सिवास (श्रीवास) / Sivas

सिवास (श्रीवास) / Sivas

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राजस्थान की पुण्य धरा पर पाली जिले के गोडवाड क्षेत्र में जोधपुर-उदयपुर मेगा हाईवे क्र. ६७ पर सोमेसर रेलवे स्टेशन से २४ कि.मी., मारवाड़  जंक्शन से ४५ कि.मी. और नाडोल से १८ कि.मी. दूर खिंवाडा जाने वाली सड़क पर स्थित है एक छोटा सा गांव सिवास। इस गांव का प्राचीन नाम श्रीवास था, पर कालक्रम में अपभ्रंश होते-होते यह सिवास हो गया और बोली भाषा में इसे ‘हिवा’ कहते है।

यहां की प्राचीनता के कोई ठोस प्रमाण तो प्राप्त नहीं होते, मगर गांव वालों के अनुसार, गांव काफी प्राचीन है। वे इसे ७०० से ८०० वर्ष प्राचीन मानते है। जैनों के घर भी काफी कम रहे। पहले यहां १७ घरो की बस्ती थी। आज भी १७ घरों की ही नोंद है। मगर १०० वर्ष पूर्व यहां पर करीब ६० से ज्यादा घरों की बस्ती थी। फिर भी धर्म प्रति आस्था पक्की थी। शुरूआत में मारवाड़ जंक्शन से धातु की चौवीसी व सिद्धचक्र गट्ठा लाकर वर्तमान जिनमंदिर के ठीक सामने पुरानी धर्मशाला के कमरे में स्थापित कर जन-जन पूजा-अर्चना करने का लाभ लेते थे। धीरे-धीरे सभी के हृदय में जिन मंदिर के निर्माण के भाव जागृत हुए, मगर योग नहीं बन रहे थे।

जैन तीर्थ सर्वसंग्रह  ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ ने कोट के पास धारवाबंध मंदिर का निर्माण करवाकर वि.सं. १९८९, वीर नि.सं. २४५९, शाके १८५४ में मूलनायक श्री शांतिनाथ प्रभु सह धातु की एक प्रतिमा स्थापित करवाई। पूर्व में २ उपाश्रय और एक धर्मशाला थी। मेरी गोडवाड यात्रा पुस्तक अनुसार, ७० वर्ष पूर्व एक जिनालय में धातु चौवीसी स्थापित थी, एक उपाश्रय और ओसवालों के १२ घर थे।

अतीत से वर्तमान त : शासन प्रभावक, गोडवाड जोजावर रत्न आ. श्री जिनेन्द्रसूरिजी से आशीर्वाद व प्रेरणा प्राप्त कर आखिरकार श्री संघ ने १० वर्ष के अथक प्रयास से जिनमंदिर का निर्माण करवाकर वीर नि. सं. २५०२, शाके १८९७ व वि.सं. २०३२, ज्येष्ठ कृष्ण ५, गुरूवार, मई १९७६ में महोत्सवपूर्वक प्रतिष्ठा शिरोमणि पू. आ.श्री पद्मसूरिजी आ.ठा. के वरद हस्ते चक्रवर्ती तीर्थंकर प्रभु श्री कुंथुनाथ स्वामी की मूलनाय· रूप में प्रतिष्ठा संपन्न करवाई। प्रतिमाओं की अंजन शलाका मारवाड़ जंक्शन के पास खारसी गांव के प्रतिष्ठोत्सव पर पू. आ. श्री जिनेन्द्रसूरिजी के पट्टधर शिष्य पू. आ. श्री पद्मसूरिजी के हस्ते हुई थी। समय के प्रभाव से मंदिर पुन: जीर्ण सा होने लगा। श्री संघ ने जीर्णोद्धार करवाने का निर्णय कर इसे श्वेत आरस पत्थर से नवनिर्मित शिखरबद्ध, दो गजराजों से शोभित प्रवेशद्वार, कलात्मक मनमोहक जिनप्रासाद में वीर नि.सं. २५३३, शाके १९२८, वि.सं. २०६३ के प्रथम ज्येष्ठ वदि ११, रविवार, दि. १३.५.२००७ को, शासनप्रभावक पू. आ.श्री  पद्मसूरिजी आ.ठा. व घेनडी रत्न सा. श्री ज्येष्ठप्रभाश्रीजी की सुशिष्या व चतुर्विध संघ की उपस्थिति में श्वेतवर्णी, १५ इंची, पद्मासनस्थ, पूर्वाभिमुखी, मूलनायक श्री १७वें तीर्थंकर श्री कुंथुनाथजी, श्री पद्मप्रभु व श्री सुपाश्र्वनाथ सह श्री नाकोडा भेरूजी एवं श्री पद्मावती माताजी की प्रतिष्ठा, पंचाह्निका महोत्सव से संपन्न हुई। प्रतिवर्ष जेठ वदि ११ को, श्री केवलचंदजी गुलाबचंदजी नाहर परिवार ध्वजा चढाते है। वर्तमान में यहां जैनों के १८ घर है। अजैन ९ मंदिर है।

ग्राम पंचायत सिवास की कुल जनसंख्या ७०० के करीब है। मुलभूत सारी सुविधाएं ५ कि.मी. दूर खिंवाडा में है। गांव के तालाब के किनारे सैंकड़ों वर्ष प्राचीन महाकाली का मंदिर है, जिसके दर्शनार्थ आज भी बड़ी संख्या में भक्तजन आते है।

मार्गदर्शन : नजदीक का बड़ा नगर खिंवाडा से ५ कि.मी., नाडोल से १८ कि.मी., सोमेसर रेलवे स्टेशन से २४ कि.मी., मेगा हाईवे मोड़ से १२ कि.मी., जोधपुर हवाई अड्डे से १३० कि.मी. दूर, सिवास हेतु बस, टैक्सी व रिक्शा प्राप्त होते है।

सुविधाए : मंदिर के पास ठीक सामने उपाश्रय व धर्मशाला है।

विशेष : इतिहास की जानकारी श्री सोहनजी सोनिगरा से प्राप्त हुई।

पेढी : श्री कुंथुनाथ जैन संघ

जैनों की वास, मुख्य बाजार, मु.पो.सिवास-३०६५०२, वाया-खिंवाडा, तह.देसुरी, जिला-पाली, राजस्थान

पेढी संपर् : ०२९३४-२४८७०५, पुजारी : अशोक-०९९५००१३४३७

ट्रस्टी : श्री हंसमुखजी, सिवास – ०९७८४०९७९३२, श्री केवलचंदजी, बैंगलोर – ०९४४८६१२८०८