पिलोवणी / Pilowani

पिलोवणी / Pilowani

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शूरवीरों की भूमि मरूधर के पाली जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर मंडली गांव से जोधपुर-उदयपुर मेगा हाईवे क्र.६७ पर सोमेसर रेलवे स्टेशन से २४ कि.मी. की दूरी पर हाईवे फाटा से सांवलता-घेनड़ी होकर १२ कि.मी. दूर सुमेरू नदी के किनारे गांव बसा है – पिलोवणी

गांव वालों के अनुसार, १०५ वर्ष पहले गृह मंदिर में दो चौवीसी और एक सिद्धचक्रजी का गठ्ठा विराजमान करके जैन भाई पूजा-अर्चन करते थे। आ. श्री यतीन्द्रसूरिजी रचित मेरी गोडवाड यात्रा के अनुसार, ७० वर्ष पूर्व एक जैन मंदिर में धातु की चौवीसी प्रतिष्ठित थी, एक उपाश्रय एवं जैनों के १५ घर विद्यमान थे। वर्तमान में ५५ जैन घर है। गांव में केवल दो ही गोत्र के अर्थात वेदमुथ्था एवं पुनमिया गोत्र के बंधु है।

श्री आनंदजी कल्याणजी पेढी द्वारा प्रकाशित ग्रंथ जैन तीर्थ सर्वसंग्रह ग्रंथ के अनुसार, (पृष्ठ क्रं.३९७ व कोठार नं. २६५६) एक यतिजी ने वि.सं. १८५० में घुमटबंध जैन मंदिर श्री संघ को सौंप दिया। पूर्व में यहां ५६ जैन व एक धर्मशाला थी। यह जानकारी विचारणीय है। इसके अनुसार मंदिर लगभग २२० वर्ष प्राचीन है।

जिनालय की जीर्ण अवस्था देखकर सभी के मन में शिखरबद्ध जैन मंदिर बनाने की भावना प्रबल बनी। इस बीच आ. श्री जिनेन्द्रसूरिजी से प्रेरणा पाकर कार्य की शुरूआत भी हुई, मगर शायद अभी योग नहीं बना था। आचार्य श्री अचानक देवलोक हो गये और कार्य की गति धीमी पड़ गई। आ. श्री के शिष्य प्रतिष्ठा शिरोमणि ने श्री संघ को प्रेरणा प्रदान कर पुन: गति प्रदान करवाई। वीर नि. सं. २५१४, शाके १९०९, वि.सं. २०४४, महासुदि ५ (वसंत पंचमी) फरवरी १९८८ को शिखरबद्ध जिनालय हेतु खात् मुहूर्त संपन्न हुआ। पांच वर्षो तक लगातार श्रीमान घीसूलालजी सुमेरमलजी वेदमुथ्था की देखरेख में आरस पत्थर से निर्मित देवविमान स्वरूप, दो विशाल अश्वों से शोभित उंची चौकी पर शिखरबद्ध, कलात्मक जिनप्रासाद का निमार्ण पूर्ण हुआ। वह दिन भी आ गया जब प्रभु को गादीनशीन होना था।

वीर नि. सं. २५१९, शाके १९१४, वि.सं. २०४९, माघ शुक्ल ६, गुरूवार दि. २९ जनवरी, १९९३ को, श्वेतवर्णी, १९ इंची, पद्मासनस्थ, तीसरे तीर्थकंर व असंभव को संभव बनाने वाले श्रावस्ती के राजा प्रभु श्री संभवनाथ स्वामी की सुंदर प्रतिमा को चतुर्विध संघ की उपस्थिति में शासन प्रभावक श्री पू. आ. पद्मसूरिजी आ. ठा. के वरद हस्ते महामहोत्सव पूर्व अंजनशलाका प्रतिष्ठा हर्षोल्लास से संपन्न हुई। प्रतिवर्ष महा सुदि ६ को श्रीमान ताराचंदजी मोतीलालजी वेदमुथ्था परिवार ध्वजा चढाते है। इसी परिवार ने सन् २०१२ में २१ दिवसीय श्री सम्मेतशिखरजी आदि तीर्थो की स्पेशल ट्रेन द्वारा यात्रा करवाई।

श्री अचलचंदजी की पुत्री ने दीक्षा ग्रहण की और नया नाम सा. श्री शीलयशाश्रीजी प्राप्त कर अपने कुल व नगर का नाम उज्जवल किया है।

मार्गदर्शन : सोमेसर रेलवे स्टेशन से २४ कि.मी. दूर पिलोवणी हेतु हाईवे तक सरकारी बसें और फिर आगे प्रायवेट बस, टैक्सी व ऑटों की सुविधा प्राप्त होती है। बड़ा शहर खिंवाड़ा यहां से मात्र ७ कि.मी. और जोधपुर हवाई अड्डा ११० कि.मी. दूर है।

सुविधाएं : धर्मशाला में एक हॉल व ३ बड़े विशाल कमरे है। एक कमरे में ५० व्यक्ति सो सकते है। उपाश्रय व पूर्व सूचना देने पर भोजनशाला की सुविधा भी है।

पेढी : श्री संभवनाथ भगवान जैन पेढी ट्रस्ट

मुख्य बाजार, मु.पो. पिलोवणी, तह.रानी, जिला-पाली, राजस्थान

पेढी संपर् : ०२९३४-२४३०३६, पुजारी : मिश्रीदासजी-०८०९४९६२७८८

मुख्य व्यवस्थाप : श्री घीसुलालजी, ट्रस्टी : श्री ताराचंदजी वेदमुथ्था, चेन्नई-०९४४४७२३७००, श्री संपतराजजी – ०९४४४१४४२०५