जाणुंदा / Janunda

जाणुंदा / Janunda

SHARE

 

थार को अपने गर्भ में रखने वाला राजपुताना की आन-बान और शान का गौरवशाली राज्य राजस्थान के पाली जिले में अहमदाबाद-नई दिल्ली पश्चिम रेलवे मार्ग पर स्थित मारवाड़ जंक्शन से मात्र २० कि.मी. की दूरी पर अरावली पर्वत श्रृंखलाओं से निकलने वाली विशाल नदी लीलावती के प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित तट पर अवस्थित है जाणुंदा

जनसंख्या के दृष्टिकोण से यहां की जनसंख्या ३००० के करीब है, जिसमें जैन बंधुओं की संख्या ३०० के करीब है। नाहर, राठौड़, गुंदेचा व भंडारी परिवार के मूल १०-१२ परिवारों के आज वर्तमान में देशभर में फैले चौके के हिसाब से सभी संप्रदाय के करीब ५० परिवार है। आपसी तालमेल, भाईचारा, सहृदयता, एकता आदि विशिष्ट गुणों के कारण ही गांव के ११५ वर्ष प्राचीन मूलनायक श्री शांतिनाथ परमात्मा के जीर्ण-शीर्ण हुए जिनालय की जगह श्वेत पाषाणों से निर्मित एवं अद्वितीय जिनप्रासाद का जीर्णोद्धार सह नवनिर्माण हुआ है, जिसमें मूलनायक श्री धर्मनाथ प्रभु विराजमान हुए है।

गांव के अन्य धर्मावलंबियों के भी अनेक पूजा स्थल है, जिनमें हनुमान मंदिर, चामुंडा माता, महादेवजी, रामदेवजी की बगीची एवं चारभुजा का मंदिर मुख्य है। चारभुजा मंदिर के बारे में ऐसे प्रमाण एवं साक्ष्य मिले है कि यह मंदिर करीब ११०० वर्ष पूर्व जैन राजा संप्रति द्वारा निर्मित किया गया था। कालांतर में मुगलों द्वारा मूर्तियों को खंडित कर देने के कारण कई वर्षों तक यह मंदिर उपेक्षित बना रहा, तत्पश्चात जैनेतरों की बहुलता के कारण इसे चारभुजा के मंदिर के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। आज भी मंदिर में भगवान महावीर स्वामी की खंडित प्रतिमा साक्ष्य के रूप में प्रमाण दे रही है। तेरापंथ की बहुलता वाले इस नगर में श्री संघ द्वारा जीर्णोद्धारित शिल्पकला युक्त, श्वेत संगमरमर से निर्मित नूतन भव्य-दिव्य कलात्मक शिखरबद्ध जिन प्रासाद में वीर नि.सं. २५३८, शाके १९३३, वि.सं. २०६८ के माघ सुदि ६, रविवार, दि. २९ जनवरी २०१२ को प्रात: मंगल वेला में गच्छाधिपति शांतिदूत आ. श्री नित्यानंदसूरिजी, अखंड वर्षीतप तपस्वी आ. श्री वसंतसूरिजी आ.ठा ४ के वरद हस्ते, नूतन मूलनायक १५वें तीर्थंकर श्री धर्मनाथ प्रभु की श्वेतवर्णी २१ इंची पद्मासनस्थ के साथ अनेक जिनबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, चतुर्विध संघ सह हर्षोल्लास से संपन्न हुई। प्राचीन मूलनायक श्री शांतिनाथ प्रभु को, प्रथम मंजिल पर प्रतिष्ठित किया गया। ध्वजा के लाभार्थी श्री केवलचंदजी जुहारमलजी राठौड़ परिवार है।

जैन तीर्थ सर्वसंग्रह ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ जाणुंदा द्वारा वि. सं. १९५२ में घूमटबंध जिनालय का निर्माण करवाकर, मूलनायक श्री शांतिनाथ प्रभु की प्रतिमा को प्रतिष्ठित किया गया। प्रतिमा लेख सं. १९५१ का है। सं.१९५१ में वरकाणा तीर्थ पर ६०० प्रतिमाओं की अंजनशलाका माघ शु.५ को भट्टारक श्री राजसूरिजी के हाथों हुई थी, शायद यह प्रतिमा भी तभी की हो सकती है। श्री संघ अनुसार ११८ वर्ष पूर्व प्रतिष्ठाचार्य श्री लब्धिसागरजी (यति) के हाथों स्थापित है।

श्री मांगीलालजी नाहर की सुपुत्री शकुंतला ने सन् १९९० में युगप्रधान श्री तुलसी के करकमलों से श्रमणी दीक्षा ग्रहण की और आज सा. श्री श्रद्धाप्रज्ञाजी के नाम से प्रसिद्ध है। गांव की नदी पर के पुल (सेतु) को सरकार ने आचार्य महाश्रमण सेतु नामकरण किया है। श्री श्वेतांबर नवयुव जैन मंडल जाणुंदा श्री संघ की सहयोगी संस्था है।

मार्गदर्शन : यह मारवाड़ जंक्शन रेलवे स्टेशन से २० कि.मी. खिंवाड़ा से ९ कि.मी., धनला से ८ कि.मी., जोजावर से १६ कि.मी. दूर स्थित है। यहां के लिये बस, टैक्सी और ऑटों की सुविधा है।

सुविधाएं : तेरापंथ सभा भवन, पुरानी धर्मशाला, भोजनशाला के साथ ही नवनिर्मित श्री संघ का कार्यालय आदि सभी सुविधाएं है।

पेढी : श्री श्वेताम्बर जैन संघ

मु.पो. जाणुंदा-३०६०२१, तहसील व वाया-मारवाड़ जंक्शन, जिला-पाली, राजस्थान

पेढी संपर् : ०२९३५-२६८०११,

पुजारी : श्री हसमुख भाई-०८२९००१५०७४

ट्रस्टी : श्री केवलचंदजी राठौड़, चेन्नई-०९३८१०१४४४५, श्री देवराजजी नाहर, बैंगलोर – ०९५०००९४८९१