छोड़ा / Choda

छोड़ा / Choda

SHARE

गोडवाड़ के प्रवेशद्वार पश्चिम रेलवे के फालना रेलवे स्टेशन से राज्य राजमार्ग क्र. १६ पर सादड़ी से ८ कि.मी. दूर देसूरी मार्ग पर गोशाला के सामने श्री छोडा आदिनाथ’ प्रवेशद्वारा से आना जानेवाली पक्की सड़क पर ४ कि.मी. दूर उत्तर की ओर चारों तरफ प्राचीन अवशेष नग्र पहाडिय़ों के बीच स्थित छोड़ा’ गांव के पूर्वी छोर पर मंदिर के रूप में श्री छोड़ा तीर्थ’ दूर से ही दृष्टिगोचर होता है।

छोड़ा नदी के तट पर यह मंदिर तीन ओर से घिरी पहाडिय़ों के बीच सुरम्य स्थल पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे मानों देवराज इन्द्र के नंदन कानन में कोई भव्य शिल्प का अद्भुत करिश्मा उतर आया है। सोनाणा पत्थर से निर्मित शिल्प की अद्भुत कारीगरी का छेनी की बारीकियां जीवंत सा दृश्य उपस्थित करती है।

ऊंची चौकी पर शिखरबद्ध जिनप्रासाद में पश्चिमाभिमुखी श्री प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ प्रभु की कलात्मक परिकर से शोभित अति प्राचीन प्रतिमा श्वेतवर्णी, २१ इंची, पद्मासनस्थ, अलौकिक, जिन प्रतिमा के साथ, श्री प्रभु की कलात्मक परिकर से शोभित अति प्राचीन प्रतिमा के साथ, प्रभु श्री पद्मप्रभुजी व प्रभुश्री अनंतनाथ स्वामी की सुंदर प्रतिमाएं प्रतिष्ठित है।

यह जिनमंदिर ११वीं शताब्दी से ज्यादा प्राचीन है। यहां के पुराने शिलालेख से ज्ञात होता है कि आ. श्री यशोभद्रसूरिजी की परंपरा के शिष्य के समय का निर्माण काल है। प्राचीनकाल में पहाड़ी की तलहटी में विशाल नगरी में जैनों के करीब २००० घर थे। धीरे-धीरे यह नगरी उजड़ गई एवं लोग यहां से घाणेराव, देसुरी, सादड़ी, आना, करणवा इत्यादी नगरों में जाकर बस गये, जिससे यह परिसर वीरान सा हो गया। आबादी पहाड़ी से दूर होने लगी। अजैनों की थोड़ी बस्ती रह गई, जो आज भी आबाद है। ग्राम के पूर्वी पहाडिय़ों के ऊॅचें भूभाग में आज भी खंडहरों के अवशेष के साथ पुरानी ईटें दृष्टिगोचर होती है। दुर्गम स्थल में निवास रक्षा की व्यवस्था नहीं होने से आक्रांताओं व दुर्दम्य-दस्युओं के घात-प्रतिघात, आक्रमणों से विवश होकर जैन बस्ती यहां से दूर सुरक्षित नगरों में स्थापित हो गई।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रथम वीर नि. सं. २४९४, शाके १८८९, वि.सं. २०२४, वैशाख सुदि ६ चंद्रवार को आ. श्री हिमाचलसूरिजी के हाथों प्रतिष्ठा हुई। यहां के प्रभु पार्श्वनाथ की प्राचीन प्रतिमा की वि. सं. १८९३, माघ सु.१० बुधवार को आ. श्री देवेन्द्रसूरिजी के हस्ते अंजनशलाका हुई है। दो हजार वर्ष प्राचीन जिनालय की अंतिम प्रतिष्ठा वीर नि. शिष्य पू. पंन्यास श्री विद्यानंद विजयजी गणि के हस्ते संपन्न हुई। यहां की संपूर्ण व्यवस्था श्री घाणेराव जैन श्वे.पेढी देखती है। प्रतिवर्ष ज्येष्ठ सु.१४ को श्री कनकराजजी लोढा परिवार घाणेराव निवासी ध्वजा चढाते है।

मार्गदर्शन : सादड़ी-देसूरी सड़क पर सादड़ी से ८ कि.मी. दूर प्रवेशद्वारा से आगे पुन: ४ कि.मी. की दूरी पर छोड़ा गांव स्थित है। यहां के लिये प्रायवेट बस, टैक्सी आदि साधन उपलब्ध होते है।

सुविधाएं : विशाल प्रांगण के परिसर में, २५ अटैच कमरों की सुंदर धर्मशाला में १०० बिस्तर के पूरे सेट उपलब्ध है। यहां से ६ कि.मी. दूर सोनाणा खेतलाजी में अच्छी सुविधाएं है। यहां भोजनशाला की अच्छी व्यवस्था है।

पेढी : श्री जैन श्वे.तीर्थ पेढी, श्री छोड़ा तीर्थ,

जैन मंदिर रोड, मु.पो.छोड़ा, तह. देसूरी, जिला-पाली, राजस्थान

पेढी संपर्  :  पुजारी : श्री लादुरामजी – ०९७८४३३०२४९

मुनीमजी : रतनजी – ०९४१४८१४४५३,०८८९०५२४६४९