पेरवा / Perwa

पेरवा / Perwa

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गोडवाड के प्रवेशद्वार फालना रेलवे स्टेशन से मात्र ८ कि.मी. और राष्ट्रीय राजमार्ग क्र.१४ पर सांडेराव से २० कि.मी. दूर, फालना-बिसलपुर सड़क पर अरावली पर्वतमाला की श्रृंखला में छोटी सी पहाड़ी की गोद में स्थित है ‘अति प्राचीन तीर्थ पेरवा

प्राप्त शिलालेखों के प्रमाणानुसार, यह करीब २००० वर्ष से ज्यादा प्राचीन है। नगरवासियों के अनुसार यह ५००० वर्ष प्राचीन है। महमूद गजनी और मुहम्मद गोरी के आक्रमणों में तहस-नहस हुआ।

जैन ग्रंथ सर्वसंग्रह ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ ने वि.सं. १००० के लगभग शिखरबद्ध जिनालय का निर्माण करवाकर मूलनायक श्री ८वें तीर्थंकर श्री चंद्रप्रभुस्वामी की श्वेतवर्णी पद्मासनस्थ प्रतिमा की प्रतिष्ठा की। प्रतिमा पर सं. १०१० का लेख है। यहां पहले २५ जैन, एक उपाश्रय और एक धर्मशाला थी।

पू. पंजाब केसरी आ. श्री वल्लभसूरिजी के पट्टधर आ. श्री समुद्रसूरिजी के शिष्यरत्न, प्राचीन तीर्थोद्धारक, मुनिभूषण पू. श्री वल्लभदत्त विजयजी (फक्कड़ महाराज) की मंगल प्रेरणा से, २ हजार वर्ष प्राचीन इस तीर्थ का जीर्णोद्धार, श्री जैन संघ ने लाखों रूपयें खर्च करके करवाया। इस दरमियान मंदिर के भोयरे से अष्टमंगल रूप ८ प्रतिमाएं प्राप्त हुई, जो पहली और दूसरी शताब्दी की है। इस मंदिर में संवत् १२५१ के अंकित लेख वाली, श्री विद्यादेवी की प्राचीन प्रतिमा विद्यमान है, जिसके सुंदर परिकर में १६ विद्यादेवियो की लघु प्रतिमाएं उत्कीर्ण है। सुंदर हंस पर शोभित विद्यादेवी के हाथों में पुस्तक, वीणा, पुष्पमाला आदि की जीवंत आकृतियां नयनाभिराम है। इसका अद्भुत शिल्प आबू-देलवाड़ा जैन मंदिर के समान भव्य है। जनश्रुति के अनुसार, यहा पर इस विद्यादेवी की कलिकाल सर्वज्ञ आ.श्री हेमचंद्राचार्य ने साधना (उपासना) की थी। प्रतिमा के शीर्ष भाग पर श्री जिनेश्वर भगवान की लघु प्रतिमा विराजमान है।

संडेकरगच्छीय मुंडारा-सांडेराव मंदिरों के प्रतिष्ठाचार्य, पू.आ.श्री यशोभद्रसूरिजी की पाट परंपर के आचार्य श्री गुणचंद्रसूरिजी के द्वारा, (इनकी प्रतिमा सेवाड़ी जिनमंदिर में स्थापित है) वि.सं. १२२१ में इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार व प्रतिष्ठा संपन्न हुई थी। इसके पहले भी अनेक बार जीर्णोद्धार हुए है। समस्त ऋद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री चंद्रप्रभु स्वामी के दर्शन मंगलकारी और भव भयहारी है। (भगवान महावीर जन्मोत्सव, वि.सं. २०४०, चैत्र शुक्ल १३ को, मुनिश्री ने यह जानकारी प्रदान करता लेख लिखवाया है।)

पू.आ. श्री यतीन्द्रसूरिजी द्वारा लिखित सं. १९८७ का ‘यतीन्द्रविहार-दिग्दर्शनÓ भाग-२ के पृष्ठ क्र.८३ के अनुसार… इसका जीर्णोद्धार करवाते वक्त किसी एकल विहारी अज्ञानी साधु के कहने पर यहां की मूलनायक प्रतिमा का उत्थापन कर दिया गया और जब मंदिर का काम पूर्ण हुआ तो उस प्रतिमा को बिना मुहूर्त पुन: स्थापित भी कर दिया गया। बस उसी दिन से यह तीर्थ तीन-तेरह (संकट) की नौबत में आ गया और यहां के जैनों में नाश-भाग मच गई। यहां के कई घर बाली, बिसलपुर, शिवगंज और सुमेरपुर में जाकर बस गये। बिना मुहूर्त के जिनमूर्तियों की थाप-उत्थाप करने से कितनी विपत्तियां सहनी पड़ती है, इसका यह एक प्रमुख दृष्टांत है। सं. १९८७ के आसपास यहां पोरवाल जैनों के १५ घर और एक छोटी सी दो मंजिलि धर्मशाला थी। यहां के निवासी धीरे-धीरे लुणावा, बिसलपुर  सेवाड़ी, बीजापुर, सुमेरपुर और बाली में जाकर बस गये। प्रतिवर्ष जेठ सु. ४ को श्री सुकनराजजी लुणावा वाले ध्वजा चढाते है।

मंदिर में लगे एक प्राचीन शिलालेख के अनुसार… वीर नि. सं. २४३३, शाके १८२८, वि.सं. १९६३, माघ शुक्ल १०, गुरूवार, फरवरी १९०७ के गांव पेरवा प्राग्वाट ज्ञातीय पंच समुदाय, प्रतिष्ठा महोत्सवे, सकल संघ श्रेयार्थे श्री पद्मप्रभु स्वामी, श्री शांति जिनबिंब, श्री धर्मनाथ पुन: यक्षराज, श्री विजय यक्षिणी श्री ज्वालालाजित, श्री मणिभद्रजी, ध्वजा, इडो (कलश) श्री चंद्रप्रभु स्वामी प्रासादे, जीर्णोद्धारक, श्रीमद् तपागच्छ कमल कलशाचार्य भट्टारक श्री विजय महेन्द्रसूरिजी के हस्ते प्रतिष्ठा, लिक बीजापुर निवासी यशसागरमणि…।

मंदिर के खंभों पर प्राचीन ऐतिहासिक शिलालेख अंकित थे। जीर्णोद्धार के समय अज्ञानता एवं देखरेख की कमी, व्यवस्थापकों की दुर्लक्षता और अदूरदर्शिता के चलते, इन खंबों पर नये जमाने की टाईल्स लगा दी गई, पर कुछ भाग खुला रह गया, जिसमें से लेख दिखाई पड़ रहे है, मगर इन्हें समझना मुश्किल हो गया है। नगरजनों के बीच एक दोहा प्रचलित है – पीछे पोली भाखरी, पास पेरवा ग्राम, अठे लखावत देवड़ो, ठाुर नाथूसिंह नाम

यहां की पहाड़ी के बारे में कहते है कि यह अंदर से पोकल है। पहाड़ के उपर तालाब, शिवगुडा मंदिर तथा गुफा है। गुफा में मंदिर बना हुआ है। यहां की शीतला माता काफी प्रसिद्ध है। दसवीं तक स्कूल, चिकित्सालय, बड़ी मंडी और पुलिस चौकी फालना में है। पेरवा निवासी भबूतमलजी अचलाजी के परिवार (वर्तमान में लुणावा) से मुमुक्षु ने दीक्षा लेकर अपने कुल व पेरवा का नाम रोशन किया है।

पेरवा निवासी ७० वर्षीय पुजारी और मुनीमजी श्री ओटरमलजी शिवलालजी रावल, जो पिछले ५० वर्षों से अपनी अखंड सेवा प्रदान कर रहे है, के जिम्में मंदिर और धर्मशाला की संपूर्ण देखरेख है। कभी-कभार एकाध ट्रस्टी यहां आते है। गांव में ज्यादातर राजपूत बस्ती है। होली और दिवाली यहां के प्रमुख त्योहार है। नजदीक के बांध (१० कि.मी.) जवाईबांध से यहां सिंचाई की व्यवस्था होती है।

मार्गदर्शन : यह जवाईबांध रेलवे स्टेशन (प्राचीन एरणपुरा)से मात्र १० कि.मी. फालना से ८ कि.मी., नजदीक के रेलवे स्टेशन बिरौलिया से २ कि.मी., सुमेरपुर से १८ कि.मी., बाली से ८ कि.मी. और बिसलपुर से ८ कि.मी.दूर स्थित है। यहां आवागमन के लिये बस, टैक्सी और ऑटों की सुविधा हर जगह उपलब्ध है।

सुविधाएं : मंदिर के नजदीक दो मंजिलि धर्मशाला में सादे ४ कमरे है। उपाश्रय और भोजनशाला है, परंतु पूर्व सूचना पर ही भोजन बनता है। यहां भोजन नि:शुल्क है।

पेढी : श्री चंद्रप्रभुस्वामी जैन श्वे.पेढी

पुराने रावले के पास, मु.पो.पेरवा

वाया-फालना, तह.बाली, जिला-पाली, राजस्थान

पेढी संपर् : पुजारीजी – ०९८२८६३३९२७४

ट्रस्टी : श्री भबूतमलजी, सुमेरपुर – ०२९३३ -२५४९०१