चाणोद / Chanod

चाणोद / Chanod

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शूरवीरों के मरूधर में पाली जिले के राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर केनपुरा चौराहा से वाया लापोद २३ कि.मी. एवं रानी रेलवे स्टेशन से ३३ कि.मी. दूर एक प्राचीन नगर बसा है चाणोद’। इसका प्रमाणिक इतिहास तो प्राप्त नहीं होता, मगर गांववासियों के अनुसार, यह एक हजार वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। वर्तमान में चाणोद मेडतिया राजपूतों की राजधानी है। इनके वंश में कई अत्यंत शौर्यशाली व धार्मिक प्रवृत्ति के ठाकुर हुए। चाणोद का राजवंश राव दुदाजी से संबंधित है, जो इस प्रकार है – राव दुदाजी, वीरमदेवजी, प्रतापसिंहजी, गोपालदासजी, दुर्जशालजी, किशनदासजी और गोपीनाथजी। इनमें प्रतापसिंहजी पट्टा उदयपुर के महाराणा सांगा के दौहित्र थे। महाराणा ने संवत् १६०९ में चाणोद का पट्टा प्रतापसिंह को दिया था, जो इस समय चाणोद के नाम से है।

ठाकुर श्री विशन सिंहजी सं. १८०२ में गद्दी पर बैठे। इन्होंने ४५ वर्ष के दीर्घ कार्यकाल में कई जनहित कार्य किये। इनके समय में सं. १८२९ में बना तालाब अद्वितीय है। इसकी २ कि.मी. की पाल पत्थर व चूने से बनी है। जगह-जगह पर घाट बनाकर आमने-सामने स्नानादि की सुविधा के लिये सीढियां बनाई गई है। मुकनसिंह के पुत्र चिमनसिंहजी मौजूदा ठाकुर है। मुकन सागर बांध से किसानों को सिंचाई में लाभ हो रहा है। बावड़ी में नीचे तक सीढियां बनी है, जो पानी की कमी के समय काम आती है।

चाणोद ठिकाने को प्रथम श्रेणी के जुडिशियल पावर प्राप्त थे और ठिकाने की निजी पुलिस थी। चाणोद ठिकाने के कोर्ट का निरीक्षण इंस्पेक्टर जनरल पुलिस ही करते थे। भारत के स्वतंत्र हो जाने के बाद जागीर ठिकाना चाणोद को जुलाई १९५४ में अधिग्रहण कर लिया गया। ठाकुर मुकनसिंहजी का भी तारीख १७.१२.१९८५ को देहांत हो गया। जोधपुर रियासत से सीधे जुड़ा होने से चाणोद ठिकाना का काफी महत्व था। राजे-महाराजों का यहां आना-जाना रहता था। उन दिनों चाणोद की महिमा भारी थी। यहां की जागीरी में खिमेल-कोशेलाव तक का पट्टा आता था। आज भी यहां का विशाल महल (रावला) देखने योग्य है। इसी के ठीक पास जैन मंदिर बना है।

श्री महावीरजी मंदिर : बस स्टैंड से करीब आधा कि.मी. अंदर रावले के पास प्राचीन स्थापत्य कला से युक्त सुंदर व कलात्मक जिनप्रासाद में २४वें तीर्थकर प्रभु श्री महावीर स्वामी की श्वेतवर्णी, २७ इंची, पद्मासनस्थ, पंचतीर्थी परिकर से युक्त, अलौकिक प्रभावशाली प्रतिमा प्रतिष्ठित है। प्रतिमा के लेखानुसार, वीर नि. सं. २४९१, शाके १८८६ व वि.सं. २०२१ के माघ शुक्ल ५ वसंत पंचमी, शनिवार, फरवरी १९६५ को, पू. आ. श्री सुरेन्द्रसूरिजी के पट्टधर शिष्य श्री रामसूरिजी म.सा. डेहलावाला के वरद हस्ते प्रतिष्ठा संपन्न हुई। यही लेख मणीभद्रवीर प्रतिमा पर भी अंकित है।

श्री अमीविजयजी महाराज प्रतिमा लेख के अनुसार, पू. आ.श्री क्षमाभद्रसूरिजी के उपदेश से श्री वि. सं. १९९८, मगसर सुदि ६, सोमवार को उपा. श्री कपूरविजयजी के हस्ते प्रतिष्ठित हुई है। गंभारे के बाहर लगे लेख के अनुसार, वि.व. १९९६ के ज्येष्ठ सुदि, बुधवार को, पंन्यास श्री हितविजयजी के शिष्य पं. हिम्मतविजयजी के हाथों प्रतिष्ठा हुई है।

मंदिर के लेख के अनुसार मरूधर देशे चाणोद नगरे, वीर नि. सं. २५१८, शाके १९१३ व वि.सं. २०४८, ज्येष्ठ कृष्णा ६ सोमवार, मई १९९२ को, मूलनायक श्री महावीर स्वामी, श्री नेमिनाथादि जिनबिंबों की, यक्ष-यक्षिणी प्रतिष्ठा पू. आ. श्री प्रेमसूरिजी के शिष्य आ.श्री भुवनभानुसूरिजी शिष्य आ. श्री मेवाड़ देशोद्धारक जितेन्द्रसूरिजी स्व. शिष्य प्रशिष्य मु.श्री पद्मभूषण विजयजी, मु. श्री निपुणरत्न विजयजी आदि ठा. व संघ सह प्रतिष्ठा संपन्न हुई। प्रतिवर्ष ध्वजी शा. संघवी फूलचंदजी हीराचंदजी नाहर परिवार चढाते है। भमती में श्री मु. अमीविजयजी, आ.श्री सुरेन्द्रसुरिजी, आ. श्री विजयानंदसूरिजी आदि गुरू प्रतिमाएं प्रतिष्ठित है। प्रथम मंजिल पर भी प्रतिमाएं स्थापित है।

इतिहास े झरोखें से : आ.श्री यतीन्द्रसूरिजी रचित मेरी गोडवाड यात्रा’ के अनुसार, ७० वर्ष पहले एक मंदिर, मूलनायक श्री शांतीनाथजी, ४ उपाश्रय, २ धर्मशाल व ओसवालों के १७२ घर थे। प्रचीन मूलनायक की जगह नूतन मूलनायक महावीर स्वामीजी को क्यों विराजमान किया गया, इसका पता नहीं चला।

जैन तीर्थ सर्वसंग्रह’ ग्रंथ की प्राप्त जानकारी के अनुसार, श्री संघ ने रावला के चौगान में शिखरबद्ध जिनालय का निर्माण करवाकर वि. सं. १७०० के लगभग, मूलनायक श्री शांतिनाथजी के साथ पाषाण की २३ प्रतिमाएं व धातु की १६ प्रतिमाएं प्रतिष्ठित करवाई। मंदिर की व्यवस्था श्री लालचंदजी चेनाजी संभालते थे। प्रतिमा पर वि.सं. १७९८ को लेख है। पूर्व में यहां ४०० जैन बसते थे तथा एक उपाश्रय और १ धर्मशाला विद्यमान थी। इस जानकारी से मंदिर करीब ३५० वर्ष से ज्यादा प्राचीन जान पड़ता है। साथ ही ठिकाने की प्राचीनता देखे तो यह सत्य जान पड़ता है।

दादावाड़ी : नगर प्रवेशद्वार व तालाब के निकट, सुंदर बगीची का निर्माण शा. वस्तीमलजी उम्मेदमलजी पारेख परिवार द्वारा हुआ है। इसी में गृह मंदिर के रूप में मूलनायक श्री महावीरजी स्वामी व गुरू गौतम स्वामीजी की प्रतिमाएं स्थापित है। इसी परिवार द्वारा विद्यालय का निर्माण हुआ है। मंदिर की प्रतिष्ठा वीर नि.सं. २४९१, शाके १८८६ व वि.सं. २०२१ के माघ शुक्ल ५ वसंत पंचमी, शनिवार, फरवरी १९६५ को पू. आ. श्री सुरेन्द्रसूरिजी के पट्टधर शिष्य श्री रामसूरिजी म.सा. डेहलावाला के वरद हस्ते संपन्न हुई।

गांववालों के अनुसार, यहां पर एक कुंड था, जो जालवेरा के नाम से प्रसिद्ध था। कभी यहां नमक की खाने हुआ करती थी, जिसके कारण गांव का पानी कुछ खारा है।

दीक्षा : वीर नि. सं. २४४९, शाके १९४५, वि.सं. १९८०, आषाढ सुदि, जुलाई १९२३ को चाणोद निवासी पोरवाल हीराचंदजी को वडावदा (म.प्र.) में नूतन आ. श्री भूपेन्द्रसूरिजी ने अपने हाथों प्रथम दीक्षा देकर मु.श्री हीरविजयजी नाम रखा व उपा. श्री गुलाबविजयजी क शिष्य बनाये।

चाणोद : छोटे-बड़े ५ विद्यालय, राज्य चिकित्सालय, पशु चिकित्सालय, मारवाड़ ग्रामीण बैंक, मुकन-सागर बांध से सिंचाई, दूरसंचार, डाकघर इत्यादी समस्त, प्राथमिक सुविधाएं उपलब्ध है। गांव में जैन मंदिर के आलावा केशवराजजी का मंदिर, जिसमें चारों धाम की चारों कोणों पर झांकियां बिठाई गई है। श्री लक्ष्मी नारासण, तालाब पर स्थित गढ, जिसमें सुंदर शिवमंदिर व दुर्गा मंदिर स्थित है। रावले के सामने श्री केसरियाजी व पास में नया मंदिर बना है। जैनों के २०० घर व ८०० की जनसंख्या है। गांव की कुल आबादी ५००० के करीब है।

मार्गदर्शन : रानी रेलवे स्टेशन से ३५ कि.मी. जोधपुर हवाई अड्डे से १४० कि.मी. पाली से वाया डेण्डा ४० कि.मी., नेशनल हाईवे नं. १४ पर वालराई से वाया विठुडा होकर २० कि.मी. स्थित चाणोद हेतु बस, टैक्सी और ऑटों की सुविधा है।

सुविधाएं : भटवाड़ा की (नयातिनोहरा)धर्मशाला में ६ कमरे (नॉन अटैच) बने है। एक हॉल है। २५० बिस्तर के पूरे सेट है और सुंदर भोजनशाला की सुविधा है।

पेढी : श्री ओसवाल मू.पू.जैन संघ

मेन बाजार, मु.पो.चाणोद-३०६६०२, तह.बाली, जिला-पाली, राजस्थान

पेढी संपर् : द्वारा-०२९३८-२८२८२१, मुनीमजी : दिलीप जैन – ०९७९९३२९३६५

ट्रस्टी : श्री हीराचंदजी सा., मुंबई – ०९८२०१८५५०९, श्री कमलजी पारेख, मुंबई – ०९८२११६४३८५