बात यह है कि कोई भी फायदा लेने के लिए जो लड़ाकू होने की पात्रता हमारे भीतर होनी चाहिए, वह जैन समाज में नहीं है। इसलिए लड़ाकू बनिये, नहीं तो कोई फायदा कभी नहीं मिलेगा, यकीन मानिये।