घाणेराव / Ghanerao

घाणेराव / Ghanerao

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गोडवाड का प्रवेश द्वार फालना रेलवे स्टेशन से ३५ किमी. दूर सादडी-देसूरी मुख्य सडक पर २५ डिग्री अक्षांश और ७३ डिग्री पूर्वी देशान्तर पर स्थित अरावली के आंचल में कुंभलगढ की चोटी से १० किमी. दूर, सुरम्य वनस्थली में बसा है ‘घाणेराव’। घाणेराव का नाम पंद्रहवी शताब्दी से विभिन्न ऐतिहासिक पृष्ठों से प्राप्त होता है, जिसमें यह घाणेराव, घाणेर, घोणा, घोणेरू, घाणेरा आदि नाम से संबोधित होता रहा है। चरली नदी, जो मेदपाट के बनास नदी की सासूक के नाम से विख्यात है, के बायीं ओर यह कस्बा गोडवाड प्रांत की राजधानी के रूप में प्रसिद्ध है। भारत भर में एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि ‘ओ तो घाणेराव रो रावलो है कांई’। राजस्थान में यह दोहा प्रख्यात है।

‘गोडवाड में घाणेराव, आडावला में बाली, कांटा में कंटारिया, मारवाड में पाली’।

१५वीं शताब्दी में प्राचीन घाणेराव मुछाला महावीर के आस-पास बसा हुआ था। महाराणा कुंभा ने मूंछों पर उठे सवाल पर कहा कि एक जगह पर दो मूंछों वाले नहीं रह सकते और उन्होंने घाणेराव को वर्तमान स्थल पर आबाद किया। यहां के शिलालेख १०वीं शताब्दी से अद्यतन अपना पृष्ठ स्वर्णाक्षरों में पलट चौहान वंशीय राव लाखण, चालुक्य, राठौड वंशीय शाखाओं का इस क्षेत्र में शासक के रूप में अपना अस्तित्व है। घाणेराव का शासन १६८० ई. से चाणोद से मसुदा (अजमेर) तक का महाराणा अमर सिंह द्वारा प्रदन्त रहा। इस गांव का विकास महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह के काल में हुआ। प्राप्त १५० शिलालेखों की उपलब्धि इस बात का प्रमाण  प्रस्तुत करता है कि इसकी राज्य व्यवस्था, निर्माण में स्थापत्य कला का कितना योगदान रहा है। यहां का परकोटा, पंच दरवाजे, अंत दरवाजे, बावडियों की अद्भुत निर्माण कला,शिल्प, नाडियों, तालाब, नाले, छतरियां, मंदिर, महल, कोठियां, झालीवाव, ४२ वैष्णव मंदिर, १२ जैन मंदिर, ७ मस्जिदें और दरगाहों के रूप में इस वैभव को विस्तारित करता है।

यह वही घाणेराव है, जहां १०० वर्ष पूर्व चिंतामणि पाशर्वनाथ जी का नया मंदिर निर्मित हुआ, तो उसकी प्रतिष्ठा समारोह में नौ की तेरह वलें (स्वामीवात्सल्य) हो गई तब से यह मुहावरा प्रसिद्ध हो गया कि ‘नौ की तेरह घाणेराव’ में हुई। वरकाणा महासभा के ९९ गांवों की होने वाली मीटिंग जाजम की शुरुआत करने में घाणेराव के श्री जसराजजी सिंघवी का बडा योगदान था। यहां के ऐतिहासिक, दर्शनीय, अलौकिक, पौराणिक संगमरमर में कलाकृतियों से युक्त चमत्कारी ११ जिन मंदिर यहां की वैभवता प्रकट करते है।

पोरवालों के एक मंदिर को छोड सारे मंदिरों की व्यवस्था प्राचीन महावीरजी पेढी संभालती है।

घाणेराव में ओसवालों के लगभग ७०० घर व पोरवालों के १५० घर है। राणकपुर तीर्थ के निर्माता धरणाशाह के वंशज में उनकी चौदहवीं पंद्रहवीं पीढी भी आज घाणेराव में निवास करती है। छोडा तीर्थ की व्यवस्था घाणेराव पेढी देखती है।

श्री आदेश्वरजी मंदिर : घाणेराव नगर का यह सबसे प्राचीन जिनमंदिर है। मुख्य बाजार में रावले से लगकर विशाल परिसर में भव्य शिखरबंध इस जिनप्रासाद में अति प्राचीन प्रथम तीर्थंकर दादा आदेश्वर भगवान की ३० इंची श्वेतवर्णी सुदंर प्रतिमा प्रतिष्ठित है। कहते हैं यह मंदिर करीब १००० वर्ष प्राचीन राजा कुमारपाल के समय का बना है। जैन तीर्थ सर्वसंग्रह ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ ने इसे १५वीं शताब्दी में बनवाया, लेकिन कला व शिल्प से १२वीं शताब्दी का होना लिखा हैं। पाषाण की ४४ व धातु की १२ प्रतिमाएं होना भी दर्शाया है। समय-समय पर जीर्णोद्धार होते रहे। एक पगलिया पर सं. १९६७ वै. सु. ६ गुरुवार का लेख, प्रभु के पास धर्मनाथजी पर स. २०२४ वै सु. चंद्रे आ. श्री हिमाचलसूरिजी हस्ते प्रतिष्ठा-लेख, शांतिनाथजी प्रतिमा पर सं. २०३८ वै सु. ३ के लेख प्राप्त होते हैं। मंदिर में शिलालेख के अनुसार, इसकी प्रतिष्ठा वि. सं. २०३५, वै. सु. १४ रविवार को मेवाड केसरी के करकमलों से होने और ३०वीं वर्षगांठ पर वि. स. २०६५ में वै. कृ. ३ बुधवार को पू. श्री विद्यानंदविजयजी गणईवर्य हस्ते श्री नाकोडा भैरवदेव चक्रेश्वरी माता के प्रतिष्ठित करने का उल्लेख है। बाद में मूलनायक को यथावत अचल रखकर, इस मंदिर का संपूर्ण जीर्णोद्धार करवाया गया। ई. सन् १९९३ में आ. श्री प्रेमसूरिजी का श्रीरूंध विनती पर चातुर्मास हुआ व प्रतिष्ठा की विनती हुई। आ. श्री ने वि. सं २०५० वैशाख सु. १३, सोमवार दि. २३ मई १९९४ को सभी उत्थापित  प्राचीन प्रतिमाओ एवम बाहर से लाई नूतन प्रतिमाओं को पुनः धूमधाम से प्रतिष्ठा की। महोत्सव के बीच आ. श्री का ३६वां आचार्य पदारोहण दि. १७ मई १९९४ को विशेष रूप से मनाया गया। मंदिर परिसर के प्रांगण में दादावाडी बनी है। चार देहरियों में त्रिगडे प्रतिष्ठित हैं व नीचे भोयरे में भी प्रतिमाएं हैं। हर वर्ष मुख्य ध्वजा श्री कुंदनमलजी और खीमराजजी बाफना परिवार ध्वजा चढाते हैं।

श्री कुन्थुनाथजी मदिर:  नवीपाटी के वास में दो विशाल हाथियों से सुशोभित भव्य-दिव्य शिखरबंध मंदिर में श्वेतवर्णी कुंथुनाथ प्रभु की एक हाथ बडी अति आकर्षक प्रतिमा स्थापित हैं। रंगमंडप में मंडित शिलालेख के अनुसार यह वि. स. १८७२ वर्षे (शाके-१७३७), फाल्गुन शुक्ल ३, शनिवार को श्रीमत्त तपागच्छे भट्टारक श्री जिनेंद्रसूरिजी के उपदेश से ‘घाणपुर’ नि. हतुंडिया राठौड अमीचंद नाथाभाई परिवार द्वारा प्रतिष्ठित है। लि. प. शिवसागर गणी का यह लेख है। श्यामवर्णी बालगोता परमार वंशज श्री अधिष्ठायकदेव की आकर्षक प्रतिमा स्थापित है। हर वर्ष वै. सु. ६ को संघवी परिवार ध्वजा चढाते हैं।

श्री गोडीपाशर्वथजी मंदिर: माहेली वास के वास हिंगडो के पास में वावडी चौक में, प्राचीन नर्मदेश्वर महादेव मंदिर के सामने विशाल शिखरबंध जिनालय में श्वेतवर्णी, नौ फणाधारी, कलात्मक परिकरयुक्त श्री गोडीपाशर्वनाथ प्रभु की मनमोहक प्रतिमा प्रतिष्ठित है। द्वार पर दो कलात्मक विशाल गजराज से रक्षित में मूलनायक वि. सं १८ चै, १४ वर्षे (शाके -१६८०), ज्येष्ठ शुक्ल ३, गुरुवार को सामंत शिरोमणि राठौड वंशे श्री वीरमदेवजी ठाकुर के मंत्री घाणोरा नगरवासी लोढारुपाजी पुत्र बिहारीदासजी द्वारा गोडीपाशर्वनाथ प्रभु व आदिनाथ की प्रतिमा सिद्धचक्रजी तपागच्छाधिराज श्री विजय दयासूरिजी पट्टे भट्टारक श्री विजयधर्मसूरिजी के वरदहस्ते प्रतिष्ठित हुई। रंगमंडप में अनेक प्रतिमाएं शाके १६८० व वि. स. १८१४ की प्रतिष्ठित है। महावीर स्वामी व आदिनाथ दोनों परिकरयुक्त हैं। एक काउस्सगीया व नेमिनाथ, शांतिनाथ सभी इसी मुहूर्त की प्रतिष्ठित प्रतिमाएं हैं। किसी जमाने में यह मंदिर व महादेवजी मंदिरजी नदी किनारे थे, आज वह नदी नहीं है। मंदिर के बगल में प्राचीन बावडी है। नगर में कुल २७ बावडियां है। हर वर्ष वै. सु. ६ को श्री मोतीलालजी लोढा परिवार ध्वजा चढाते हैं।

श्री जिरावला पाशर्वनाथजी मंदिर: वावडी चौक में स्थित प्राचीन गुंबददार व शिखरबंध मंदिर में ऊपर प्राचीन जिरावला पाशर्वनाथ प्रभु की सवा हाथ प्रतिमा प्रतिष्ठित है। जीर्णोद्धार के बाद वि. स. २०४५ माघ सु. १३ दि. १८.०२.१९८९ को मेवाड केसरी आ. श्री हिमाचलसूरिजी हस्ते पाशर्वनाथ प्रभु की प्रतिष्ठा संपन्न हुई। पूर्व में एक प्रतिष्ठा वि. स. २०२४ वै. सु. ६ सोमवार को आ. श्री गुणरत्नसूरिजी के हस्ते संपन्न हुई है। १८५वीं शताब्दी में हींगड सुतरदासजी परिवार द्वारा निर्मित इस जिनालय में पूर्व में पाषाण की १४ व धातु की २७ प्रतिमाएं प्रतिष्ठित थी।

श्री चिंतामणि पाशर्वनाथजी मंदिर: नूतन निर्मित विशाल धर्मशाला के पास राजावतो के वास में आज से  १०६ वर्ष पहले वि. स. १९६३ फा. सु. ३ को श्री संघ द्वारा गुंबददार जिनालय का निर्माण करवाकर, श्री चिंतामणि पाशर्वनाथ प्रभु की बादामी वर्णी, पंचपरमेष्ठि स्वरूप पंचफणाधारी, आनंददायी प्रतिमा प्रतिष्ठित है। उस समय इसमें पाषाण की ८ व धातु की ९ प्रतिमाएं स्थापित थी। वि.स. २०६३ फा. सु. ३, मंगलवार दि. २०.०२.२००७ विजयजी की पावन निश्रा में शा. हंसराजजी जेठमलजी खींचा परिवार ने १०० वर्ष पूर्णता की ध्वजा फरकाई। इसी प्रतिष्ठा में ‘नौ’ की तेरह वलें (स्वामीवात्सल्य) हुई थी, उसी से यह मुहावरा प्रसिद्ध हुआ कि ‘नौ’ की तेरह घाणेराव में हुई’। श्री चिंतामणि शताब्दी चौक नामकरण हुआ।

श्री मुनिसुव्रत स्वामी मंदिर: पोरवालों की वास में मुरलीधर मंदिर के सामने श्री संघ द्वारा गुंबददार मंदिर का निर्माण हुआ व मु. प्रभु श्री शांतिनाथ प्रभु की प्रतिमा वि. स. १९६३ में स्थापित हुई। ऐसा लेख है व उस समय पाषाण की ७ व धातु की ४ प्रतिमाएं थी। प्राचीन इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाके श्री संघ ने पहली मंजिल पर वि. स. २०२५ (वीर. नि. स. २४९५) वै.सु. ६ को आ. श्री जिनेन्द्रसूरिजी के हाथों शांतिनाथजी की जगह प्रभु श्री मुनिसुव्रतस्वामी को प्रतिष्ठित किया व प्राचीन प्रतिमा को पुन: एक शिखरबंध देहरी में प्रतिष्ठित किया। इस मंदिर की रजत जयंती (२५ वर्ष) की पूर्णता पर वि. स. २०५० वै स. ६ दि. १८.०५.१९९४ को आ. श्री पद्ममसूरिजी की निश्रा में अष्टाहिका महोत्सव हुआ था। हर वर्ष श्री मोतीलालजी टामका परिवार वै. सु. ६ को ध्वजा लहराते हैं। श्री पोरवाल जैन संघ इसकी व्यवस्था देखते हैं।

श्री अभिनंदन स्वामी मंदिर: वांसा की वास (वर्तमान पटनी वास) में श्री अभिनंदन स्वामी के शिखरबंध जिनालय में गंभारे के बाहर लगे शिलालेख से इसकी प्राचीनता चक्र प्रकट होती है। चूडामणि भट्टारक श्री विजय धर्मसूरीश्वर जी के उपदेश से राठौड वंशे, मेडतिया राज ठाकुर श्री वीरमदेव के राज्य में राठौड लालचंद हरचंदे परिवार ने इसका निर्माण करवाकर प्राचीन संप्रतिकालीन मु. श्री अभिनंदन स्वामी की प्रभावशाली प्रतिमा प्रतिष्ठित की। साथ ही पाषाण की १० व धातु की ५ प्रतिमाएं स्थापित की। जीर्णोद्धारित मंदिर की जानकारी नहीं मगर हर वर्ष मगसर वदि १ को श्री सुरेश कुमार चुन्नीलाल पटनी परिवार ध्वजा फरकाते है। मंदिर रंगमंडप के आस – पास में जीर्णोद्धार का कार्य अभी भी चालू है।

श्री केशरियाजी मंदिर:  घाणेराव रावले के बाहर मायला वास में उपाश्रय के पास घुमटदार, श्वेत पाषाण में निर्मित छोटे मगर सुंदर जिनमंदिर में केशरिया ॠषभदेव की शांतिप्रदायिनी प्रतिमा व स. १८८३ में तपागच्छ श्री भट्टारक जिनेंद्रसूरिजी के हाथों प्रतिष्ठित है। हर वर्ष वै. सु. ६ को श्री रतनचंदजी लोढा परिवार ध्वजा फरकाते हैं।

श्री धर्मनाथजी मंदिर:  मुख्य बाजार में कोतवाली व पेढी के पास श्वेत पाषाण से नवनिर्मित भव्य कलात्मक व शिखरबंध जिनालय में मु. श्री धर्मनाथ प्रभु की अति प्राची कुमारपाल कालीन प्रभावशाली प्रतिमा प्रतिष्ठित है। वि. सं. २०१२ माघ सु. ६ बुधवार को प. कल्याणविजयी हस्ते पुन: प्रतिष्ठा हुई है। श्री संघ इसे २५३ साल प्राचीन मानते हैं। वि. स. २०६३, ज्ये, वदि २ दि. ४.५..२००७ को संपूर्ण जीर्णोद्धारित नतून जिनालय की प्रतिष्ठा आ. श्री पद्ममसूरिजी के हस्त संपन्न हुई है। जेठ वदि २ को श्री राईचंदजी खीचिंया परिवार ध्वजा चढाते हैं।

श्री चौमुखा पाशर्वनाथजी : ज्ञान मंदिर सादो री पाटी में ज्ञान मंदिर की प्रथम मंजिल पर सुंदर कलात्मक छत्री में चौमुखा पाशर्वनाथजी की प्रतिष्ठा वि. स. २०२४ वै. सु. ६ सोमवार को आ. श्री हिमांचलसूरिजी के हस्ते संपन्न हुई। एक गोखले में मु. श्री हितविजयी की गुरुमूर्ति, दूसरे गोखले में पंचधातु की जिन प्रतिमा विराजमान हैं।

पास ही वि. १९११ के प्रतिष्ठित तीन चरणयुगल स्थापित है, दूसरी मंजिल पर चौमुखा मंदिर ॠषभ-चंद्रानन वारिषेण वर्धमान जिन प्रतिमा प्रतिष्ठित है।

श्री नवा नाकोडा कीर्तिस्तंभ : सादडी – घाणेराव मुख्य सडक पर विशाल परिसर में नौ मंजिला भव्य दिव्य कीर्तिस्तंभ की प्रतिष्ठा, वि.स. २०३८ माघ सु. १४, रवि पुष्य, दि. ७.२.१९८२ को आ. श्री हिमाचलसूरिरजी के हस्ते संपन्न हुई। अभिनव नाकोडाधाम के इस कीर्तिस्तंभ की आठवीं व नौवीं मंजिल पर चौमुखा पाशर्वनाथ व महावीर स्वामी की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं। आ. श्री हिमाचलसूरिजी की गुरुमूर्ति व नाकोडा भैरवदेवजी की प्रतिमाएं सातवीं मंजिल पर स्थापित है। परिसर में आमने-सामने दो गुरु मंदिरों में आ. श्री हीरसूरिजी व मु. श्री हितविजयजी की मूर्तियां स्थापित हैं। श्यामवर्णी श्री पाशर्वनाथ प्रभु का मंदिर है। धर्मशाला व भोजनशाला की उत्तम व्यवस्था है। आगलोड श्री मणीभद्र तीर्थ उद्धरक पू. आ. श्री आनंदघनसूरिजी को वि. स. २०३९, आषाढ सु. ६ को कीर्तिस्तंभ तीर्थ पर पू. आ. श्री हिमाचलसूरिजी हस्ते आचार्य पद पर आरुढ किए गए।

श्री आदेश्वर दादा-घर मंदिर : सालवीयो की पाटी में वर्धमान आयंबिल खाते के सामने घाकाबंध छोटे से जिनमंदिर में आदेश्वर दादा की प्राचीन संप्रतिकालीन प्रतिमा प्रतिष्ठित है। यह घर मंदिर श्री चंदनमलजी वनेचंदजी परिवार द्वारा निर्मित है। पेढी की ओर से वै. सु. १३ को ध्वजा चढती है।

श्री हिमाचलसूरि दादावाडी : वि.स. २०४३ कार्तिक सुदि १२, दि. १३.११.१९८६ को मेवाड केशरी, नाकोडा तीर्थ उद्धारक आ. श्री हिमाचलसूरिजी का कालधर्म कीर्तिस्तंभ में हुआ। कुछ दूरी पर जहां अग्निसंस्कार हुआ, वहां बनी दादावाडी में हितविजयजी-हीरसूरिजी व हिमाचलसूरिजी की प्रतिमाओं की मु. श्री प. रत्नाकरविजयजी के हस्ते वि. स. २०५७ माघ सु. १४ सोमवार दि. ०७.०२.२००१ को प्रतिष्ठा हुई। घाणेराव में वि. स. १९८० मार्गशीर्ष सु. ६ को, दीक्षा, नाम हिम्मत विजय, वि. सं. १९८५ में पन्यास पदवी, वि.स. २००१ जेठ वदि ३ को आचार्य पद प्रदान व आ. श्री हिमाचलसूरिजी नाकरण हुआ। आप श्री का घाणेराव से विशेष लगाव रहा।

घाणेराव-रावला : राजस्थान के इतिहास में घाणेराव का ठिकाणा सुप्रसिद्ध रहा है। इस ठिकाने की स्थापना सन् १६०६ ई. में मेवाड के महाराणा अमरसिंह प्रथम के काल में मेडतिया राठौड ठाकुर गोपाल सिंह द्वारा की गई थी। घाणेराव के जागीरदार को गोडवाड के राजाजी कहकर ही आम लोग पुकारते थे, क्योंकि इस जागीरी में ३० से अधिक गांव थे। राजा को मालूम ही नहीं पडता कि प्रजा के साथ क्या सलूक हो रहा है। सीधे ठाकुर के पास आम लोगों की पहुंच ही नहीं थी। इसलिए मारवाड में यह कहावत प्रचलित हो गई थी कि ‘घोणेराव रा रावला में १७ गाडोरी पोल हैं’। किसी कार्य में अगर सुनवाई नहीं होती तो कहा जाता था कि ‘ओ तो घोणेराव रो रावलो है’। इस रावले (महल) को दो भागो में विभक्त कर रखा है, जनाना महल व मर्दाना महल। घाणेराव गढ की चित्रकारी में राजा-महाराजाओं के सोने की कारीगरों के व आखेट के चित्र हैं। गढ की बारादरी, झरोखे और गोकडे, राजाओं और ठाकुरी की शिल्पकला के प्रति लगाव का नमूना है। वर्तमान में इसको हेरीटेज होटल में रूप में विकसित किया गया है। यहां हजारों विदेशी पर्यटक आते हैं।

ॠषि-सिद्धि गजबदन मंदिर :  घाणेराव से मुछाला महावीर जाते समय प्रथम दायीं तरफ के गेट से अदर ॠद्धि-सिद्धि गणपति मंदिर आता है। जिसमें ॠद्धि-सिद्धि के बीच गणाधिपति का पति परमेश्वर के रूप में साढे सात (७.५) फीट का मनोहारी रूप एकटक निहारते बनता है। मंगलकारी दो पत्नियों की पांच फीट पांच इंच की मूर्तिया अपने पतिव्रता धर्म में निमग्न सोलह श्रृंगार युक्त, दर्शकों का मन मोह लेती है। इतनी भव्य-दिव्य प्रतिमा बिना सहारे अधर में खडी है।

इनकी बायी तरफ भव्य मारुति तथा दायीं तरफ काले भैरव की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का निर्माण जोधपुर महाराज जसवंतसिंहजी द्वारा हुआ है। यहां के साधक श्री मोतीगिरिजी ने सं. १८८२ मगसर सु. १० को जीवित समाधि ली थी। मंदिर के बाहर यहां का महत्व बताता शिलालेख गडा है।

ऐतिहासिक व पौराणिक धरोहर : घाणेराव में ८वीं शताब्दी का किलानुमा परकोटे से सुशोभित लक्ष्मी नारायण मंदिर अपना वैभव दर्शाता है। कालटुंक पहाडी पर २०० फीट की ऊंचाई पर पत्थरों से ढकी गुफा में मां हिंगलाज का पवित्र स्थान है, जहां अति प्राचीन मां का त्रिशूल धुणी के बीच लगा है। यहां की हसनवली काणा पीर दरगाह, कौमी एकता का ज्वलंत उदाहरण यह दास्तां है। शुर मगरी पर स्थित शुरवाणियां माताजी का प्राचीन मंदिर है। एक प्राकृतिक शिला के रूप में गढ की माता का मंदिर है, जहां से महल तक २००० फीट की सुरंग है। इसी के साथ मेन बाजार में अंबाजी मंदिर, श्री द्वादश ज्योतिर्लिग गुप्तेश्वर महादेव मंदिर, श्री शनिचर महाराज, श्री भेरुजी, श्री रामसापीर, श्री हनुमानजी, श्री कालिका माता, श्री चारभुजा, श्री पद्मनाथजी, श्री बिलेश्वर महादेव, श्री देवनारायण, श्री चामुंडा माता, श्री लक्ष्मीनाथ, श्री शीतला माताजी, श्री राम-लक्ष्मण, श्री द्वारिकाधीश इत्यादि मंदिर जन-जन की आस्था के केंद्र है। प्राचीन बावडिया यहां की ऐतिहासिक धरोहर है।

यहां टेरीनाल का बांध यहां की दस हजार जनसंख्या हेतु पानी की व्यवस्था बनाता है। १२वीं तक स्कूल, सरकारी व प्रायवेट हॉस्पिटल, ग्रामीण बैंक, पुलिस चौकी, दूरसंचार व्यवस्था, इत्यादि लोगों की दैनिक जरूरतों को पूरा करते हैं। नृसिंह अवतार बादरिया मुख्य त्योहार है। कस्बे से जुडी घाणेराव नदी है।

८५० की घर होती है, जैनों की कुल ४००० की जनसंख्या है। नवयुग मंडल, श्री मुछाला महावीर सोशल ग्रुप व वर्धमान मंडल यहां सहयोगी संस्थाएं हैं। विशाल गौशाला है। अनेक धर्मवीरों ने यहां संयम ग्रह किया है। यहां का कलाकंद व सेव प्रसिद्ध है।

मार्गदर्शन: सादडी से चारभुजा जाती सडक पर १० किमी. की दूरी पर मुख्य सडक पर यह कस्बा आबाद है। यह देसूरी से ७ कि.मी., नाडोल से २५ किमी. , राणकपुर से २० किमी. व मुछाला महावीर से ६ किमी. दूर है। सभी सरकारी बसें, प्रायवेट बस, टैक्सी इत्यादि आवागमन के मुख्य साधन हैं। नजदीक का रेलवे स्टेशन फालना ३६ किमी. व हवाई अड्डा उदयपुर ११० किमी. दूर स्थिति है।

सुविधाए : चिंतामणि पाशर्वनाथ मंदिर के पास नवनिर्मित द्विमंजिल विशाल धर्मशाला में आधुनिक शैली के २८ कमरों व ५ हॉल की सुविधा सह, उत्तम भोजनशाला बनी है। ५०० लोगों हेतु बिस्तर, तकिया और रजाई की व्यवस्था है। इसके अलावा शहर के बाहर कीर्ति स्तंभ पर १५ अटैच रूम व दो हॉल की सुविधा है। साथ ही भोजनशाला, विशाल प्रांगण एवं विशाल व्याख्यान हॉल की सुंदर व्यवस्था है।

पेढी: श्री आदिनाथ भगवान के भंडार की पेढी :मेन बाजार मु. पो. घाणेराव -३०६७०४, तहसील –देसूरी, जिला- पाली राजस्थान , अध्यक्ष :श्री कनकराजजी लोढा – ०९८२०२५८९३१, पेढी संपर्क : ०२९३४, २८४०२२,

मुनीमजी श्री रतनजी -०९४१४८१४४५३