खिवांदी / Khiwandi

खिवांदी / Khiwandi

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वीर प्रसूता भूमि राजस्थान प्रांत में वीरों एवं दानवीरों की यशोगाथा से इतिहास के पृष्ठो पर नई क्रांति का सूत्रपात करते हुए गोड़वाड़  के धरातल पर अरावली की पहाड़ियों की सुरम्य कंदराओं की गोद में, सुमेरपुर-तखतगढ़ मुख्य सड़क पर जवाई बांध (एरणपुरा रोड) रेलवे स्टेशन से 18 कि.मी. नेशनल हाईवे नं. 14 पर सुमेरपुर मंडी से 9 कि.मी. दूर पश्चिमोत्तर दिशा में तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा हुआ प्राकृतिक सौंदर्य से सरोबार व जवाई नदी के पास नगर बसा है खिवांदी। इसका प्राचीन नाम है क्षमानंदी। इस नगर को किसने बसाया उसके नाम और इसकी प्राचीनता के काई ऐतिहासिक प्रमाण तो प्राप्त नहीं होते, मगर नगरजन इस अत्यंत प्राचीन मानते हैं। वर्तमान में यहां 970 जैन घर वे 5000 के करीब जैन जनसंख्या के विशाल नगर में छ: जैन मंदिर विद्ममान हैं।

सेठ आनंदजी कल्याणजी पेढ़ी द्वारा, सं. 2010 में प्रकाशित ‘जैन तीर्थ सर्वसंग्रह’ग्रंथ के अनुसार, (पृष्ठ क्र. 213 और कोठा नं. 2737+2738) श्री संघ खिवांदी ने, (वीर नि. सं. 2322, शाके 1717, ई. सन् 1796), वि. सं. 1852 में मूलनायक श्री महावीर स्वामी, जो कि संप्रति राजा के समय की है, के साथ पाषाण की 13 व धातु की 4 प्रतिमाएं भूगर्भ से प्राप्त हुई व शिखरबध्द जिनालय का निर्माण करवाकर, वि.सं. 1854 में प्रतिष्ठित करवाई। 60 वर्ष पूर्व यहां 1000 जैन 3 उपाश्रय व एक धर्मशाला थी। जिनालय का वहीवट श्री संघ की कमेटी करती है।

अतीत से वर्तमान: ‘जैन तीर्थ सर्वसंग्रह’ ग्रंथ के पृष्ठ क्र. 213 के लेख अनुसार, बाजार में शिखरबध्द जिनालय में मूलनायक श्री महावीर स्वामी की प्राचीन और मनोहर प्रतिमा श्वेतवर्णी, पद्मासनस्थ, एक हाथ प्रमाण की है, जिसकी प्रतिष्ठा सं. 1854 में करवाई गई है। प्रतिमा पर कोई लेख नहीं है। इस मंदिर की प्रतिमाओं के बारे में प्राप्त जानकारी के अनुसार, गांव के ठाकुर देवड़ा श्री अनोप सिंह जी के समय में वि. सं. 1852 के श्रावण सुदि 11 के दिन, प्रथम गौड़ी पार्श्वनाथ भगवान की मूर्ति, धर्मशाला के पास के भूगर्भ से प्राप्त हुई थी। बाद में इस जगह पर सावधनी से अधिक खुदाई करवाने पर और 12 प्राचीन जिनबिंब प्राप्त हुए। इसी के साथ बड़ी मात्रा में धन भी प्राप्त हुआ। श्री संघ ने जिनालय निर्माण करने का निश्चय किया और वि.सं. 1852 के आषाढ़ वदि 3 (गुजराती श्रावण वदि 3) के शुभ दिन, मंदिर का शिलारोपण किया गया एवं वीर नि. सं. 2324, शाके 1798 व वि. सं. 1854 के फाल्गुन सुदि 2, मार्च 1798 को शुभ मुहूर्त में प्रतिष्ठा संपन्न करवाई गई।

प्रतिमांए प्राप्त होने के साथ-साथ पहाड़ में से, आरस पत्थर की खान भी मिली और इसी खान के पत्थनों से मंदिर निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ। आश्चर्य की बात यह हुई कि मंदिर का निर्माण पूर्ण होते ही खान में से पत्थर का निकलना भी बंद हो गया। इससे नवकोटि मारवाड़ में इस मंदिर की ख्याति बढ़ी और बड़ी मात्रा में लोग दर्शनार्थ आने लगे। प्रतिवर्ष कार्तिक सुदि 10 के दिन मेला लगता है।

शाह मोती कोला के प्राचीन चोपड़े के एक पुट्ठा पर लिखे हुए स्तवन से यह ज्ञात होता है कि मंदिर में संगमरमर (आरस) पाषाण की 13 प्रमिमाएं हैं और वर्तमान में जिनालय में 13 प्रतिमाएं ही विद्यमान है।

सन् 1987 में प्रकाशित ‘श्री यतींद्र विहार दिग्दर्शन’ भाग-2, के (पृष्ठ क्र. 87) अनुसार, वि. सं. 1854 के करीब खिमाणदी में बने एक सौधशिखरी जिनमंदिर में मूलनाय श्री महावीरस्वामी प्रभु की एक हाथ बड़ी सफेद वर्ण की प्रतिमा स्थापित है। इसके अलावा भी 12 प्राचीन प्रतिमांए वि. सं. 1852 में मोटी धर्मशाला की रांग (नींव) खोदते समय जमीन में से प्रकट हुई हैं।

बाजार में से होते हुए पहाड़ी की तरफ बढ़ते हुए दूर से ही पहाड़ी की गोद में, देदीप्यमान, देवविमान के स्वरुप, गगनचुंबी विशाल शिखर पर अठखेलियां करती, लहराती ध्वजा, दो विशाल गजराजों पर बैठे रक्षकों द्वारा रक्षित कलात्मक तोरणों से झरोखों से युक्त प्रवेशद्वार, 7-8 सीढ़ियां चढ़ते ही दूसरे द्वार से अंदर प्रवेश करते ही आंखें चकाचौंध हो जाती हैं। आभास होता है जैसे मानो स्वर्ग लोक से देवराज इन्द्र की स्वर्ण नगरी में खड़े हों।

स्वर्ण से मंडित राणकपुर की याद दिलाती कलात्मक स्तंभों की श्रृंखला, उन पर शोभायमान झीणी कोरणी से युक्त तोरण, प्रभु जीवन दर्शन के चित्रकारी पट्ट, आरस पत्थर से निर्मित गलीचा रुपी प्रांगण, 56 दिक्कुमारियों की अलग-अलग मुद्राओं से अलंकृत रंगमंडप, प्राचीन व चमत्कारी तीर्थ रक्षक अधिष्ठायकदेव की देहरी, नाग के रुप में धरणेंद्र प्रतिमा, अंबिकादेवी, सिध्दचक्र पट्ट, गुढ़मंडप में स्थापित सभी संप्रतिमालीन मनभावन प्राचीन प्रमिमांए व मूलगंभारे में विराजमान, इस अवसपर्णी काल के अंतिम तीर्थंकर, मूलनायक श्री महावीर स्वामी प्रभु की कलात्मक परिकरयुक्त श्वेतवर्णी अलौकिक प्रतिमा, जिसके दर्शन मात्र से रोम-रोम पुलकित हो उठता है। हाथ जुड़ने लगते हैं। मस्तक नमने लगता हैं। पैर वंदन करने को आतुर हो उठते हैं। अंतर्मन कह उठता है – हे, त्रिलोकीनाथ आज आपका दर्शन पाकर मैं धन्य हो गया। मुझे तीन लोक का वैभव मिल गया। मैं निहाल हो गया। मैं निहाल हो गया।

प्रभु की दायीं तरफ 20वें तीर्थंकर प्रभु श्री मुनिसुव्रत स्वामी तो दायीं तरफ प्रभु श्री शांतिनाथ दादा की प्रतिमा प्रतिष्ठित हैं।

मूल गंभारे के पीछे फिर से गंभारे युक्त देहरी में मूलनायक श्री पुरुषादानीय, जन-जन की आस्था केंद्र श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ प्रभु जिनके आसपास प्रभु श्री महावीर स्वामी, श्री शीतलनाथ प्रभु की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि. सं. 2502, शाके 1897, वि. सं. 2032, माघ शुक्ल 14, शनिवार, फरवरी 1976 को पू. उपा. श्री दर्शनसागर विजयजी के हाथों संपन्न हुई। रंगमंडप के घुमट में प्रभु श्री नेमिनाथजी की बारात के दृश्य सुंदर तरीके से अंकित किए हैं।

तस्मै श्री गुरुवे नम’ : छोटी सी त्रिशिखरी कलात्मक देहरी में बीच में खिवांदी के उपकारी पू. आ. श्री मंगलप्रभसुरिजी, दायीं तरफ गोडवाड जोजावर रत्न प्रतिष्ठा शिरोमणि पू. आ. श्री जिनेंद्रसूरिजी एवं बायी तरफ जिनालय के अंतिम प्रतिष्ठाचार्य श्री दर्शनसागरसूरिजी की प्रतिमाओं की स्थापना वि. सं. 2064, वैशाख वदि 5 (गु. चैत्र, वदि 5), मई 2008 को प्रसिध्द प्रवचनकार पू. मुनि श्री रैवत विजयजी आ. ठा. की निश्रा में संपन्न हुई।

विशेष: गांव से प्राप्त जानकारी अनुसार, मंदिर की प्रथम प्रतिष्ठा सं. 1854 में आ. श्री सोमचंद्रसूरिजी के हाथों हुई है।

शिलालेख: इस भव्य जिनालय में विराजमान 13 प्रतिमाएं, क्षमानंदी के ही श्रेष्ठिवर को स्वप्न दृष्टांत देकर, भूगर्भ से प्रकट हुई थी। भगवान श्री पार्श्वनाथ की प्रतिमा ने भूगर्भ से प्रकट होते ही कुछ चमत्कार बताए। स्वप्न के अनुसार, मंदिर निर्माण हेतु धन और पत्थर भी भूगर्भ से ही प्राप्त हुए। वि. सं. 1852, श्रावण सुदि 11, सन् 1795 के शुभ दिन प्रतिमाएं प्रतिष्ठित कर स्थापित की गईं।

वीर नि. सं. 2502, शाके 1897, वि.सं. 2032, माघ सुदि 14, शनिवार, फरवरी 1976 की प्रात: शुभवेला में पाताल से प्रकट हुए भगवान महावीर आदि बिंबों की प्रतिष्ठा एवं शंखेश्वर पार्श्वनाथादि जिनबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठादि मंगलकार्य आचार्य भगवंत श्री मंगलप्रभसूरीश्वरजी वासक्षेप प्राप्तकर आ. श्री सागरानंदसूरिजी के प्रशिष्य उपाध्याय श्री दर्शनसागरविजयजी द्वारा, हर्षोल्लास पूर्वक आयोजित करवाई गई।

ऐसा कहा जाता है कि ये प्रतिमाएं संप्रति राजा के काल की है जो देवयोग से भूगर्भ में समा गई थीं।… श्री जैन सकल संघ, क्षमानंदी। प्रतिवर्ष महा सुदि 14 को श्री के. सी. जैन, खिवांदी/लंदन परिवार ध्वजा चढ़ाते हैं।

  1. श्री शत्रुंजय मंदिर: यह मंदिर गांव के दक्षिणी छोर पर स्थित है। विशाल लंबे भूखंड पर शेठ कपूरचंदजी प्रतापजी शोभावत परिवार द्वारा निर्मित यह देरासर ‘शत्रुंजयावतार’ अथवा ‘शत्रुंजय’ के नाम से प्रसिध्द है। वि. सं. 1972 में वैशाख सुदि 13 को भूमिपूजन श्रीमती फूलीबाई कपूरचंदजी प्रतापजी शोभावत (वल्दरीया) ने किया। इसकी अंजनशलाका प्रतिष्ठा सं. 1988, माह सुदि 10 को पंजाब केसरी प.पू. आचार्य श्री ललितसूरिजी म.सा. द्वारा हुई। सं. 2027, माह सुदि 10 को बीस विरहमान, सिध्दचक्र, भावी चौबीसी प्रतिष्ठा प.पू. आ. श्री जिनेंद्रसूरिजी म.सा. द्वारा संपन्न कराई गई। इसी तरह सं. 2054, जेठ सुदि 6 को श्री गौतमसूरिजी, श्री नाकोड़ा भैरूजी, श्री अंबिका देवी की प्रतिष्ठा प.पू. श्री पद्मसूरिजी म.सा. ने संपन्न करवाई।

‘जैन तीर्थ सर्वसंग्रह’ ग्रंथ के अनुसार, ग्राम के बाहर श्री कपूरचंदजी प्रतापजी शोभावत परिवार द्वारा स्वद्रव्य से निर्मित शिखरबध्द मंदिर में वीर नि. सं. 2459, शाके 1854, ई. सन् 1933, वि. सं. 1989 में मूलनायक श्री आदिनाथ सह पाषाण की 4 और धातु की 4 प्रतिमाएं स्थापित करवाई गई। उस दिनों इसका वहीवट श्री रीखबदासजी चमनाजी करते थे। यह देरासर शत्रुंजयवतार के रुप में प्रसिध्द है। विशाल श्यामवर्णी दो हाथियों से शोभित प्रथम प्रवेशद्वार के अंदर प्रवेश करते ही झरोखों से शोभित जिनालय का मुख्यद्वार व विशाल स्वर्ण मंडित रंगमंडप, कलात्मक शिखर से शोभायमान गर्भगृह में देवलोक के देवों को भी जिनकी भक्ति करने का मन होता है, ऐसे श्री शत्रुंजय तीर्थाधिपति प्रथम तीर्थंकर प्रभु श्री आदिनाथ दादा की मन को मोहनेवाली उत्तम प्रतिमा प्रतिष्ठित है। इस मंदिर में बीस विरहमान तथा गत चौवीसी के तीर्थंकरों की प्रतिमाएं स्थापित हैं। 100 वर्ष प्राचीन मंदिर को मेवाड़ से लाकर प्रतिष्ठा की गई है। मुख्य प्रवेशद्वार के ठीक ऊपर की देहरी में गुरु मंदिर बना है। जिनालय में शत्रुंजय तीर्थ का बहुत बड़ा विशाल पट्ट बना है। संपूर्ण मंदिर परिसर को स्वर्णयुक्त कोरणी से आकर्षण बनाया गया है, जिसमें दर्शनार्थी अपनी आंखों को तृप्त करता हुआ परमात्मा की भक्ति में लीन हो जाता है।

श्री आदिनाथ प्रभु का यह विख्यात श्री शत्रुंजय मंदिर कई वर्ष पुराना है। सन् 1994 की प्रतिष्ठा को ध्यान में लेकर शोभावत परिवार ने अपने निजी मंदिर की व्यवस्था हेतु इसे मार्च 1994 में खिवांदी पोरवाल संघ के सुपुर्द कर दिया। संघ ने 11 लोगों का ट्रस्ट गठन कर श्री भबुतमलजी रिकबचंदजी शोभावत को अध्यक्ष नियुक्त किया। ट्रस्ट मंडल ने वीर नि. सं. 2520, शाके 1915, वि. सं. 2050, येष्ठ मास, दि. 30 मई 1994 को श्री आदिनाथ प्रभु के प्रथम गणधर श्री पुंडरिक स्वामी के गुरु प्रतिमा की अंजनशलाका प्रतिष्ठा धूमधाम से संपन्न करवाई। मंदिर के पास एक विशाल हॉल में श्री शत्रुंजय गिरिराज तथा आदिनाथ भगवान के भवों के पट्ट का निर्माण करवाया गया है।

संपर्क: श्री मनोजजी शोभावत – 09821154051

  1. श्री सप्तफणा पार्श्वनाथ मंदिर: खिवांदी नगर के मुख्य सड़क पर ‘अंबा बावड़ी’ नामक प्रसिध्द बावड़ी का श्रीमान तिलोकचंदजी चिमनाजी रामिणा एवं स्व. खुमीबाई परिवार द्वारा 70-80 वर्ष पूर्व, लोकहितार्थ निर्माण हुआ था। स्थानीय लोगों के पीने का पानी व पशुओं हेतु अवाडा का निर्माण हुआ। कालांतर में परिवार की भावना जिन मंदिर निर्माण की बनी। इसी के अंतर्गत प्रथम बावड़ी को ऊपरी निर्माण कार्य प्रारंभ किया गया। सं. 2005 में महा सुदि 5 को पू.आ.श्री सिध्दिसूरिजी के निर्देशन में पंन्यास प्रवर श्री कल्याणविजयजी, प.श्री सौभाग्यविजयजी के करकमलों से जाबालीपुर (जालोर) में अंजनशलाका करवाकर मंदिर के पास की पोल में भगवान को मेहमान तरीके से विराजमान किया गया। स्वद्रव्य द्वारा आरस पत्थर से निर्मित भव्य शिखरबध्द जिनप्रासाद में वीर नि. सं. 2481, शाके 1876, वि. सं. 2011, ई. सन् 1955 में तीर्थोद्वारक श्री नीतिसूरिजी के पट्टधर पू. सकलागम रहस्यभेदी आ. श्री हर्षसूरिश्वरजी म.सा. शिष्य श्री मंगलविजयजी आदि ठाणा के करकमलों से परमात्मा मूलनायक श्री सप्तफणा पार्श्वनाथ प्रभु आदि जिनबिंब व अंबाजी माता, यक्ष-यक्षिणी आदि प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा महोत्सवपूर्वक सुसंपन्न हुई।

समय के साथ शिखर एवं जिनालय में दोष निर्माण होने से ट्रस्ट ने इसका जीर्णोद्धार करवाया और इसकी पुन: प्रतिष्ठा वीर नि. सं. 2519, शाके 1914, वि. सं. 2049, वैशाख सुदि 6, दि. 28 मई 1993 को, दीक्षा दानेश्वरी पू. आ. श्री गुणरत्नसूरिजी आ. ठा. के वरद हस्ते, महोत्सवपूर्वक संपन्न हुई। श्री तिलोकचंदजी की वसीयत अनुसार पांच लोगों की ट्रस्ट कमेटी इसकी व्यवस्था संभालती है।

जानकारी प्रदाता: श्री अंबालालजी रामीणा – 09321966616

  1. श्री केशरियाजी मंदिर: नगर के मुख्य बाजार में श्री अचलचंदजी चत्तरभाणजी पोरवाल ने (इनकी कोई संतान नहीं होने से) अपने स्वद्रव्य से भव्य गृह मंदिर का निर्माण करवाया, जिसकी प्रथम मंजिल (20 सीढ़िया) पर कलात्मक कांच मंदिर में संगमरमर आरस पत्थर से निर्मित कलात्मक देहरीनुमा शिखरबध्द जिनमंदिर में प्रथम तीर्थकर मूलनायक श्री केशरिया आदिनाथ प्रभु की श्यामवर्णी, पद्मासनस्थ प्रतिमा सह श्री शांतिनाथजी, श्री पार्श्वनाथजी व अन्य जिनबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा पू. आ. श्री विजयजिनप्रभसूरीश्वरजी आ. ठा. के करकरलों से, वीर नि. सं. 2478, शाके 1873, वि. सं. 2008, जेठ सुदि 8, जून 1952 को, हर्षोल्लास व महोत्सवपूर्वक संपन्न हुई। इन प्रतिमाओं में श्री शांतिनाथजी व श्यामवर्णी पार्श्वनाथ प्रभु की अंजनशलाका, वि. सं. 1998 के मार्गशीर्ष शुक्ल 6, रविवार को पंन्यास प्रवर श्री कल्याणविजयजी के हस्ते हुई है। निर्माता परिवार ने बाद में जिनालय को वहीवट हेतु श्री जैन संघ, खिवांदी के सुपुर्द कर दिया।
  2. श्री ज्ञान मंदिर: खिवांदी मुख्य मार्ग पर श्री सप्तफणा पार्श्वनाथ जिनमंदिर के ठीक सामने स्व. कपूरचंदजी वनेचंदजी ओसवाल कासम गोत्र चौहान परिवार द्वारा स्व. निहालचंदजी की स्मृति में स्वद्रव्य से निर्मित श्री विनयचंद्र जिनेन्द्र पौषधशाला के विशाल भवन की तल मंजिल पर उपाश्रय हॉल से लगकर गृहनुमा जिनमंदिर में कमलाकार पबासन पर श्री सिध्दचक्रजी चौमुखी जिनप्रतिमाओं, श्री ऋषभानंदजी, श्री चंद्राननजी, श्री वारिषेणजी व श्री वर्धमानजी की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, वीर नि. सं. 2498, शाके 1893, वि. सं. 2028, वैशाख सुदि 6, शुक्रवार दि. 30.4.1972 को, गोड़वाड़ रत्न, प्रतिष्ठा शिरोमणि पू. आ. श्री जिनेंद्रसूरिजी के करकमलों से, महोत्सवपूर्वक प्रतिष्ठा संपन्न हुई। स्वयं श्री जिनेंद्रसूरिजी की उपस्थिति में उनकी स्वयं-प्रतिमा (जीवित-प्रतिमा) की स्थापना इसी मुर्हर्त में शिष्यरत्न श्री विनयविजयादि हस्ते हुई। साथ ही नितोडावाले ‘बाबोजी’, अधिष्ठायक श्री माणिभद्रवीर, चक्रेश्वरीदेवी आदि प्रतिमाओं की प्रतिष्ठा भी साथ में संपन्न हुई।
  3. श्री नीलकमल पार्श्वनाथ मंदिर: श्रीमती टीपूबाई रतनचंदजी हीराचंदजी मुथ्था रीलिजियस चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा खिवांदी-बांकली सड़क किनारे, भव्य-दिव्य शिखरबध्द जिनालय का आरस पत्थर से निर्माण हुआ है। प्रथम इस भूमि पर परिवारजन अपना निजी बंगला बना रहे थे, तब मातोश्री टीपूबाई ने, बंगले के साथ एक छोटा सा जिनमंदिर बनाने की इच्छा अपने परिवार के सामने रखी। परिवार ने प्रेरणा का आदर करते हुए उपरोक्त ट्रस्ट द्वारा बंगले के साथ मंदिर निर्माण का निर्णय लिया। दूसरे ओर मातोश्री को सपने में ‘नीलकमल पार्श्वनाथ’ प्रभु की प्रतिमा प्रतिष्ठित करने का संकेत मिला। मुंबई में विराजित पू. आ. श्री यशोदेवसूरिजी से मुथ्था परिवार ने चर्चा द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त कर कमलाकार मंदिर का निर्माण प्रारंभ करवाया। कार्य के प्रारंभ से ही नाग-नागिन की जोड़ी का यहां विचरण प्रारंभ हो गया। समय के साथ मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ।

ट्रस्ट ने देवविमान स्वरुप जिनमंदिर में मूलनायक श्री पुरूषादानी नीलकमल पार्श्वनाथ की नीलवर्णी, 27 इंची, पद्मासनस्थ प्रतिमा के चौमुखा आसन पर प्रभु श्री आदिनाथ श्री धर्मनाथ व श्री वासुपूय भगवान जिनबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि. सं. 2521, शाके 1916, वि. सं. 2051, वैशाख सुदि 7, रविवार दि. 7 मई 1995 को श्री नीतिसूरि समुदायवर्ती गच्छाधिपति आ. श्री अरिहंतसूरीश्वरजी एवं पू. श्री चंद्राननसागरसूरिजी आ.ठा. की पावन निश्रा में हर्षोल्लास से संपन्न हुई ट्रस्ट द्वारा जिनालय परिसर में श्री सम्मेतशिखरजी तीर्थ का निर्माण कार्य शुरु है। मां पद्मावती एवं श्री नाकोड़ा भैरवदेव की विशाल प्रतिमाएं स्थापित हैं।

विशेष:

  • वि. सं. 1975, जेठ सुदि 9, शनिवार, जून 1919 को पंजाब केसरी पू. आ. श्री वल्लभसूरिजी ने जैन समाज के 30 वर्ष पुराने कुसंप को सुसंप में बदल समाज में ऐतिहासिक एकता करवाई।
  • वि.सं. 2007 को चातुर्मास पं. श्री हीरमुनिजी आ. ठा. का हुआ। आपश्री के हस्ते खिवांदी निवासी मु. श्री तिलकमुनिजी को सं. 2008 में देसुरी में दीक्षा।
  • वीर नि. सं. 2502, शाके 1897 वि. सं. 2032 अंदाजन वैशाख मास, ई. सन् 1976 को, आ. श्री वल्लभ समुदायवर्ती, गोड़वाड़ सादडी रत्न पू. आ. श्री पूर्णानदसूरिजी के हस्ते खिवांदी में पू. श्री मोहनविजयजी के पट्टधर उपा. श्री सुंदरमुनिजी को आचार्य पद से अलंकृत करके नूतन आचार्य श्री मुनिसुदरसूरीश्वरजी नामकरण संपन्न हुआ। पदवी बाद प्रथम चातुर्मास रामगंजमंडी (राज.) व दूसरा सेवाड़ी (राज.) में हुआ।
  • वि. सं. 2034 में (वीर नि. सं. 2504, शाके 1899, ई सन् 1978) पू. मु. श्री नित्योदय विजयजी का चातुर्मास, समाज में फैले कुसंप को सुसंप पुन: मे बदला, उपधान तप, केशरियाजी संघ, प्रतिष्ठा-अंजनशलाका की।
  • वि. सं. 2043 (वीर नि. सं. 2513, शाके 1908, ई. सन् 1987) के मागसर सुदि 6 को नीति समुदायवर्ती – गच्छाधिपति पू. आ. श्री अरिहंतसिध्दसूरिजी के करकमलों से पू. पं. हेमप्रभविजयजी को ‘आचार्य पद’ से नवाजा गया व पू.आ. श्री हेमप्रभसूरीश्वरजी जाहिर हुए। वर्तमान में 450 साधु-साध्वियों म.सा. के अच्छनायक हैं।

संयम पंथ: इस पावन मरुधरा से 2 आचार्यो सहित लगभग 20 दीक्षार्थी-मुमुक्षुओं ने संयम लेकर जिन धर्म की पताका को लहराया और कुल व नगर का नाम रोशन किया। पू. आ. श्री चंद्रोदयसूरिजी व पू. आ. श्री कनकध्वजसूरिजी म.सा. सांसारिक पिता-पुत्र हैं। इन्होंने खिवांदी के नाम को ऊंचाई तक पहुंचाया है।

खिवांदी: इस विशाल नगर में छ: जैन मंदिर तथा जैनों के 917 घरों की कुल 5000 के करीब जनसंख्या है। अजैनों के 1300 घर हैं हाईस्कूल, कन्याशाला, गांधी मेमोरियल अस्पताल, देशी दवाखाना, मारवाड़ ग्रामीण बैंक, ग्राम सेवा सहकारी समिति आदि सारी सुविधाएं है।

मार्गदर्शन: जवाई बांध (एरणपुरा) से 18 कि. मी. नेशनल हाईवे नं. 14 पर, सुमेरपुर रोडवेज बस स्टैंड से 9 कि.मी., जोधपुर हवाई अड्डे से 160 कि.मी., तखतगढ़ से 14 कि.मी., आहोर से 34 कि.मी. व जालोर से 52 कि.मी. दूर खिवांदी के लिए बस, टैक्सी और ऑटो की सुविधा प्राप्त होती है।

सुविधाएं: यहां जैन धर्मशाला, अंबिका भवन, अरिहंत भवन, न्याति नोहरा, नानावटी धर्मशाला, पोरवाल भवन, पोरवाल आराधना भवन, अतिथि भवन के साथ आयंबिल खाता व भोजनशाला की उत्तम व्यवस्था है।

पेढ़ी: श्री महावीर स्वामी जैन पेढ़ी ट्रस्ट

सुमेरपुर – तखतगढ रोड, मेन बाजार, मु.पो. खिवांदी – 306901

तह. सुमेरपुर, जिला- पाली, राजस्थान

पेढ़ी संपर्क: 02933-241125, मो. 09950607822

मुनीम जी: श्री जयंतीलालजी जैन, खिवांदी – 09928086107

ट्रस्टी: श्री मोहनजी जैन – 09869984591

श्री पारसजी चौहान – 09820560061, 09950607822