खिंवाड़ा(खिंमाड़ा, चंपावंतारों) / Khiwada

खिंवाड़ा(खिंमाड़ा, चंपावंतारों) / Khiwada

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मरूधर की पावन पवित्र वीरभूमि के गोड़वाड़ क्षेत्र में सोमेसर रेलवे स्टेशन से २५ कि.मी. व रानी स्टेशन से ३० कि.मी. दूर अरावली पर्वत श्रृंखला की तलहटी में पश्चिम, दिशा में सुकडी नदी के किनारे एवं रानी, देसुरी, सोमेसर एवं मारवाड़ जं. स्टेशन जैसे प्रमुख स्थानों के मध्य बसा है खिंवाड़ा’ गांव, जो खिंमाड़ा चंपावंतारों के नाम से भी प्रसिद्ध है।

संभवत: ७७० वर्ष पूर्व खीमा नामक रबाड़ी (राईका) ने ग्राम ठाकुरजी का गुड़ा से आकर यहां अपना बाड़ा बनाया और गांव की नींव डाली। ई. १२०० से १२५० के मध्य सोनिगरा चौहान, राठौड़ (जैतावत) एवं उदावत राजपूतों के अधीन इसने गांव का रूप धारण किया। इसकी निशानी स्वरूप एक पौराणिक छत्री स्थानीय विद्यालय के सामने है। पाली के महाराज श्री प्रेमसिंह चौपावत ने ई. सन १८३६ में अपने पुत्र जगतसिंह चौपावत को, जो १२ गांव दिये थे, उसमें खिंवाड़ा भी था। आगे जगतसिंह चौपावत के सुपुत्र श्री प्रतापसिंह ने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ई. सन १९५५ में ३० बीघा जमीन शिक्षण संस्था हेतु दान में दी। पश्चात इसके वंशज श्री राजेन्द्रसिंहजी ने ७ बीघा जमीन, अस्पताल व कन्याशाला के लिये प्रदान की। आगे इसी भूमि पर श्री कमलेशजी श्रीश्रीमाल ने माता-पिता की स्मृति में भव्य अस्पताल व कन्याशाला का निर्माण करवाकर राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री भैरोंसिंहजी शेखावत द्वारा दि. १२ मई १९९७ को उद्घाटन करवाया।

जैन तीर्थ सर्वसंग्रह ग्रंथ के अनुसार, उस समय गांव के बाजार में एक शिखरबद्ध जिन मंदिर था, जिसमें मूलनायक श्री शांतिनाथजी सह पाषाण की ३ एवं धातु की ४ प्रतिमाएं स्थापित करवाई थी। पहले यहां २०० जैन और एक धर्मशाला थी। इसी प्रकार ७० वर्ष पूर्व प्रकाशित मेरी गोडवाड यात्रा पुस्तक के मुताबिक १ जिनालय में मूलनायक श्री शांतिनाथजी प्रभु, १ धर्मशाला व ओसवालों के १०० घर विद्यमान थे।

वर्तमान में खिंवाड़ा गांव में एक शिखरबद्ध जिनालय है, जिसमें वि. सं. १५६८, माघ शु. ४ (भृगौ), शुक्रवार को प्राचीन श्री सुमतिनाथजी मूलनायक जिनबिंब, नूतन अंजनशलाका कृत मूलनायक श्री नमिनाथदि जिनबिंब जिनालय पर शिखरोपरि सुवर्ण-दण्ड ध्वजा व कलशरोहाणादि सह प्रतिष्ठित थी। प्रतिमा पर चित्रांकित लेख अनुसार यह प्रतिमा अति प्राचीन राजा संप्रतिकालीन प्रतीत होती है।

कालांतर में मंदिर का जीर्णोद्धार व पुन: प्रतिष्ठा विद्यानुरागी सौजन्य मूर्ति महाप्रभावक तपागच्छीय जैनाचार्य श्रीमद् विजय जिनेन्द्रसुरीश्वरजी के पट्टधर, ज्योतिष शिल्पज्ञ श्रीमद् विजय पद्मसूरीश्वरजी आदि ठा. की निश्रा में वीर नि. सं. २५०५, शाके १९०१, वि .सं. २०३५, ज्येष्ठ वदि ७, शुक्रवार, दि. १-९-१९७९ को सुबह १० बज·र २१ मिनट के शुभ मुहूर्त में संपन्न हुई व इसके अंतर्गत प्राचीन श्री सुमतिनाथजी की पद्मासन में श्वेत पाषाण से निर्मित प्रतिमा सह, सुपार्श्वनाथ, कुंकुनाथादि प्रतिमाएं स्थापित की गई। प्रति वर्ष शा. देवराजजी भिकमचंदजी पुनमिया परिवार ध्वजा चढाते है। वि. सं. २०३५ की प्रतिष्ठा के अनेक वर्ष बाद श्री नाकोडा भैरूजी की स्थापना वि. सं. २०४६, ज्येष्ठ सुदि ९, शनिवार को हुई। संभवत: इसी के साथ प.पू. आ. भ. श्रीमद् विजय पद्मसरीश्वरजी आदि ठा. की प्रेरणा व मार्गदर्शन से वि. सं. २०४६ में श्री सुमति आराधना भवन का निर्माण प्रारंभ हुआ। आगे वि. सं. २०५८, मगसर वदि ९, रविवार दि. ९.१२.२००१ से मगसर सुदि २, रविवार दि. १६-१२-२००१ तक प.पू. योग दिवाकर आचार्य श्री आनंदघनसूरीश्वरजी आ. ठा. की निश्रा में व सकल संघ की उपस्थिति में आयोजित लघुशांतिस्नात्र आदि का अष्टाह्निका महोत्सव के अवसर पर आराधना भवन का उद्घाटन संपन्न हुआ।

ज्योतिष शिल्पज्ञ श्रीमद् विजय पद्मसूरीश्वरजी आदि ठा. व साध्वी भगवंतों का वि. सं. २०५९, आषाढ सुदि १० को चातुर्मास हेतू मंगल प्रवेश हुआ।

वि. सं. २०६५, ज्येष्ठ वदि ८, रविवार, दि. १७-५-२००९ को ज्योतिष शिल्पज्ञ श्रीमद् विजय पद्मसूरीश्वरजी आदि ठा. की निश्रा में श्री आदिनाथ भगवान, श्री नाकोडा भैरवदेव के दर्शनार्थ मूर्ति स्थापना व भैरव पूजन सह हर्षोल्लास से संपन्न हुई।

संयम पथ : गांव खिंवाड़ा के इतहास में जैन श्वे. मू.पू. संघ में प्रथमत: यहां के निवासी श्री केशरीमलजी डायचंदजी पुनमिया ने ३२ वर्ष की युवा उम्र में पू. आ. श्री कैलाशसागरसूरीश्वरजी की निश्रा में सं. २००६, ज्येष्ठ सुदि ५, को बीजापुर (गुजरात) में दीक्षा ग्रहण की व पू. मु.श्री कंचनसागर विजयजी नाम धारण किया। आपश्री ने २९ चातुर्मास मुंबई में किये। इसी प्रकार गांव की अनेक श्राविकाओं ने भी संयम पथ को स्वीकार कर कुल का नाम रोशन किया है।

वर्तमान में यहां जैन समाज की ४०० ओली (होती) एवं जैन संख्या २००० के करीब है। गांव की कुल जनसंख्या १०००० के लगभग है। श्री तेरापंथी संघ व श्री जैन सकल संघ, ये संस्थाएं कार्यरत है। ई. सन १९९८ तथा २०१० में, ग्रामवासियों द्वारा खिवाड़ा पता-निर्देशि कर प्रकाशन हुआ है।

ग्राम खिंवाड़ा उत्तर गोड़वाड़ की सबसे बड़ी व्यापारिक मंडी है और लगभग २५० ग्रामों से इसके व्यापारिक संबंध जुड़े है। यहां राजकीय माध्यमिक विद्यालय, कन्या विद्यालय, हॉस्पीटल, पुलिस थाना, कोलार बांध से सिंचाई, दूरसंचार, डाकघर व ग्रामीण बैंक आदि सुविधाएं है। महादेवजी, महालक्ष्मी माताजी, क्षेत्रपालजी, शनिश्वरजी इत्यादि अन्य मंदिर यहां पर है। विशेष यहां पर बालाजी (हनुमानजी) महाराज का प्राचीन मंदिर अत्यंत चमत्कारी है। प्रतिवर्ष चैत्र सुदि १३ को, यहां पर आयोजित बालाजी मेला बहुत प्रसिद्ध है।

मार्गदर्शन : यह राष्ट्रीय महामार्ग क्र. १४ से ६३ कि.मी., सोमेसर से २५ कि.मी., रानी से ३० कि.मी., मारवाड़ जं. से ३८ कि.मी., जोधपुर हवाई अड्डे से १४० कि.मी. दूर स्थित है। यहां के लिये, रानी, देसुरी, सोमेसर एवं मारवाड़ जं. स्टेशन से ३८ कि.मी. दूर खिंवाड़ा हेतु बस, टैक्सी जैसे साधन हमेशा उपलब्ध रहते है।

सुविधाएं : मंदिर के पास १ दोमंजिला धर्मशाला है, जिसमें ४ कमरें २ हॉल है। न्याति नोहरा, उपाश्रय व तेरापंथी भवन विद्यमान है। भोजनशाला की सुंदर सुविधा है। ५० बिस्तर के पूरे सेट उपलब्ध है।

पेढी : श्री सुमतिनाथ जैन देवस्थान पेढी

मेन रोड, मु.पो.खिंवाडा-३०६५०२, तह. रानी, जिला-पाली, राजस्थान

पेढी संपर् : ०२९३४-२४८७६६, ०९९५०३९३८०७

पुजारी : अशोक वैष्णव – ०९९५००१३४३७, ०८३८७८०३६५७

ट्रस्टी : श्री महावीरचंदजी पुनमिया, ठाणे (महाराष्ट्र)-०९८२१०९०४२६

ट्रस्टी : श्री अमरचंदजी डागा, भायंदर (महाराष्ट्र) – ०९३२४५९७०७०