धनला (प्राचीन धरला) / Dhanla (Old Name – Dharla)

धनला (प्राचीन धरला) / Dhanla (Old Name – Dharla)

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वीर-प्रसूता भूमि मरूधर की सुरम्य पुण्य धन्य धरा पर पाली जिलें में मारवाड़ जंक्शन रेलवे स्टेशन से ३० कि.मी. दूर अरावली पर्वतमाला की गोद में दोनों ओर नदी से घिरा एक प्राचीन नगर आबाद है धरला’, जिसका अपभ्रंस होते होते बन गया धनला’। विश्वप्रसिद्ध सूर्यनगरी जोधपुर के संस्थापक ऐतिहासिक वीर शिरोमणि श्री राव जोधाजी का जन्म संवत १४८४, वैशाख मास में इसी ‘धनला’ गांव में हुआ था। मारवाड़ देश की राजधानी जोधपुर को राजपूत राठौड़, धनला रत्न राव जोधाजी ने वि.सं. १५१६, ज्येष्ठ सुदि ११, शनिवार दि. १२ मई १४५९ के दिन, ४०० फुट ऊॅंची पहाड़ी की तराई में अपने नाम से जोधपुर नगर बसाया था। जनश्रुति के अनुसार, ६०० वर्ष पूर्व श्री धन्नाजी मीणा ने इस गांव की नींव रखी थी। अत: यह धनला नाम से प्रसिद्ध हुआ। वि. सं. १४६५ में मारवाड़ नरेश चूड़ाजी से आज्ञा लेकर राव रिडमलजी धनला सहित ४०-५० गांवों का जागीरी पट्टा इनाम में दिया। इन्हीं के वंशज वर्तमान में ठाकुरसा जसंवत सिंह भी जन-जन के आदरणीय है। वे भी धनलावासियों से स्नेह प्रेम रखते है।

सेठ आनंदजी कल्याणजी पेढी अहमदाबाद द्वारा प्रकाशित जैन तीर्थ सर्वसंग्रह’ (पृष्ठ क्र.४०१, कोठार नं.२६८७)  के अनुसार, श्री संघ ने धनला बाजार में शिखरबद्ध मंदिर का निर्माण करवाकर वि.सं. १५९७ में मूलनायक श्री शांतिनाथजी सह पाषाण की ६ व धातु की ४ प्रतिमाएं स्थापित करवाई। पूर्व में यहां १८० जैनी और एक उपाश्रय विद्यमान था।

अतीत से : समय निरंतर अपनी गति से दौड़ रहा था। बीच-बीच में मंदिर के कब जीर्णोद्धार हुए उसके कोई प्रमाणिक प्रमाण प्राप्त नहीं होते। गांववासियों के अनुसार २६५ वर्षों के बाद जिनालय का जीर्णोद्धार हुआ है। (प्रतिष्ठा सं. २०५८-२६५ वर्ष = १७९३ अर्थात संवत १७९३ में जीर्णोद्धार हुआ था) धनलावासियों ने जिनालय का नूतन जीर्णोद्धार, मूलनायक सह प्रतिमाओं को यथावत रखकर (उत्थापन करके) पूर्ण करवाया है। अपनी मेहनत से संचित लक्ष्मी का सदुपयोग करके देदीप्यमाप, देवविमान तुल्य, अद्वितीय, अलौकिक, झीणी कोरणीयुक्त भव्यातिभव्य श्वेत धवल आरस पाषाण से नवनिर्मित जिनप्रासाद अपने आप में अद्भुत शोभायमान बना है।

अतीत से वर्तमान त : २६५ वर्षों के बाद संपूर्ण जीर्णोद्धारित जिनालय की प्रतिष्ठा वीर नि. सं. २०५८, शाके १९२३, वि.सं. २०५८, वैशाख सुदि ३ (अक्षय तृतीया), बुधवार, दि. १५ मई २००२ को, मंगल मुहूर्त में प्राचीन मूलनायक श्री शांतिनाथजी की श्वेतवर्णी, १९ इंची, पद्मासनस्थ, पंचतीर्थीयुक्त नूतन परिकर में तथा प्राचीन श्री पार्श्वनाथजी एवं श्री अजितनाथजी प्रतिमाओं को सपरिकर तथा श्री शांतिनाथजी प्रभु की छत्रछाया में श्री वासुपूज्य स्वामी आदि जिनबिंबों की प्रतिष्ठा दशाह्निका महोत्सवपूर्वक संपन्न हुई। यह प्रतिष्ठा, प्रतिष्ठा शिरोमणि आ. श्री पद्मसूरिजी आ. ठा.४ और गोडवाड़ दीपिका पू. सा. श्री ललितप्रभाश्रीजी (लेहरो म.सा.) आ.ठा. व चतुर्विध संघ की अपार जनसमुदाय के साथ हर्षोल्लास से संपन्न हुई। इसी मंदिर में आबु योगीराज श्री शांतिसूरिजी की भव्य गुरू प्रतिमा व महान चमत्कारी अधिष्ठायक श्री मणिभद्रवीर प्रतिष्ठित है। प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया को राजमलजी पारेख परिवार ध्वजा चढाते है।

चातुर्मास एवं विशेष आयोजन : धनला की पावन भूमि पर, सर्वप्रथम सं. २००६ में, गोडवाड़ रत्न पू. आ. श्री जिनेन्द्रसूरिजी आ.ठा. एवं सं. २०३३ में पू. गुरूदेव के पट्टधर आ. श्री पद्मसूरिजी आ.ठा. का चातुर्मास सुसंपन्न हुआ। इसी कड़ी में वि.सं. २०४६ में भव्य ऐतिहासिक चातुर्मास, राजस्थान उदीपक पू. आ. श्री सूशीलसूरिजी आ. ठा. ६ एवं पू. सा. श्री दिव्यपज्ञाश्रीजी आ. ठा. १२० का हुआ। चातुर्मास में वर्षा व पवन के कारण श्री शांतिनाथ जिनमंदिर का दण्ड चलित हो गया। प्राचीन शिखर पर पुन: दण्ड ध्वजारोहण वीर नि. सं. २५१६, शाके १९११ व वि. सं. २०४६ के भाद्रवा वदि ६, दि. १२.८.१९९० को दशाह्निका महोत्सव पूर्वक सुसंपन्न हुआ। इस अवसर पर पू. आ. श्री सुशीलसूरिजी के श्री वर्धमान तप की ६०वीं ओली की पूर्णता श्रावण सुदि ४ को संपन्न हुई।

श्री देसरला परिवार द्वारा भव्य उपधान तप की आराधना कार्तिक वदि २, शनिवार, दि. ६.१०.१९९० को प्रारंभ होकर इसका मालारोपण वि.सं. २०४७ के मगसर सुदि ६, शुक्रवार दिनांक २३.११.१९९० को पूर्ण हुआ। इन कारणों से यह चातुर्मास ऐतिहासिक रहा।

दुर्भाग्यवश एक महत्वपूर्ण प्राचीन शिलालेख मंदिर के सामने कूडे के समान पड़ा है। ग्रंथ-संकलक द्वारा इसे साफ करवाकर सदृश फोटो भी लिया गया, परंतु इस लेख की लिपि को सही व स्पष्ट रूप से पढ न पाने के कारण भावार्थ नहीं लिखा जा सका है। यदि श्री संघ इसे किसी अच्छे भाषातज्ञ द्वारा पढवाये तो प्राचीन और ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त हो सकती है। यह हमारी ऐतिहासिक धरोहर है। इनका अच्छे से जतन करना होगा अन्यथा हमारा इतिहास धूमिल हो जायेगा।

धनला : दानवीरों की इस भूमि में करीब ५ विद्यालय, ग्रामीण बैंक, पशु चिकित्सालय, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, टेलीफोन, पानी, बिजली व आवागमन के सुलभ साधन जैसी अनेक जीवनाश्यक सुविधाएं उपलब्ध है। इसी गांव से लगभग ३ कि.मी. दूर नवनिर्मित राजराजेश्वरी माता सच्चियायजी की विशाल मंदिर भी भक्तों के आकर्षण एवं श्रद्धा का केन्द्र बना है। अन्य हिंदू मंदिर भी आस्था के केन्द्र है।

मार्गदर्शन : मारवाड़ जंक्शन रेलवे स्टेशन से ३० कि.मी., खिवाड़ा से १३ कि.मी. जोजावर से १० कि.मी., फुलाद से २० कि.मी. व जोधपुर हवाई अड्डे से १०५ कि.मी. दूर धनला हेतु हर जगह से बस, टैक्सी व ऑटों रिक्शा प्राप्त होते है।

सुविधाएं : नगर में एक उपाश्रय, दो धर्मशाला, जिसमें ३ हॉल (४० x ४०), ४ कमरें, १५० बिस्तर के पूरे सेट उपलब्ध है। न्याति नोहरा में संघ रसोडा (१०० x १००) व कमरे बने है।

पेढी : श्री शांतिनाथ जैन श्वेताम्बर संघ पेढी

मेन बाजार, मु.पो.धनला – ३०६०२५, तह. मारवाड़ जंक्शन स्टेशन, जिला-पाली, राजस्थान

पेढी संपर् : मुनीमजी : हितेशजी – ०२९३५-२६८०६७, ०९८२८४०७९२४

पुजारी : केवलचंद शर्मा – ०२९३५-२६८८५०, ०९७९९५२६४८५

ट्रस्टी : श्री माणकजी कोठारी – ०९८१९५०३२६७

श्री कल्याणजी मेहता – ०९८२००३४०११