देवली पाबूजी (राणाजी की देवली) / Devli Pabuji

देवली पाबूजी (राणाजी की देवली) / Devli Pabuji

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राजस्थान, जो वीरों और दानवीरों की यशोगाथा से इतिहास के पृष्ठों पर नई क्रांति लाने वाला आन-बान-शान का गौरवशाली राज्य कहलाता है, के पाली जिले के गोड़वाड़ क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर मिलने वाले जोधपुर-उदयपुर मेगा हाईवे क्र. ६७ पर मंडली गांव से वाया सोमेसर रेलवे स्टेशन से १४ कि.मी. दूर मुख्य हाईवे पर अरावली पर्वतमाला की सुरम्य पहाडिय़ों की गोद में ९०० वर्ष प्राचीन गांव बसा है देवली पाबूजी, जिसे कभी राणाजी ी देवली’ भी कहा जाता था।

गांव में १०८ जैन परिवार व अजैनों के ६०० घर-परिवार है। यहां जैन समाज के परिवारों को आपसी सद्भावना, जिनशासन कायों में समर्पण की भावना अद्भुत एवं अलौकिक भव्यता की ज्योत प्रज्जवलित करती है। वर्तमान प्राचीन जिनमंदिर में मूलनायक श्री शांतिनाथजी प्रतिष्ठित है।

जैन तीर्थ सर्वसंग्रह ग्रंथ के अनुसार, राणाजी की देवली में, श्री संघ ने बाजार मे घूमटबंद जिनालय का निर्माण करवाकर वीर नि.सं. २४६०, शाके १८५५, वि.सं. १९९०, ई. सन् १९३४ में मूलनायक श्री शांतिनाथजी सह पाषाण की २ व धातु की ८ प्रतिमाएं स्थापित करवाई। पूर्व में यहां १२० जैनी, एक उपाश्रय व एक धर्मशाला भी थी। मेरी गोडवाड यात्रा पुस्तक के अनुसार, ७० वर्ष पूर्व नगर में मूलनायक श्री शांतिनाथजी का एक मंदिर, एक उपाश्रय, एक धर्मशाला व ओसवालों के ३० घर विद्यमान थे।

अतीत से वर्तमान : प्राचीन जिनमंदिर की प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २४७४, शाके १८६९, वि.सं. २००४, महासुदि ५ (वसंतपंचमी), रविवार, फरवरी १९४८ को यतिश्री लब्धिसागरजी (बांतवाला) के हस्ते संपन्न हुई थी। इसी मुहुर्त में प्रतिष्ठित श्री मणिभद्रवीर प्रतिमा लेख से यह जानकारी प्राप्त होती है, जिसके पहले भगवान धर्मशाला में विराजमान थे।

मेवाड़ केसरी आ.श्री हिमाचलसूरिजी के शिष्यरत्न पू. पंन्यास श्री रत्नाकरजी विजयजी गणि एवं पू. साध्वीजी श्री गरिमाश्रीजी की शिष्या पू. सा. श्री ज्येष्ठप्रभाश्रीजी (देवली की संसारिक कुलवधु) की सद्प्रेरणा से मंदिर का सुंदर रूप से जीर्णोद्धार करवाकर श्वेतवर्णी, ११ इंची, पद्मासनस्थ, प्राचीन मूलनायक १६वें तीर्थकंर श्री शांतिनाथ प्रभु व गुरू गौतमस्वामी चरणपादूका व जिनप्रासाद पर नूतन-दण्ड-ध्वजा-कलशारोहण एवं अधिष्ठायक देवी-देवताओं आदि प्रतिमाओं की महामंगलकारी, ११ दिवसीय महामहोत्सव, धर्मदिवाकर, पू. आ. श्री सुशीलसूरिजी व गणिवर्य मु.श्री जिनोत्तम विजयजी आ.ठा. की पावन निश्रा में वीर नि.सं. २५१६, शाके १९११, वि.सं. २०४६ वर्षे, ज्येष्ठ कृष्ण ६, बुधवार, दि. ७ मई १९९० को प्रतिष्ठा संपन्न हुई। प्रतिवर्ष ध्वजा श्रीमान रताजी परमार परिवार चढाते है।

श्री विमलनाथजी मंदिर : पू.सा.श्री विश्वपूर्णाश्रीजी के उपदेश से एवं पू.सा. श्री ज्येष्ठप्रभाश्रीजी की पावन प्रेरणा से नवनिर्मित नूतन गृह मंदिर में परमतारक १३वें तीर्थंकर मूलनायक श्री विमलनाथ प्रभु व गुरू गौतमस्वामी, श्री सुधर्मास्वामीजी, अकबर प्रतिबोधक, जगतगुरू श्री हीरसूरिजी व योगीराज श्री शांतिसूरिजी म.सा. के गुरूबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, वीर नि.सं. २५३८, शाके १९३३, वि.सं. २०६८, वैशाख सुदी ७, शनिवार, दि. २८.४.२०१२ को गच्छाधिपति शांतिदूत श्री नित्यानंदसूरिजी आज्ञानुवर्ती ज्योतिष सम्राट, साहित्यकार, ओजस्वी वक्ता पू.आ.श्री यशोभद्रसूरिजी आ.ठा.सा.श्री लेहरो म.सा. की शिष्या सा. श्री विश्वपूर्णाश्रीजी सह चतुर्विध संघ की उपस्थिती में पंचाह्निका महोत्सव पूर्वक संपन्न हुई। सा. श्री ज्येष्ठप्रभाश्रीजी ने इस मंदिर के निर्माण हेतु स्वयं श्री अभिग्रण धारण किया था।

संयम पथ : पांच श्राविकाओं ने दीक्षा अंगीकार कर, संयम मार्ग पर आरूढ होकर अपने कुल व गांव का गौरव बढाया है। पू. सा. श्री विश्वपूर्णाश्रीजी, सा.श्री ज्येष्ठप्रभाश्रीजी, सा.श्री आगमरशाश्रीजी, सा.श्री निर्मोहपूर्णाश्रीजी, सा. श्री अक्षयदर्शनाश्रीजी, जिनशासन को समर्पित देवली पाबूजी के अनमोल रत्न है।

जहां न पहुंचे गाड़ी, वहां पहुंचे मारवाड़ी’

उपरोक्त लोकोक्ति अनुसार, जैन समाज के लोग व्यापार हेतु देश के कोने-कोने में रोजगार की तलाश में पहुंच गये, मगर उनके हृदय के तार सदा यहां से जुड़े रहे, जिसका सुखद परिणाम उनके द्वारा गांव में बनवाये गये अस्पताल, पशु चिकित्सालय, सेकेंडरी स्कूल, बालिका विद्यालय, धर्मशाला, न्याति नोहरा, जैन भवन, पानी की सुविधा इत्यादी जैसी विशेष उपलब्ध्यिां है। चौधरी समाज ने भी सुंदर जिजिवड गौशाला’ बनाई है।

गांव के अन्य पूजा स्थलों में श्री हनुमानजी का चमत्कारी मंदिर, खेडा माताजी, महादेवजी, रामदेवजी, अंबे माताजी आदि कई मंदिर है। यहां पाबूजी थोन करके एक प्राचीन स्थल है। उनकी भारी ख्याति है। देश विदेश से यात्री यहां दर्शनार्थ आते है। लोककथा है कि लगभग ३०० वर्ष पूर्व एक पाबूजी ने राणाजी की कोई इच्छा पूर्ण की और तब से गांव का नाम देवली पाबूजी  स्थापित हुआ।

स्वतंत्रता सेनानी : यहां के स्वतंत्रता सेनानी और समाज सेवा के लिये समर्पित स्व. मोहनलालजी जैन गांव के गौरवरत्न थे। इनकी यादे अमिट है और स्वतंत्रता सेनानी का स्मारक भी बना हुआ है। बाद में आप विधानसभा के सदस्य (एम.एल.ए) रहे। यहां के ठाकुर साहेब सज्जनसिंहजी भी एम.एल.ए. बने व गोडवाड अंतर्गत देवली की पहचान बनाई। यहां उनका विशाल रावला भी है। यहां का गणगौंर मेला  भी काफी प्रसिद्ध है।

मार्गदर्शन : सोमेसर से १४ कि.मी. रानी स्टेशन से २८ कि.मी. और नाडोल से ९ कि.मी. दूर मेगाहाईवे नं. ६७ पर स्थित देवली पाबूजी हेतु सरकारी व प्रायवेट बसें, टैक्सी और ऑटों की अच्छी सुविधाएं उपलब्ध है।

पेढी : श्री शांतिनाथ जैन संघ

मुख्य बाजार, मु.पो.देवली पाबूजी – ३०६६०३

तहसील देसुरी, जिला-पाली, राजस्थान

पेढी संपर् : ०२९३४-२५००३६

पुजारी : श्री बंसीलालजी – ०९७७२९७२७०७

ट्रस्टी : श्री ओगडचंदजी तातेड, देवली – ०८७६९२२०९०९

श्री घीसुलालजी राठौड, मुंबई-०९८९२०६५५१०