लुणावा / Lunava

लुणावा / Lunava

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गोडवाड़ के प्रवेशद्वार फालना रेलवे स्टेशन के पूर्व में १६ की.मी. और राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ के सांडेराव से २८ कि.मी. दूर अरावली पहाडियो की तलहटी में पार्वती नदी के तट पर स्थित एक पुरातन नगर है ‘लुणावा’ जो चारो तरफ से नदियो से घिरा हुआ है। कहा जाता है की करीब ६०० वर्षो से भी अधीक समय पहले लुणावा ग़ाव एक की.मी. दूर पाहाडी के पास बसहा था। समय ने करवट ली और आज लुणावा ग़ाव वर्तमान जगह स्थित है। १०००० की कूल आबादी वाला यह नगर अरावली की तलहटी में है, जिससे यहां की  आबोहवा बड़ी खुशनुमा है।यहां जैनों के करीब ७५० घर है, जिसमे ७०० पोरवाल और ५० घर ओसवालो के है।पोरवालो के ७०० में से २५० घर सिर्फ नीमसोलंकी गोत्र परिवार के है, जो ४०० वर्ष पहले वाकडिया वडग़ाव से आकर यहां बसे। चौहान गोत्र के लगभग १०० घर है। पर्व के ५० व बोया के १० घर है। यहां का आपसी सामंजसय प्रशंसीय है। यहां का घी इतना प्रसिद्ध है की लोग इससे मुंबई, पुणे तथा अनय शेहरो में ले जाते है। लुणावा गोडवाड़ का सुखी-संपन्न नगर होने से कई हवेल़िया दृष्टीगोचर होती है। किन्तु यहां के रहवासियो की उपस्थिति तो शेहरो तक समिति है। नूतन रचित कुछ पंक्तिया इस प्रकार का संदेश देती है –

सूनी पड़ी गलिया, सूना पडिया महल माल़िया। डोकरा डोकरी वाट जोवे, कद आवे म्हारा टाबरिया ।।

काफी हद तक राजस्थान के हर ग़ाव-कस्बे की यही कहानी है। आज भव्य जिन मंदिरों में प्रभु को भी, भक्तो की राह देखनी पड़ रही है। मीठडी, लुणी व पार्वती नदियो से जुड़ा होने से ग़ाव की जमीन अति उपजाऊ है। यहां खेती मुखय व्यवसाय है। ग़ाव के विकास में जैन समाज का योगदान अनुकरनिय व सहारनिय है।यहां मुठलिया परिवार राजकीय चिकित्सालय, सागर उच्च माध्यमिक विधालय, झवेरी परिवार द्वारा बालिका विधालय, गोलंक परिवार द्वारा नयाती नोहरा व मात्रु एवं शिशु कलयाण केंद्र, नीमसोलंकी द्वारा पशु चिकित्सालय व आयमबिल खाता, फागनीया परिवार निर्मित आदि लोकहित में सीर ऊँचा किए खड़े है। प. पू. पं. प्रवर श्री भद्रंकर विजयजी ने यहां नवकार मंत्र पर दीर्घ साधना की है, इसलिए लुणावा नगरी को पं. म. सा. की साधना भूमि से भी जाना जाता है।उनकी स्मृति में भव्याती भव्य भद्रंकरनगर नागेश्वर पार्श्वनाथ जिनालय का निर्माण हुआ है। पू. भद्रंकर विजयजी ने यहां कूल ४ चातुर्मास किए, जिनमे से एक आ. श्री कलापूर्णसूरीजी के साथ यहां पर किया है। यहां पंचपरमेष्ठी स्वरुप कूल ५ जिनालय है, जिनमे एक भद्रंकर नगर मंदिर है।

१ . श्री आदिनाथजी मंदिर : श्री विजय वल्लभ चौक में श्रावकों के आराधना भवन के ठीक सामने किलेनुमा, विशाल परिसर से घिरा हुआ, प्रवेश द्वार पर दो विशाल गजराजो से शोभित, सुब्दर कलात्मक, छत्रियो से आकर्षक बना उत्तम द्वार, सौधशिखरी, गगन को छुत्ता कोरणीयूक्त शिखर, ऐसे चैतय में प्रथम तीर्थंकर श्री आदेश्वर भगवान की प्राचीन प्रतिमा स्थापित है।

वर्षो पहले खोदकाम के दौरान शयाम वर्णीय श्री आदेश्वर भगवान की जिन प्रतिमा प्राप्त हुई थी, जिससे प्रेरित होकर श्री आदेश्वर्जी चौमुखी मंदिर का निर्माण हुआ। लुणावा नगर श्री सुमेरसिंहजी राजए, श्री चऊमुख जिनमंदिर में श्री ऋषभ जिनबिंबो की, श्री संघ द्वारा श्री १०८ हेमसगारजी गणी की निश्रा में वीर नि.सं. २४३९, शाके १८३५ वि.सं. १९७०, वै. शुक्ल ३, गुरूवार को आ. श्री मुनिचंद्रसूरीजी की उपस्थिति में प्रतिष्ठा संपन्न हुई।

‘जैन तीर्थ सर्वसंग्रह’ के अनुसार सं. १९६९ में प्रतिष्ठा होकर पाषण की १२ व धातु की ६ प्रतिमाए प्रतिष्ठित हुई थी। इसके पिछले भाग में भी दो छतरियो में एक-एक प्रतिमा स्थापित है। यह सभि प्रतिमाए सं. १८८१ की प्रतिष्टित है और इसमें वि.सं. १९६८ में स्थापित हुई थी। प्राचीन केसरीयानाथ चौमुखी प्रतिमा ऊपर शिखर में प्रतिष्ठित है। चौमुखिजी में और दो प्रतिमाओं की, वि.सं. १९५१ के माघ शु. ५ गुरूवार को, भट्टारक आ. श्री राज्सुरीजी के हस्ते वारकाणा तीर्थ प्रतिष्ठोत्सव पर अंजनशलाका संपन्न हुई है। प्रति वर्ष वै. सु. ३ को खिवान्दीवाला मासाजी फलाजी परिवार ध्वजा चढाते है।

 

२ . श्री पद्मप्रभुस्वामी मंदिर : लुणावा के महावीर चौक में जैन पेढि के पास व श्री शांतिनाथजी मंदिर के ठीक सामने श्वेत पाषण से नवनिर्मित भव्य-दीव्य द्विमंजिला, कलात्मक शिखरयूक्त जिनप्रसाद में कोशाम्बी नगरी के राजा छठे तीर्थंकर व प्राचीन मुलनायक श्री पद्मप्रभु स्वामी की अति सुंदर प्रतिमा प्रतिष्ठित है। अति प्राचीन व चमत्कारिक प्रभु प्रतिमा करीब ४०० वर्ष पूर्व पास के ग़ाव च्च्लालराईज्ज् से प्राप्त हुई थी और पिछले २०० वर्षो से यह प्रतिमा यहां पूजी जा रही है। प्राचीन शिखरबंध व विशाल मंदिर पर मुठलिया परिवार ध्वजा चढाते थे। कालांटार मंदिर के जीर्ण-शीर्ण होने पर इसे आमूल जिणोरद्वार करने का श्री संघ ने निर्णय लिआव वि.सं. २०५९, फा.सु. ७, दी. १०.३.२००३ को उथापण, वि.सं. २०५९, वै.सु. ३ रविवार, दी. ४.५.२००३ को फागणिया परिवार द्वारा भूमिपूजन वि.सं. २०५९, वै.सु. ११ सोमवार, दी. १२.५.२००३ को गोलांक परिवार द्वारा शिलान्यास होकर निर्माण कार्य दुतगति से आगे बढ़ा। जैन तीर्थ सर्वसंग्रहज्ज् के अनुसार इस शिखरबंध जिन मंदिर का निर्माण श्री संघ द्वारा सं. १७२५ के करीब हुआ था तथा पाषण की ३ व धातु की ४ प्रतिमाए विराजमान थी। परिवर्तन संसार का नियम है। प्राचीन जिन मंदिर, आमूलचूल जिणोरद्वार कृत, शिल्प कलाकृति, नयन रमय श्वेत आरस पाषण से नवनिर्मित, शिखरबंध जिनप्रसाद की पुन: प्रतिष्ठा, प्रतिष्ठा शिरोमणि आ. श्री पद्मसूरीजी आ. ठा. एवं वल्लभ समूदायवर्ती आ. श्री शांतिदूत-नित्यानंदसूरीजी आ.ठा. व चतुर्विध संघ के साथ वीर नि.सं. २५३२, शाके १९२७, विक्रम सं. २०६२, वैशाख सुदी ४, सोमवार दी.१ मई २००६ को हर्षोलास से संपन्न हुई। नूतन ९ जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न हुई। प्रथम मंजिल पर पंचधातु की श्री चंद्ररभु स्वामी की प्रतिमा स्थापित है। इस अवसर पर वै.सु. ६, बुधवार, दी. ३.५.२००६ को, मुमुक्षु श्री मेहुलकुमार नीमसोलंकी की दीक्षा संपन्न हुई। नूतन मंदिर की ध्वजा श्री ओटरमलजी भुरमलजी गोलांक परिवार प्रतिवर्ष चढाते है। चौहटे में इष्टयकजी मंदिर है इसी भवन में पाठशाळा का संचालन है।

 

३ . श्री शांतिनाथजी मंदिर : महावीर चौक स्थित नूतन पद्मप्रभु स्वामी जिन मंदिर के ठीक सामने पाषण से निर्मित घुमटबंध छोटे  से जिनप्रसाद में मुलनायक १६वे थिर्थानाक्र श्री शांतिनाथ प्रभु, श्री महावीर स्वामी व श्री मुनिसुव्रत स्वामी जिनबिंबो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, लुणावा के उपकारी गुरु पू. पं. श्री भद्रंकरविजयजी गनिवर व पू. पं श्री हर्षविजयजी गनिवर आ. ठा. की निश्रा में, वीर नि.सं. २४९८, शाके १८९३ व वि.सं. २०१८, फागन वदी ५ गुरूवार दी. २२ फ़रवरी १९७३ को संपन्न हुई। इस मंदिर का निर्माण संघवी भूताजी फागणिया परिवार ने करवाकर, श्री संघ लुणावा को सुपुर्द किया। प्रतिवर्ष फा. व. ५ को श्री कानमलजी रत्नाजी फागणिया ध्वजा चढाते है।

 

४ . श्री वासुपूजय स्वामी दादावाड़ी : नगर की बाहरी मुखय सड़क पर, श्री हंसराजजी गलजी ओसवाल छाजेड परिवार द्वारा, नवनिर्मित घुमटबंध जिनमंदिर व दादावाड़ी में मुलनायक श्री वासुपूजय स्वामी, मुनिसुव्रत स्वामी व महावीर स्वामी जिनबिंबो एवं आ. श्री हीरसूरीजी गुरुगौतम स्वामी, दादा गुरुदेव श्री जिनदत्तसूरीजी, श्री जिनकुशलसूरीजी, आ. श्री वल्लभसूरीजी गुरुमुतियो की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, नितिसमुदायवर्ती आ. श्री सुशीलसूरीश्वर्जी आ. ठा. पू. पं. श्री भद्रंकरविजयजी एवं पू. आ श्री कलापूर्णसूरीजी की पावन निश्रा में, वीर नि.सं. २५०१, शाके १८९६, वि.सं. २०३२ वर्षे , जेष्ठ शुक्ल ३, गुरूवार, दी.१२ जून १९७५ को, चतुर्विध संघ के साथ छाजेड परिवार ने, प्रतिष्ठा करवाकर ध्वजा-दंड-कलश को शिखर पर आरूढ़ किया। इस मंदिर का शिलान्यास व खनन पू. पं. श्री भद्रंकर विजयजी की निश्रा में हुआ था। जिनालय की रजत जयअंती एवं हंसाजी छाजेड परिवार द्वारा नवनिर्मित च्च्श्री छाजेड आराधना भवनज्ज् का उद्घाटन, वि.सं. २०५७, जेठ सुदी ३, सन २००१ को, आ. श्री सुशीलसुरीजी एवं आ. श्री जिनोत्तमसूरीजी आ. ठा. की निश्रा में, पंचाहिनका मोहत्सव के साथ संपन्न हुआ।

लुणावा : वि.सं. २०२६ का चातुर्मास आ.  श्री समुद्रसूरीजी आ. ठा ११ एवं सा. श्री प्रभाश्रीजी आ. ठा. ६ का संपन्न हुआ था। आ. श्री ने यही से चातुर्मास बाद हुथुन्दी तीर्थ में प्रतिष्ठा करवाई थी।

* वीर नि.सं. २४५९, शाके १८५४, ई. सन १९३३ एवं वि.सं. १९८९, माघ सुदी १० को प्रवर्तक श्री कांतिमुनिजी आ. ठा. की निश्रा में लुनावा में प्रतिष्ठा हुई।

* वि.सं. २०२३,२८,२९ के चातुर्मास पं. श्री भद्रंकरविजयजी के हुए एवं सं. २०३२ का चातुर्मास पू. आ. श्री कलापूर्णसूरीजी आ. ठा. ११, पू. पं श्री भद्रंकरविजयजी आ. ठा. और १०० के करीब साध्वीजी भगवंतो का भव्य चातुर्मास हुआ।

* पू. मू. श्री कलयाणप्रभ विजयजी वि.सं. २०२९, पौष वदी ५, दी. १२.१.१९७४ को, वर्धमान तप की १००वि ओली के १७वे आयमबिल पर, शाम ६.४५ बजे कालधर्म हुए।

* मू. श्री चंद्राशुविजयजी सह ५ श्रावक एवं सा. श्री सुरयमालाश्रीजी सह १९श्राविकाओ ने संयम लेकर भ. महावीर के मार्ग को अपनाया और मोक्ष मार्ग के राही बने।

 

* लुणावा उपकारी गुरु भद्रंकरविजयजी की स्मृति में ग़ाव से २कि.मी. दूर भद्रंकरविजयजी की स्मृति में ग़ाव से २ की.मी. दूर भद्रंकरनगर में श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु के सुन्दर कांच मंदिर का निर्माण हुआ।

* मुंबई-रानीबाग के पास नवनिर्मित ‘लुणावा भवन’ का हाल में ही उद्घाटन संपन्न हुआ।

आराधना भवन व ग्रंथालय : श्री विजयवल्लभ चौक के विशाल परिसर में पुरुषो के आराधना भवन में श्री छोगमलजी ताराचंदजी परिवार निर्मित, श्री महावीर गिआन भंडार में कूल ३१२१ पुस्तके व ६२५ प्राकृतसंस्कृतिक प्रति है।कूल ४००० से अधीक पुस्तकों का अप्रितम भंडार है। जिसकी व्यवस्था श्रीमान् शा. वस्तिमलजी थानमलजी फागणिया उत्कुष्ट तरीके से संभलते है। उन्ही के अनुसार इस भवन से सामने के आदेश्वर मंदिर तक अन्दर से सुरंग थी, जो की आक्रमणकारियो से बचाव हेतु बनाई गई थी। श्री महावीर जैन यूवा मंडल, लुनावा श्री संघ की सहयोगी संस्था है। जैनों की घर हौती करीब ७०० है। ग़ाव की कूल जनसंख्या तीन हजार के करीब है। अजैनो के कूल १५ मंदिर है, जिनमे प्रसिद्द खोडीयार माता मंदिर ,  चारभुजाजी, लक्ष्मीनारायण, ठाकुरजी, रामदेवजी, तालाब के ऊपर चमत्कारिक जरे माताजी मंदिर, ग़ाव से १ की.मी. दुरी अर कोटेश्वर महादेवजी मंदिर स्थित है। विधालय, हॉस्पिटल, बाली पुलिस चौकी, ग्रामीण बैंक, सोनवा बाँध व जवाईबांध से सिंचाई, दूरसंचार आदि हर सुविधाए है।

श्री लुणावा जैन प्रवासी संघ, भायनदर व श्री लुणावा जैन यूवा प्रवासी मंडल संघ की और सहयोगी संस्थाए है। लुणावा के भाईन्दर में ७२ परिवार बसे है। श्री मोहनजी उम्मेदमलजी जैन प्रसिद्ध मानद कवी, लेखक, गायक एवं गीतकार है। पुणे में लुणावा के अनेक परिवार है। श्री हिम्मतमलजी चन्दनमलजी परमार परिवार निर्मित भव्य वास्तु में श्री हिम्मतभोजनशाला का वर्षो से सुचारू संचालन हो रहा है। आप ही पुत्र श्री सुरेशजी परमार यहां के प्रसिद्ध व सक्रीय कार्यकर्ता है।

पेढी : श्री आदिपद्म शांति जैन देवस्थान पेढी

ठाकुरजी मंदिर के सामने, चौहटा, मु.पो.लुणावा-३०६७०६, तह.बाली, वाया-फालना, जिला-पाली, राजस्थान