नारलाई / Narlai

नारलाई / Narlai

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पाली जिले के रानी रेलवे स्टेशन से ३०  की.मी. व जोधपुर-उदैयपुर मेगा हाईवे पर देसुरी से ७ की.मी. अनेक छोटी-बड़ी पहाडियो की हरी-भरी गोद में बसे मंदिरों की नगरी नारलाई गोडवाड़ की पंचतीर्थी का महत्त्वपूर्ण तीर्थ है।  लगभग २५ डिग्री पूर्वी देशांतर पर यह बसा हुआ है।  नारलाई के प्राचीन शिलालेखो और ग्रंथो के अनुसार, इसका प्राचीन नाम नंदकुलवंती, नारदपुरी, नाडुलाई, वल्लाभ्पुर, नड्डूलड़ागिका था।

 

नारलाई उसका अपभ्रंश है।  विजय प्रशसित महाकाव्य के प्रथम सर्ग में लिखा है की नारद मुनि ने मेवाड़ देश के विशाल भूमिपट को देखकर वहां अपने नाम से नारदपुरी नामक नगरी बसाई, जो इसी नाम से सर्वत्र प्रखयात हुई।  अनुपम प्राकृतिक सौंदर्यवाली इस भूमि पर देवर्षि नारद ने तपसया की थी।  गयारह जैन मंदिरों की इस नगरी के बारे में कहते है की किसी जमाने में यहां १०८ मंदिर थे, जिनकी झालरे और नगाडो की ध्वनि से अरावली पर्वत गूंज उठता था।  कहते है प्राचीन काल में इस नगरी का विस्तार वर्तमान नाडोल तक होने का उल्लेख मिलता है।  लेकिन समय के फेर के साथ इनके बीच ७ की.मी. की दुरी हो गई, जिससे नारलाई और नाडोल ने अपना अलग-अलग अस्तित्व बना लिया। मुग़ल सम्राट अकबर प्रतिबोधक जगतगुरु महान आचार्य श्री विजय हीरसूरीश्वर्जी के, मुखय शिष्यरत्न आ. श्री विजयसेनसूरीश्वर्जी एवं महान जैन कवी श्री ऋषभदासजी की यह पावन-पवित्र जन्मभूमि है.

यही पर आ. श्री विजयदानसूरीजी ने मुनि हीरहर्षविजयजी को योग जानकार, श्री ऋषभदेव प्रासाद के सान्निध्य में संवत् १६०७ में (ई. सन १५५१ व वीर निर्वाण २०७७) को नाड्लाई में  च्च्गणी पंणयास पदज्ज् एवं संवत् १६०८ के माघ सुदी ५ (ई. सन १५५२ व वीर निर्वाण २०७८) को नाड्लाई में ही, श्री नेमिनाथ भगवान के जिनालय में च्च्उपाध्याय पदज्ज् (वाचक) प्रदान किया।  आ. श्री हीरसूरीजी तथा राणकपुरतीर्थ प्रतिष्ठाचार्य आ. श्री सोमसुन्दरसूरीजी ने सं. १४८१ में चातुर्मास किया।  गोडवाड़ की यह मंदिरों की नगरी नारलाई का केवल धार्मिक महत्त्व नहीं है, बल्कि राजनैतिक महत्त्व भी रहा है।

 

इसे अनेक राजाओ ने अपनी राजधानी बनाने का सौभागय प्राप्त किया है, जिसमे सोनिगाराओ के आलावा मेडत़िया सरदारों के भी यहां राज करने का उल्लेख मिलता है।  नारलाई के जेकल पहाड़ी पर बने पत्थर के हाथी और उस पर बैठी एक मूर्ति के पीछे भी दन्तकथा प्रचलित है।  महाराणाओ जयसिंह ने नारलाई को घानेराव के राठोड गोपीनाथ को जागीर के रूप में दिया।  गोपीनाथ ने अपने पुत्र अभयराज को देकर यहां ठिकाना स्थापित किया।  अभयराज की भूमिका भग्न मंदिरों के पुननिर्माण में  महत्तवपूर्ण रही ।

कहते है की नारलाई के जागीरदार अभयराज मेडत़िया ने कई हाथी ख़रीदे, लेकिन जैसे ही हाथी को नारलाई में लाते तो हाथी मर जाता।  अभयराज ने भगवान शिव से प्राथना की अगर हाथी  जीवित रहा गया तो नारलाई के इस जैकाल पहाड़ को हाथी का रूप दे दुगा।  हाथी खरीदकर लाया गया और इस टेकडी बैठे हुए हाथी की भांति है।  अभयराज की स्मृति में उनके वंशजो ने टेकडी के ऊपर अभयराज की सवारी सहित एक हाथी बनवाया, जो बहुत दूर से दिखाई देता है।

यहां के उपलब्ध प्राचीन शिलालेखों से यह तीर्थ दसवी शताब्दी से भी प्राचीन होने का अनुमान होता है।  १७वि शताब्दी में श्री समयसुन्दरजी ने अपनी तीर्थ माला में च्च्नाडलाई जादवोज्ज् कहकर थ्रिथ का भावपूर्वक उल्लेख किया है।  वही श्री शीलविजयजी ने स्वरचित तीर्थमाला में लिखा है –

नाडूलाई नव मंदिर सार, श्री सुपास प्रभु नेमकुमार

इससे पहले यहां ९ मंदिर होने का पता चलता है, साथ ही प्राचीनता व पवित्रता का उल्लेख मिलता है।  भूगर्भ से निकलने वाली प्रतिमाओं एवं खंडहरो से भी नगर की प्राचीनता सिद्ध होती है।  सोनीगरा सरदारों की राजधानी तथा उनका उस समय का बना हुआ किअल भी खंडहर रूप में विधमान है।  आज भी इस नगर की प्राचीनता एवं जाज्जवल्यता इसकी मंदिरवाली से स्पष्ट दृष्टीगत होती है।  एतिहासिक सास संग्रह भाग- २ के अनुसार, इस ग़ाव को कभी च्च्वल्लभपुरज्ज् नाम से भी जाना जाता हा। कभी यहां ७०० से अधीक घरो की बस्ती थी।  ७० वर्ष पहले पोरवालो के २८ घर तथा ओसवालो के ३२ घर थे ।  वर्तमान में २२२ च्च्घर हौतीज्ज् है और अंदाजन ९०० की जैन जनसंख्या तथा जैन-अजैन कूल १२००० की जनसंख्या है।  च्च्कमल सागरज्ज् बाँध व देसुरी सुकड़ी नदी यहां से बहती है।  पहले इसी के किनारे नगर बसा था, फिर धीरे-धीरे बस्ती पहाड़ की तलहटी की तरफ बढने लगी । ज्यादाटार मंदिर का उस तरफ होना बात का संकेत है।

 

प्रथम जिनमंदिर :

नगर के पश्चिमी द्वार के बाहर व पहाड़ी के नीचे श्री आदिनाथ प्रभु का प्राचीन व विशाल सौधशिखरी जिनालय है।  इस मंदिर में एतिहासिक एवं पूरातत्व की दृष्टी से कई महत्तवपूर्ण शिलालेख है।  इसके सभा मंडप के ६ स्तंभों पर ५ लेख है।  जिसमे सबसे प्राचीन लेख सं. ११८७ फाल्गुण सुदी १४ गुरूवार का है, बाकी के चार लेख चौहान राजा रायपाल के समय में सं. ११८९ से सं. १२०२ तक के है।  इन शिलालेखों से ही यह तथय उजागर होता है की १२वि शताब्दी में इस मंदिर में पहले मुलनायक रहे।  यह प्रतिमाए लुप्त हो जाने से वर्तमान आदीनाथजी की प्रतिमा सं. १६७४ के माघ वदी १ को प्रतिष्ठित की गई।  यह सब परिकर के लेख से प्रकट होता है।

प्रभु आदिनाथ की प्रतिमा श्वेतवर्णी, पद्मासनस्थ तथा ३ फीट ऊँची है।  इसके आलावा पाषण की कूल २४ प्रतिमाए प्रतिष्ठित है।  एक गुरुमूर्ति भी है।  सं. १६८६ के लेख से प्रकट होता है की यह मंदिर संप्रति राजा द्वारा बनाया हुआ है।  इसी लेख के अनुसार, मंदिर का पहला जिणोरद्वार वि. सं. १५०९ में मंत्री सायर द्वारा हुआ तथा दूसरा उद्धार ग़ाव के जैन संघ द्वारा तथा तीसरा उद्धार मंत्री सायर के वंशजो द्वारा करवाने का उल्लेख है।  एक कौर लेख के अनुसार ज्ज्ज् श्री यशोभद्रसूरी गुरु पादुकाभ्याम नम: । सं १५९७ वर्षे वैशाख मासे शुक्ल पक्षे शषठया तिथौ शुक्रवासरे पुनवर्सुऋक्ष प्राप्त चंद्रयोगे।  श्री संडेरगच्छे ज्ज्.सं. ९६४ श्री यशोभद्रसूरीमंत्र शक्तिसमानीतांया..ज्ज्  यह मंदिर संडेरगच्छीय विधासिद्ध आ. श्री यशोभद्रसूरी ने सं. ९६४ में मंत्र बल से वल्लभीपुर से तथा दुसरे मत से खेड़ानगर से उड़ाकर लाया गया था।  इस विषय में एक विस्मयपूर्ण दंतकथा भी प्रचलित है, जो शिलालेख से भी पता चलता है की –

सं. ९६४ में आ. श्री यशोभद्रसूरीजी तथा शैवयोगी तपेश्वर के बीच मंत्रप्रयोगो के विषय पर वाड़-विवाद हुआ और शर्त थी की सुरयोदय के पहले कुकड़े का शब्द होते ही अपने ध्यय को स्थगित कर देना ।  दोनों ने अपनी मंत्र शक्ति दिखलाने हेतु वल्लभिपुर से अपने-अपने मत के विशाल मन दिर आकाश मार्ग से उडाए और प्रतिगिया की जो सुरयोदय के पहले नाडलाई में प्रथम अपना मंदिर स्थापित करेगा, उससे विजेता माना जाएगा।  आचार्य जब योगी से आगे निकल गए तो वह परेशान हुआ व कुकडे का रूप धारण करके बोलना शुरू कर दिया।  इससे आचार्य रुक गए और उधर से योगी का मंदिर भी नजदीक आ पंहुचा ।  सुरयोदय हो जाने से योगी ने ग़ाव और आचार्य ने ग़ाव के बाहर थोड़ी दुरी पर मंदिर की स्थापना कर दी ।

कहावत भी है की –

संवत दश दहोतरे, वदिया चौरासी वाद।  खेड़नगर थी लाविया, नाडलाई प्रासाद । ।

मगर सोहमकुल पट्टवलीकार ने लिखा है की ज्ज् वल्लभिपुरथी आणियो-ऋषभदेव प्रासादज्ज् लेखक ने इस घटना की संवत १०१० और लावण्य समय रचित तीर्थमाला में सं. ९६४ लिखा है।  दोनों मंदिरों आज भी खड़े है तथा आ. श्री यशोभद्रसूरीजी का जैन मंदिर च्च्जसियाज्ज् के नाम से व तपेसरजी का महादेव मंदिर च्च्केसियाज्ज् के नाम से प्रसिद्ध है।  आखिर आचार्य श्री से प्रभावित होकर तपेश्वर्जी ने आचार्यश्री के पास से दीक्षा ग्रहण की।  वे केशवसूरी एवं वासुदेवाचार्य के नाम से विख्यात हुए।  इन दोनों विद्धान मंत्र सिद्ध विभूतियो का स्वर्गवास इसी नाडलाई गाव में हुआ था।  इनके स्तूप आज भी ग़ाव के बाहर दक्षिण दिशा में, ५० कदम दूर महाजनों की शमशान के पास संडेरगच्छीय श्री यशोभद्रसूरीजी का मूर्ति सहित व उसके पास तपेसर योगी का स्तूप है।  कहा जाता है की प्रतिवर्ष आ. श्री का स्तूप एक जौ का शतांश बढता है और योगी का स्तूप उतना ही घटता है।  नाडलाई के चौहानराव लाखण के वंशजो को आ. श्री ने प्रतिबोधक देकर जैन देकर जैन बनाए और उनका च्च्भंडारीज्ज् गोत्र कायम किया था।

आदिनाथ भगवान के इस प्राचीन मंदिर की बनावट और स्थापत्य कला सुंदर है।  मंदिर के प्रवेश द्वार पर दोनों ओर दो विशाल हाथी बने हुए है।  मंदिर के रंगमंडप के भित्तिचित्र की कला अदभूत है।  मंदिर के बाहर प्रागंन में विराजमान अधिष्ठायक देव की मूर्ति महान चमत्कारिक है, जिसे ग़ाव के सभी जाती-संप्रदाय के लोग श्रद्धा से नमन करते है।

अनेक प्राचीन शिलालेखों से तीर्थ की प्राचीन जानकारियो उजागर होती है।  वि.सं. ११८६, माघ सुदी ५, वि.सं. १२००, जेष्ठ सुदी ५, गुरुवार, वि.सं. १२०२, असोज वदी ५, शुक्रवार, वि.सं. १५९७, वै. सु. ६, सोमवार, सं. १६७४, माघ वदी १, गुरूवार, वि.सं. १५६८-६९ तथा ७१, सं . १२०० का. व. ७, रविवार, सं. ११८७ के फा. सुदी १४, गुरूवार, सं. १७६५ वैशाख आदि लेखो से तीर्थ की प्राचीनता प्रकट होती है।

वि.सं. १५९७ वैशाख सुदी ६ सोम वार के दिन जिणोरद्वार के पश्चात इस मंदिर में भगवान श्री आदिनाथ की प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई।

अन्य  ग्रंथो से आ. श्री आनंद विमलसूरीजी द्वारा लगभग सं. १५८७ के आसपास नाडलाई में प्रतिष्ठा करवाने का उल्लेख मिलता है।  करीब ४ साल पहले इस प्राचीन जिनालय का संपूर्ण शिखर सहित गिराकर जिणोरद्वार प्रारंभ हुआ है।  प्रभु प्रतिमाओं की गादी को छोड़ पुन: नवनिर्माण किया है।  चौबीस देहरियो सहित विशाल जिनालय के निर्माण की श्री संघ की भावना है।

द्वितिय जिनमंदिर: ग़ाव के मुखय बाजार के मध्य में संघ पेढि के सामने श्रीसंघ द्वारा निर्मित शिखरबंध श्री मुनिसुव्रत स्वामी भगवान का जिनालय है।  वि.सं. २०२८ द्वि. वैशाख शु. ६ गुरूवार, दी. १९.५.१९७२ के शुभ दिन गुरु पुषयामृत योग में श्री मुनिसुव्रत स्वामी आदि नूतन जिनबिंबो की अंजनशलाका विधि संपन्न करवाकर स्व. आ. श्री जिनेंद्रसूरीजी आ. ठा. की पावन निश्रा में, द्वि. वैशाख शु. १० सोमवार दी. २३.५.१९७२ के शुभ दिन रविश्रीवत्सादी शुभ योग समलंकृत शुभ लग्नांश वेला में सविधि प्रतिष्ठा करवाई गई।  यही बाजार में पूर्व में पार्श्वनाथ प्र भू के मंदिर का उल्लेख मिलता है। चोट्टे से मंदिर एक हाथ ऊँची श्वेत वर्ण प्रतिमा आ-पास दो प्रतिमाओं के साथ विराजमान थी। ७० वर्ष पूर्व यह मंदिर विधमान था।

गुरु मंदिर : श्री मुनिसुव्रत स्वामी मंदिर के बिलकुल पास में गुरु मंदिर बना है।  जिसमे अकबर प्रतिबोधक प. पू. आ. जगतगुरु श्री हीरसूरीजी के शीषयरत्न तथा इसी ग़ाव में जन्म लेने वाले प.पू. आ. श्रीमद् विजयसेन सूरीश्वरजी, पंजाबकेसरी प.पू. आ. श्री वल्लभसूरीजी एवं प.पू. आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी की प्रतिमाए विराजमान है, जिनकी प्रतिष्ठा वीर सं. २५२४, वि.सं. २०४५ जेठ वदी ७ सोमवार दी. १८.५.१९९८ को, प.पू. आ. श्री पद्मसूरीजी एवं प.पू. आ. श्री जितेन्द्रसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में संपन्न हुई थी।

 

तृतीय जिनमंदिर : ग़ाव के दक्षिण-पूर्वी भाग तथा श्री गिरनार तीर्थ की तलहेटी में उत्तरभीमुखी श्री अजितनाथ भगवान् का प्राचीन शिखर]बंधी जिनालय है।  जिसमे प्रभु के गहरे पीतवर्ण की कलात्मक सपरिकर सहित, सवा हाथ की सुंदर प्राचीन प्रतिमा विराजमान है।  इस मंदिर का जिणोरद्वार वि.सं. २०४८-४९ में श्री संघ द्वारा कराया गया ।  इसी मंदिर में गुरु गौतमस्वामी की प्रतिष्ठा सं. २०५४ जेठ वदी ७ सोमवार दी. १८.५.१९९८ को संपन्न हुई थी।

 

चतुर्थ जिनालय : ग़ाव के पूर्वी भाग तथा श्री अजितनाथजी जिनालय के दाहिनी और पस्चिमभीमुख श्री सुपार्श्वनाथ भगवान का जिनालय है, जो यहां के सभ मंदिरों में सबसे विशाल एवं ऊँचा है।  श्री सुपार्श्वनाथ प्रभु की २ हाथ बड़ी, पीले पाषण की पंचतीर्थी यूक्त प्रतिमा विराजमान है।  जिसकी प्राण प्रतिष्ठा वि.सं. १६५९ में जगतगुरु श्री विजय हीरसूरीजी के पट्टाधीश व नारलाईरत्न श्री विजयसेनसूरीजी के हस्ते हुई । भमती में दाई ओर एक ही तरफ १४ देहरिया है।  एक देहरी में सर्प की आकृति है, जिसके मुख में माला बताई हुई है व श्री सुपर्श्वनाथजी के पगले है।  गुढ़ मंडप में १४ प्रतिमाए व एक पंचतीर्थी है।  इसी में से एक श्री मुनिसुव्रतस्वामी की प्रतिमा पर लेख अनुसार, सं. १७२१ के जेठ सुदी ३ रविवार को महाराजाधिराज श्री अभयराज के राजयकाल में, यहां के निवासी पोरवाल शेष्टि जीवा तथा माता जसमादे के पुत्र नाथ ने, इस जिनबिंब को भराया व इसकी प्रतिष्ठा भट्टारक श्री विजयप्रभसूरीजी ने करवाई थी।  उस  समय यहां २७०० घर थे, अत: इस विशाल मंदिर के दो द्वार बने हुए है।

 

इसके निर्माण के बारे में प्रचलित दंतकथा के अनुसार, एक बार शेत्र में भारी अकाल पड़ा।  यहां के किसान राजा को लगान देने में असमर्थ थे।  ऐसी स्थिति में नगरसेठ ने सभी किसानो का लगान राजा के पास जमा करवा दिया।  जब राजा को यह बात का पता चला तो राजा ने लगान की राशि सेठ को पुन: लौटा दी।  स्थ ने वह राशि घर में न रखकर इससे इस भव्य मंदिर का निर्माण करवा दिया।  एक अन्य लोकोक्ति के अनुसार, इस मंदिर से एक गुप्त भू मार्ग नाडोल के श्री पद्माप्रभु के मंदिर तक बना हुआ है।

 

पंचम जिनालय : जेसल पर्वत की तलहटी तथा ग़ाव के पूर्वी भाग में  एक छोटी-सी टेकरी की उंचाई पर उत्तरभीमुखी श्री शांतिनाथ भगवान का कोट सहित, शिखरबंधी प्राचीन मंदिर है।  २५-३० सीढ़ीया चढ़ने पर मन्दिओर का प्रवेश होता है।  जिसमे प्रभु की अति भव्य मनोहर प्रतिमा सपरिकर एवं एक हाथ ऊँची प्रतिमा सं. १६२२ की प्रतिष्ठित है।  सोनाणा आरस पत्थर से निर्मित मंदिर के बाहरी भाग में बनी हुई मैथुन शैली की मूर्ति कला कोखि है।  जो प्राचीन स्थापत्य कला का अनुपम उदहारण है।  एक मूर्ति १०वि शताब्दी की लगती है।  वि.सं. २०५१ में श्री संघ द्वारा इसका जिणोरद्वार कराया गया।

 

छठा जिनालय : श्री शत्रुंजय तीर्थ की तलेटी व ग़ाव के ऊतर-पूर्व भाग में स्थित, चार मंदिरों में से एक १०वि शताब्दी का श्री नेमिनाथ भगवान का उंचाई पर पूर्वभिमुखी विशाल मंदिर है।  मुलनायक की प्रतिमा प्राचीन, विशाल व पंचतीर्थी यूक्त है।  इस मंदिर में स्थित केशर घिसने की शिला का विशाल आकार इस बात का प्रमाण है की उस समय ग़ाव की बस्ती कई गुना अधीक थी।  इस मंदिर को च्च्बाफना का मंदिरज्ज् भी कहते है।  ग़ाव के एक बाफना परिवार के प्राचीन चोपडो से पता चलता है की वि.सं. १७९५ वैशाख शु. ९ के दिन, उनके पूर्वज श्री नेनाजी ने ५०० मन लापसी बनाकर नवकारशी करवाई थी।  वि.सं. २०५४ में इसका जिणोरद्वार श्री संघ द्वारा हुआ।

 

सातवाँ जिनालय : श्री नेमिनाथ जिनालय से करीब १०० फुट दूर च्च्श्री सोगठीया पार्श्वनाथज्ज् प्रभु का पूर्वभीमुख शिखरबंध मंदिर थोड़ी उंचाई पर है, जो १०वि सदी की स्थापत्य कला से शोभायमान है।  अपार शोभा के स्वामी, श्वेतवर्णी , २७ इंची ऊंचाई वाले व २३ इंच की चौड़ाई वाले कलात्मक परिकर से यूक्त पांच फणा वाले प्रभुजी, १०८ पार्श्वनाथ श्री सोगठीया पार्श्वनाथ के नाम से सुप्रसिद्ध है। इस नाम के पीछे छिपा रहस्य अप्रगट है।  यह प्रतिमा भूगर्भ से प्रकट हुई थी तथा संप्रतिकालीन लगती है।  श्री मेघकवी कृत तीर्थमाला, वि.सं. १६५६ में रचित श्री नयसुन्दरकृत छंद, १७ वि शताब्दी में रचित समयसुंदर कृत तीर्थमाला आदि में इनका उल्लेख मिलता है । इस मंदिर को चंदोलियो का मंदिर भी कहा जाता है।  यहां हर पूनम को मेला लगता है।

 

आठवा जिनालय : शत्रुंजय की तलहेटी में श्री सोगठीया पार्श्वनाथ जिनमंदिर से ५० फुट की दुरी पूर्वाभिमुखी, शिखरबंधी श्री गोड़ी पार्श्वनाथ प्रभु का विशाल मंदिर है।  जिसमे प्रभु की सुर्वांगसुन्दर श्वेतवर्णी सवा हाथ बड़ी प्रतिमा स्थापित है। जिसकी  प्राण प्रतिष्ठा सं. १७६७ में आ. श्री कुशलसूरीजी के हाथो संपन्न हुई है।  इसके आसपास श्री ऋषभदेव व श्री पार्श्वनाथ प्रभु की दो भव्य प्रतिमाए विराजमान है, जिनकी अंजनशलाका सं. १३२४ में श्री विजय रत्नसेनसूरीजी ने की है।  कूल पाषण की ६ प्रतिमाए है, जो १०वि शताब्दी की लगती है।  भमती में जमणी बाजू ५ व डाबी बाजू में ३ देरिया है।  इस मंदिर में दो प्रवेश द्वार है, दूसरा उत्तरभिमुखी है।  इस मंदिर के जिणोरद्वार के समय मंदिर में भूमिगत गुप्त कमरा प्राप्त हुआ है, जो शायद संकट समय प्रतिमाए सुरक्षित रखने हेतु बनाया गया है।  वि.सं. २०५५ में इसका जिणोरद्वार पूर्ण हुआ।

 

नौवा जिनालय : श्री गोड़ी पार्श्वनाथ जिनालय ए ५० फुट की दुरी पर उत्तर-पूर्व में पूर्वाभिमुखी शिखरबंध श्री वासुपूजय स्वामी का सुन्दर ऊँचे चबूतरे पर बना मंदिर है।  जिनलय में प्रभु की एक हाथ ऊँची व बदामी वर्ण की मनोहर प्रतिमा स्थापित है, जो सं. १७४९ की प्रतिष्ठित है।  इसके अलावा महावीर स्वामी की प्रतिमा भी उक्त संवत् में ही प्रतिष्ठित हुई है।  इनकी अंजनशलाका अचलगच्छीय आ. श्री धर्मसूरीजी के हाथो हुई है।  गूढ़ मंडप के एक स्तंभ में पद्मासनस्थ एक प्रतिमा है।  जमणी बाजू काऊसग्गीय मूर्ति है।  इस मंदिर को तीजनियो का मंदिर भी कहते है।  प्राचीन काल में इसी परिसर में जैनों की अधिकतर बस्ती रही होगी।  इस मंदिर का श्री संघ ने सं. २०५४ में जिणोरद्वार पूर्ण किया।

 

दसवां जिनालय : नाडलाई ग़ाव के बाहर लगभग दो फर्लांग दूर अलग-अलग आमने-सामने की पाहडियो में एक जेसल पहाड़ की पूर्वी भाग में टेकरी पर किलानुमा आकार की चारदिवारी के बीच श्री आदिमाथ प्रभु का शिखरबंध एतिहासिक मंदिर है।  इस मंदिर में आदिनाथ प्रभु की ३८३ वर्ष प्राचीन सुन्दर परिकर यूक्त श्वेतवर्णी पद्मासनस्थ लगभग ७५ सें. मी. (डेढ़ हाथ बड़ी) अति मनोहारिणी प्रतिमा विराजमान है।

 

संप्रतिकालिन मंदिर का जोनिओरद्वार करवाके. वि.सं. १६८६ वैशाख सुदी ८ शनिवार पुषयोग के दिन, महाराणा जगतसिंह के राजय में जहांगीर महातपा विरुद्धधारक भ. श्री विजयदवसूरीजी ने, स्वपद प्रतिष्ठाचार्य श्री विजयसिंहसूरीजी ने प्रमुख परिवार के साथ की।

 

इस प्राचीन मंदिर के बारे में च्च्शत्रुंजय महात्मयज्ज् उल्लेख मिलता है की प्राचीन काल में राजा शुकराज काबुल से संघ लेकर शत्रुंजय दर्शनार्थ जा रहे थे।  जब संघ नारलाई पहुचा तब राजा का शरीर अस्वस्थ हो गया और लगा की शत्रुंजय दादा के दर्शन नहीं हो पाएगे तब इस टोकरी पर आदिनाथ प्रभु के दर्शन किए, तब उन्हें साक्षात शत्रुंजय पर दर्शन जैसी शांति मिली और शरीर भी स्वस्थ हो गया।  तब से इस मंदिर को शत्रुंजय तीर्थ कहा जाता है।  वि.सं. २०२८ के वै.सु. ६ गुरूवार को, आ. श्री जिनेन्द्रसूरीजी के हस्ते बाहरी सभा मंडप में नयनरमय छत्री में श्री पुंडरिक स्वामी की प्रतिमा तथा रंगमंडप में गज अम्बाडी पर विराजमान मरूदेवी माता की मूर्ति स्तापित की ।  वि.सं. २०५०-५१ में श्री संघ ने जिणोरद्वार करवाया था तथा मंदिर के प्रागंन में इस तीर्थ की शास्तोक्त नवाणु यात्रा करने के लिए आवशयक श्री शांतिनाथ प्रभु का लघुमंदिर व रायण पगला तथा तलेटी पर पगलियाजी का निर्माण करवाकर वि.सं. २०५ जेठ वदी ७, सोमवार दी. १८.५.९८ को ,आ. श्री पद्मसूरीजी व आ. श्री जीतेन्द्रसूरीजी के हस्ते प्रतिष्ठा करवाई।  इस पहाड़ी पर सूरजकुंड की रचना के अतिरिक्त एक और प्राकृतिक कुंड बना हुआ है।  इस पाहाडी के सामने गिरनार पहाड़ी पर चीते आदि पशु विचरण करते है।  दोनों पहाडियो के मंदिर बिना नीव के है , जो इनकी प्रभावकता को दर्शार्ते है।

 

ग्यारहवा मंदिर : शत्रुंजय गिरिराज के ठीक सामने ग़ाव के दक्षिण-पूर्व अर्थार्त अग्निकोण में एक पहाड़ी पर इतिहास प्रसिद्ध जिनालय गिरनार तीर्थ के नाम से विख्यात है।  इसमें श्री नेमिनाथ प्रभु की प्राचीन, शयामवर्णी पद्मासनस्थ लगभग ७५ सें.मी. सपरिकर डेढ़ हाथ बड़ी सर्वांगसुंदर प्रतिमा स्थापित है।  इसी कारण इसका नाम गिरनार टोंक और यदव पहाड़ी है। इसका निर्माण भगवान श्री कृष्णा के पुत्र प्रधुमन कुमार ने करवाया था।  विजय प्रशस्ति महाकाव्य में श्री नेमिनाथ च्च्जादवजीज्ज् तथा पहाड़ी को च्च्यादव टेकरीज्ज् कहा है।

 

श्री समयसुंदरजी रचित तीर्थमाला स्तवन में श्री नाडोलाई जादवो वाक्य से भी उपरोक्त कथन का सतयापण होता है। मंदिर के एक स्तंभ पर शिलालेख के अनुसार , सं. ११९५ आशिवन कृष्णा  ३० मंगलवार को यहां ठाकुर रायपालदेव ने बादालियो से प्राप्त होने वाले कर का १/२० वा भाग इस मंदिर की पूजा व्यवस्था में अर्पित किया था।  पासिल नामक व्यक्ति ने इस लेख को अंकित किया है।  एक और लेख के अनुसार , वि. सं. १४४३ के कार्तिक वदी १४ शुक्रवार के दिन राजा रणवीरदेव के राजयकाल में बृहदगच्छ के आ. श्री मानतुंगसूरी वंश परंपरा में आ. श्री धर्मचंद्रसूरीजी के शीषय आ. श्री विनयचंद्रसूरी ने गुण रूप मनिरत्न के आकार यदूवंश विभूषण, जगत के विषाद को हरने वाले श्री नेमिनाथ के मंदिर का ६१० वर्ष पूर्व जिणोरद्वार करवाया।

 

सहसावन : इस पाहड़ी के पूर्वी भाग की तलेटी के पास एक प्राकृतिक घाटी में यती श्री उम्मेदसागरजी द्वारा सहसावन तीर्थ की रचना की गई है।  एक गुफानुमा चट्टान में छोटे-छोटे टीन कक्ष बने है।  एक कक्ष में श्री नेमिनाथ प्रभु व राजुल के पदचिन्ह बने हुए है।  दुसरे कक्ष में शासन माता श्री अंबिकादेवी की मूर्ति तथा तीसरे कक्ष में यतीजी धयान साधना करते थे।

 

बारहवी दादावाड़ी : शत्रुंजय तलहटी में ३० वर्ष पूर्व आ. श्री नेमिसुरीजी द्वारा दीक्षित प. पू. पं. श्री रूपविजयजी के शिष्य प. पू. श्री भानुविजयजी के अथक प्रयासो से, दादावाड़ी का निर्माण हुआ।  इसी में प्रवेश द्वार के बाई ओर के कक्ष में श्री रूपविजयजी तथा दाई ओर के कक्ष में श्री भानुविजयजी की मूर्ति प्रतिष्ठित की हुई है।  इन्ही के द्वारा कारयलय के निकट गिआन भन्डार भवन बनवाया गया है।  कई प्राचीन दुर्लभ पुस्ताको एवं हस्तलिखित ग्रंथो का संग्रह है। इसी में आ. श्री नेमिसुरीजी की प्रतिमा स्थापित है।  जैनों के आलावा अजैनो के भी कई मंदिर ग़ाव की शोभा बढाते है। श्री चारभुजाजी के मंदिर में गरूड की मूर्ति देखते ही दर्शक भावविभोर हो जाते है।  साथ ही आई माता मंदिर व भंवरगिणी नामक विशाल एवं शीतल प्राकृतिक गुफा है।  सुरय मंदिर व गोरखमुढ़ी भी प्रसीद्ध है।  ऊँचे पर्वत शिखर पर विशालकाय हाथी खड़ा है और नीचे गुफा में जैकल महादेव का प्राचीन मंदिर है ।

 

पेढी : श्री नारलाई श्वेताम्बर मू.पू. जैन संघ, मु.पो. नारलाई-३०६७०३, मेन बाजार रोड, तहसील-देसुरी, जिला-पाली, वाया – नाडोल, राजस्थान।