कोट सोलंकियान (अचलदुर्ग-पाटण-अचलगढ) / Kot Solankiyan

कोट सोलंकियान (अचलदुर्ग-पाटण-अचलगढ) / Kot Solankiyan

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राजस्थान के पाली जिले में देसुरी से फुलाद जाने वाली मुख्य सड़क पर मगरतलाव से ४ कि.मी. दूर दीवेर फाटे से दायीं तरफ दीवेर जानी वाली सड़क पर २ कि.मी. की दूरी पर पुन: बायी तरफ कोट फाटे से एक कि.मी. जाने पर नदी के किनारे व अरावली पहाडिय़ों की गोद में बसा है नूतन ोट सोलंियान’।

इतिहास े पन्नों से : मारवाड़ जंक्शन के समीपवर्ती व मारवाड़ – मेवाड़ – गोड़वाड़ की सीमा पर श्री नाकोडा पार्श्वनाथ प्रभु के अति प्राचीन एवं ऐतिहासिक पंचतीर्थी जिनमंदिर में प्रथम प्रतिष्ठा प्राय: विक्रम सं. ११०, फाल्गुन शुक्ल ३ के शुभ दिन श्री जिनेश्वर भगवंत बिंबों की हुई थी। उसके बाद इस प्राचीन जिन मंदिर का प्रथम जीर्णोद्धार, वि. सं. १२९९, चैत्र शुक्ल-१३ को एवं दूसरा जीर्णोद्धार वि.सं. १४७५, आषाढ़ शुक्ला ३ को, महाराणा लाखा के राज्यकाल में हुआ था। तीसरा जीर्णोद्धार वि. सं. १७४७ में श्री संघ के सहयोग से हुआ था।

कालांतर में जीर्ण चैत्य का जीर्णोद्धार संपन्न करवाकर, श्री संघ द्वारा पू. तपा. शासन प्रभावक आ. श्री जिनेन्द्रसूरिजी (जोजावर रत्न) आ.ठा. के करकमलों से, वीर नि. सं. २४८१, शाके १८७६, ई. सन् १९५५, वि.सं. २०११, फाल्गुन शुक्ल ११ के शुभ दिन, श्वेतवर्णी २१ इंची पद्मासनस्थ श्री नाकोडा पार्श्वनाथ प्रभु आदि जिन बिंबों की प्रतिष्ठा संपन्न हुई थी। पहले प्रभु की पहचान श्री चिंतामणी पार्श्वनाथ के नाम से थी।

वि.सं. २०३७ में जिनालय की वर्षगांठ पर, आ.श्री पद्मसूरिजी आ.ठा. ने जिनालय की जीर्णावस्था देख श्री संघ को शीघ्र ही जीर्णोद्धार की प्रेरणा दी। श्री संघ ने भी तत्परता से आदेश को स्वीकार किया और जिनालय का संपूर्ण आमूलचूल जीर्णोद्धार करवाकर, श्वेत आरस पाषाण से शिखरबद्ध, बेनमून, भव्यतम् जिन मंदिर (प्राय: ५१ फीट की ऊँचाई) का निर्माण परिपूर्ण करवाया। पांच शिखरों से युक्त प्राचीन अचल दुर्ग की पंचतीर्थी के समान इसमें पांच मंदिर बनवाकर इसे पंचतीर्थी का रूप दिया गया है। कोट के नवनिर्मित मंदिर के दो द्वार रखे गये है, जिनमें एक द्वार पूर्व दिशा में है, जबकि मुख्य द्वार उत्तर दिशा में है। मंदिर में अचल दुर्ग के मंदिरों की प्राचीन प्रतिमाओं को यहां स्थापित किया गया है, जिसमें नये मंदिर में श्रेयांसनाथजी (अभी सुमतिनाथजी) की गुलाबी वर्ण की प्रतिमा के बारे में कहा जाता है कि यह प्रतिमा दिन में अनेक भाव प्रदर्शित करती है।

भव्य शिल्पकलाओं से नवनिर्मित सुरम्य गगनचुंबी, शिखरोपरि देवाधिदेव परम तारक प्राचीन श्री पार्श्वनाथादि जिनबिंब, प्रथम मंजिल पर विश्ववत्सल २० वें तीर्थंकर श्री मुनि सुव्रत स्वामी आदि जिनबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, प्राचीन प्रतिष्ठाचार्य श्री जिनेन्द्रसूरिजी के पट्टधर शिष्य आ. श्री पद्मसरिजी आ.ठा. की पावन निश्रा में वीर नि.सं. २५१९ शाके १९१४, वि.सं. २०४९, वैशाख शुक्ला १४, बुधवार, चित्रा नक्षत्रे दि. ५ मई, १९९३ को, प्रात:९.४८ बजे सिद्धियोग पर हर्षोल्लास से संपन्न हुई।

इसी दिन आ. श्री जिनेन्द्रसूरिजी की गुरू प्रतिमा की प्रतिष्ठा भी संपन्न हुई। प्रतिष्ठा पूर्व फा.सु. ११, गुरूवार, दि. ४.३.१९९३ को वर्षगांठ के अवसर पर श्री पारेख विहार  भवन का विजय मुहूर्त में उद्घाटन हुआ। १६वीं प्रतिष्ठा वर्षगांठ के अवसर पर वि.सं. २०६५, ज्येष्ठ वदि एकम, शनिवार, दि.१० मई, आदिनाथादि जिनबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न हुई।

जैन तीर्थ सर्व संग्रह के अनुसार, श्री संघ द्वारा सं. १५०० के लगभग ५२ जिनालय मंदिर का निर्माण करवाकर, मूलनायक प्राचीन चिंतामणी पार्श्वनाथ सह पाषाण की ८१ व धातु की २२ प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हुई थी। सं. २०११ तक जिनालय पूर्ण रूप से जीर्ण हो चुका था।

प्राचीन भग्नावेश : जैन संस्कृति कितनी प्राचीन है, इसके प्रमाण यहां कि मंदिरों से मिलते ही है, साथ ही कुछ ऐसे भी स्थान है जहां बिखरे हुए प्राचीन भग्नावेश भी इसके साक्षी है कि हजारों वर्ष पूर्व भी यहां जैन संस्कृति अपने पूर्ण वैभव पर थी, ऐसा ही एक स्थान है – कोट सोलंकियान। वर्तमान कोट गांव के पास बहने वाली नदी के उस पार, अरावली के टेकरियों के बीच बिखरे हुए खंडहर में, मौजूद जैन मंदिरों के भग्नावेश और विशाल बावडिय़ों से ज्ञात होता है कि कभी यहां जैनों की बड़ी नगरी थी। इस नगरी को अचलदुर्ग पाटण के नाम से पुकारा जाता था, जिसमें राणकपुर जैसे पांच जिनमंदिर और चार बावडिय़ा थी। इसलिये इसको कोट पंचतीर्थी के नाम से आज भी पुकारा जाता है। दुर्ग को कोट भी कहा जाता है, इसलिये अचलदुर्ग के ध्वंस हो जाने के बाद बसे, नये गांव का नाम ‘कोट’ रखा गया होगा।

अचलदुर्ग पाटण की पंचतीर्थी दो हजार वर्ष पूर्व की बताई जाती है, जो प्राकृतिक प्रकोप के कारण ध्वंस हुई थी और एक मतानुसार सोमनाथ जाते मोहम्मद गजनी की लूट तथा तोडफ़ोड़ की शिकार हुई। इस पंचतीर्थी में से एक मंदिर का सभा मंडप और गर्भगृह का कलापूर्ण द्वार आज भी वैसे ही विद्यमान है। खंभो पर जगह-जगह जीर्ण शिलालेख उत्कीर्ण है, जो यहां की प्राचीनता की कहानी कहते है। ८०० के करीब जैन परिवारों की कभी यहां बस्ती थी और ५२ जिनालय मंदिर था।

भीलाड (जिला-वलसाड, गुजरात) के नंदीग्राम तीर्थ के मूलनायक की प्रतिमा कोट सोलंकियान की हुआ करती थी। चमत्कारिक रूप से वह कोट से अदृश्य हो गई एवं किसी सेठ को सपना आया कि अगले दिन नींबू की टोकरी लेकर आने वाले किसान से टोकरी प्राप्त करना जिसमें से तुम्हे प्रतिमा प्राप्त होगी। ठीक उसी तरह प्रतिमा प्राप्त हुई। सेठ धनराजजी (शायद एन्दलागुढा निवासी) ने भीलाड में जमीन भेंट कर तीर्थ का निर्माण करवाया।

दादर कबूतरखाना (मुंबई) के श्री शांतीनाथजी भी कोट के ही है। कोट से इस तरह करीब १५० से अधिक प्रतिमाएं बाहरगांव में विराजमान की गई। यहां के ५२ जिनालय को जीर्णोद्धार के वक्त पंचतीर्थी में समावेश किया गया। कोट से ४५ प्रतिमा – तलाजा तीर्थ, ३ प्रतिमा सुमेरपुर बोर्डिंग, ३ सेंधवा (म.प्र.) १ मद्रास नेहरू बाजार में प्रतिष्ठित हुई।

स्थानीय रहिवासी श्री आनंदजी जैन के अनुसार २६ वर्षों पहले कुंआरेपन में, अधिष्ठायकदेव द्वारा सपने में दर्शन पाकर आप लालटेन लेकर सपने के अनुसार दर्शन हेतु प्राचीन मंदिर की तरफ चले। मंदिर के पास अचानक बहुत बड़े काले नाग ने आकर लालटेन पर झपट्टा मारा और उसे बुझा दिया और मानव स्वर में कहा कि यहां घासतेल का दीया नहीं जल सकता। जेठ सुदि ६ को दीये जलते देखे एवं उन्हें भोयरे में कतार से प्रतिमाएं विराजमान नजर आई और पूजा हर रोज होती हो ऐसा महसूस हुआ।

गांव वालों के अनुसार करीब २००० वर्षों के बाद ऐसा अवसर आया कि आ. श्री यशोवर्मसूरिजी आ.ठा. १२५ (साधु-साध्वीजी) एवं श्रावक-श्राविकाओं को साथ बाजे-गाजे के साथ जब यहां पधारे तो उन्होंने पुराने खंडहर मंदिर का निरीक्षण किया। चारो ओर फेरी लगाई तथा मंत्रोच्चार करके अधिष्ठायक देव को प्रकट किया, तब एक महिला (जो अध्यक्ष कुंदनमल की पत्नी थी) को दृष्टांत किया। करीब दो घंटे तक वह बेहोश हालत में थी। होश में आने पर उन्होंने बताया के क्या हुआ वह मालूम नहीं। सिर्फ इतना पता है कि एक बड़ा काला नाग उनसे लिपट गया और बांध दिया (नागपाश)। १०० वर्ष बाद यहां मु.श्री जयरत्न विजयजी का चातुर्मास हुआ है। प्रति वर्ष वैशाख सुदि १४ को श्री कुंदनमलजी अंबालालजी परिवार ध्वजा चढाते है।

ोट सोलंियान : कोट नदी के किनारे बसे नगर में कुल २२ घर व ५०० की जैन संख्या है। गांव की कुल जनसंख्या १२५० है। १२वीं तक स्कूल, सरकारी हॉस्पीटल, कोटबांध, संचार व्यवस्था, ग्राम पंचायत, पुलिस थाना-खिंवाडा, इत्यादी सुविधाएं उपलब्ध है। प्रसिद्ध कुलदेवी ‘खिमज माता मंदिर’ यहां से ५ कि.मी. दूर स्थित है। यहां के आमलेश्वर महादेव मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा वि. सं. २०६६, वै.सु.१३, गुरूवार, दि. ७.५.२००९ को श्री वासुदेवजी महाराज के सानिध्य में संपन्न हुई।

मार्गदर्शन : फुलाद-देसुरी मुख्य सड़क पर नया गांव व चौराहा से ३ कि.मी. अंदर दिवेर रोड पर कोट स्थित है। मारवाड़ जंक्शन, सोजत रोड, सोमेसर रेलवे स्टेशन से यह नजदीक है। जोधपुर हवाई अड्डा यहां से १३० कि.मी. दूरी पर है। यहां आवागमन के लिये बस, टैक्सी और ऑटों की सुविधा है।

सुविधाएं : दो धर्मशालाओं में कुल ७ कमरे व छोटे-बड़े ३ हॉल है। दो बड़े उपाश्रयों में साधु-साध्वियों की व्यवस्था होती है। ३०० लोगों हेतु बिसतर के पूरे सेट उपलब्ध है। नियमित भोजनशाला की सुविधा है।

पेढी : श्री पार्श्वनाथ जैन देवस्थान पेढी

मु.पोस्ट-कोट सोलंकियान-३०६०२२

देसुरी-दिवेर रोड, वाया-जोजावर, तह.देसुरी, जिला-पाली (राजस्थान)

पेढी संपर्क : ०२९३४-२१७०१२, पुजारी : नवीन/दिलीप-०७६६५३६८२३८

श्री आनंदराजजी – ०९७८३०३०१७९

अध्यक्ष : श्री कुंदनमलजी, मुंबई-०९८६९८७४०१६