पनोता (पंता गांव, कोट-पंता) / Panota

पनोता (पंता गांव, कोट-पंता) / Panota

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राजस्थान के पाली जिले में मारवाड़ जंक्शन रेलवे स्टेशन से ५० कि.मी. और सोजत रोड रेलवे स्टेशन से ५० कि.मी. और सोजतरोड रेलवे स्टेशन से ४८ कि.मी. दूर फुलाद-देसुरी रोड पर जोजावर से १२ कि.मी. दूर मुख्य सड़क पर अरावली पर्वत की तलहटी में पवन नदी के किनारे मारवाड-मेवाड़ व गोडवाड़ की सीमा पर स्थित है एक गांव,, जिसे पंता गांव के नाम से पुकारा जाता है। इसकी मुख्य पहचान है कोट-पंता। धीरे-धीरे अपभ्रंश होते-होते इसे अब सरकारी रिकार्ड में पनोता के नाम से जाना जाता है।

यह गांव आज से ३१५ वर्ष पूर्व मारू देवासी पनजी  ने ढाणी के रूप में स्थापित किया और इन्हीं के नाम से यह पंता गांव कहलाया। आगे जाकर ये मारू देवासी पनजी के परिवार वाले जोजावर के समीप मारू देवासी की ढाणी में जाकर बस गये। खीमज माता के भक्त राजपूत सोलंकी खिमाड़ा से दो भाई पनोता में आकर बस गये। इन्हीं के वंशज विद्यमान उपर के रावले के ठाकुर भंवरसिंहजी और निचले रावले के ठाकुर जबरसिंहजी है। किन्ही कारणों से कोट सोलंकीयान गांव से जैनों का पलायन होने लगा। अत: वहां से जीरावाला परमार, जो जीरावाला तीर्थ रेवदर से कोट में आकर बसे थे।, पनोता गांव में आ गये। इसके साथ ही अनेक गोत्र परिवार, खिमाड़ा से पुनमिया परिवार आकर बसे व अन्य जैन परिवार भी यहां आकर बसने लगे। धीरे-धीरे सभी को धर्म आराधना हेतु मंदिर की आवश्यकता महसूस हुई।

जैन तीर्थ सर्वसंग्रह के अनुसार, वीर नि.सं. २४४०, शा·े १८३५, ई सन् १९१४, वि.सं. १९७० में, मूलनायक श्री आदिनाथ प्रभु के शिखरबंध जिनालय में धातु की ७ व पाषाण की ३ मूर्तिया स्थापित थी। जैनों की संख्या ६०, १ उपाश्रय व एक धर्मशाला विद्यमान थी। सं. १९७२ में प्लेग की बीमारी गांव में फैल गई। अजैनों के साथ जैन भी रोग की चपेट में आकर गांव, गांव से दूर आस-पास रहने चले गये। १०-१५ वर्षों के बाद गांव पुन: आबाद हो गया। पनोता संघ ने वि.सं. १९९४ में नया मंदिर बनवाने का निर्णय लिया व मंदिरजी नीवं रखी गई। परंतु सं. १९९६ में भयंकर अकाल पड़ा। अनाज तो सस्ता था, परंतु पशुओं के लिये घास नहीं होने से, मवेशी के मर जाने का बहुत नुकसान हुआ। उन दिनों एक रूपये में १६ सेर चावल-गेहूं मिलता था। अकाल से निपटने हेतु श्रीचंदजी परमार ने मजदूरी हेतु बावड़ी (कुआं) खुदवाना प्रारंभ किया और १२ महीने के अथक परिश्रम से सुंदर बावड़ी का निर्माण हुआ, जो देखने लायक है। इन्हीं दिनों गांव में डाका पड़ा व काफी धन-माल का नुकसान हुआ। सं. २००६ में पुन: डाका पड़ा और शेठ कुंदनमलजी शहीद हो गये। सं. २००७ में तीसरा डाका पड़ा और धन-जन की काफी हानि हुई। जैन मंदिर का कार्य सं. २०१४ में पूर्ण हुआ। प्राचीन मूलनायक भगवान आदिनाथजी की मूर्ति की प्रतिष्ठा नहीं करवाकर मेवाड़ दादावाड़ा से मौजूदा प्रभु शीतलनाथजी की मूर्ति, जो राजपूतों को कुआं खोदते वक्त १० फुट की गहराई से मिली थी, को पनोता जैन संघ ने वहां से लाकर, वीर नि.सं. २४८५, शाके १८८०, ई. सन् फरवरी १९५९ व विक्रम सं. २०१५ माह सु. १० को जोजावररत्न आ. श्री जिनेन्द्रसुरिजी के करकमलों से प्रभु की प्रतिष्ठा संपन्न ·राई।

समय निरंतर अपनी गति से चलता रहा। ५० वर्ष बीत गये। मंदिर भी जीर्ण-शीर्ण हो गया। आ. श्री पद्मसूरिजी की निश्रा में दि. १६.१०.२००० को श्रीसंघ की मीटिंग में मंदिर के पुर्ननिर्माण का निर्णय लिया गया। स्व. टेकचंदजी श्रीश्रीमाल की अध्यक्षता में समिति ने मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ किया। चांद की शीतलता व धवलता से युक्त श्वेत पाषाण से कलात्मक देवविमान तुल्य शिखरबद्ध जिनालय का निर्माण पूर्ण हुआ व ठीक ५० वर्ष बाद वीर नि.सं. २५३५, शाके १९३०, वि.सं. २०६५, ज्येष्ठ वदि ७, शनिवार, दि. १६ मई, २००९ को, आ.श्री जिनेन्द्रसूरिजी के पट्टधर प्रतिष्ठाचार्य श्री पद्मसूरिजी आ.ठा., आ.श्री आनंदघन सूरिजी के आज्ञानुवर्ती, गोडवाड बांकली रत्न आ. श्री विश्वचंदसूरिजी आ. ठा. एवं प्रवर्तिनी सा. श्री गरिमाश्रीजी की शिष्याएं आदि के वरद हस्ते आमूलचूल जीर्णोद्धारित एवं नवनिर्मित गगनचुंबी जिनालय में मूलनायक श्री शीतलनाथजी प्रभु एवं श्री पार्श्वनाथ आदि जिनबिंबों की देवी-देवताओं की मूर्तियों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा दशाहिन्का महोत्सव के साथ हर्षोल्लास से संपन्न हुई।

इस नूतन मंदिर का खनन व शिलान्यास-भूमिपूजन वि.सं. २०५८, चैत्र सुदि १०, शनिवार, दि. १३.४.२००२ को, आ.श्री. पद्मसूरिजी के हस्ते संपन्न हुआ था एवं इस मंदिर में परम तारक देवाधिदेव, भद्दीलपुरना, दादा, मूलनायक महा प्राचीन चमत्कारी श्री शीतलनाथ प्रभु आदि जिनबिंबों का, वि.सं. २०६३, आषाढ वदि पद्मसूरिजी की निश्रा में मंगल प्रवेश करवाया गया था।

गांव के उत्तर-पूर्व में पहाड़ी के पीछे शीतला माता का प्रसिद्ध स्थान है। उत्तर-पश्चिम में भगवान अकलजी का पहाड़ी पर किलेनुमा मंदिर है, जहां दीपक की लौ से केशर बनती है। भाद्रवा सुदि २ व माह सुदि २ के दिन दो वार्षिक मेले लगते है। अनके गुरू भगवंतों के पावन चरणकमलों से पावन बनी यह भूमि आतिथ्य सत्कार अर्थात अतिथियों का आदर करने हेतु प्रसिद्ध है। अनेक पुण्यशालियों ने सयंम लेकर कुल व गांव का गौरव बढाया है।

पनोता नदी पर पनोता बांध से सिंचाई की व्यवस्था, स्कूल-हॉस्पीटल, दूरसंचार, डाकबंगला, पुलिस चौकी खिवांडा, इत्यादी सारी सुविधाएं है। जैनों के कुल ४५ घरों की ३०० जनसंख्या है। गांव की कुल जनसंख्या ३००० करीब है। ७-८ अन्य यहां के प्रसिद्ध मंदिर है।

मार्गदर्शन : पनोता तीर्थ फुलाद- देसुरी मुख्य सड़क पर जोजावर से १२ कि.मी. दूर है। यहां से सोजत रोड रेलवे स्टेशन ५० कि.मी., सरकारी बस स्टैंड देसुरी २२ कि.मी., उदयपुर हवाई अड्डा १२५ कि.मी. और खिवांडा से १० कि.मी. की दूरी पर स्थित है। फुलाद-देसुरी-मारवाड़ जंक्शन-जोजावर से बस-टैक्सी की सुविधाएं है।

सुविधाएं : दो धर्मशालाओं में २ हॉल, ३ कमरों की सुविधा है एवं भोजनशाला की उत्तम व्यवस्था उपलब्ध है। भोजनशाला भवन के साथ पेढी कार्यालय बना है।

पेढी : श्री शीतलनाथ जैन देरासर पढी

मु.पो. पनोता-३०६०२२, तहसील-देसुरी, वाया-जोजावर, मारवाड़ जंक्शन, जिला-पाली, राजस्थान

पेढी संपर्: ०२९३४-२८२१५७, श्री मोहनलालजी-०९६४९६१९९९१

ट्रस्टी अध्यक्ष : श्री चंपालालजी मैसूर – ०९८४५७९०३००, श्री पारसमलजी, मद्रास-०९४४४८६४११९