बूसी / Busi

बूसी / Busi

SHARE

राजस्थान राज्य के पाली जिले में पाली-नाडोल मेगा हाईवे पर पाली से २७ कि.मी. और नजदीकी रेलवे स्टेशन सोमेसर से मात्र ५ कि.मी. दूर हाईवे पर सुमेर नदी के किनारे गांव बसा है- बूसी’।

इतिहास े आईने में…

यहां के प्रसिद्ध बालाजी मंदिर से नगर की प्राचीनता प्रकट होती है। ऐतिहासिक तौर पर बालाजी मंदिर भूमि पर स्थित है। यह धार्मिक स्थली किसी समय एक नदी के किनारे स्थित थी, जो आबादी बढने के साथ-साथ अब गांव के ठीक मध्य में बिलकुल जैन मंदिर से लगकर है। पास ही नगर का वावला (महल) स्थित है। इस मंदिर के आसपास जमीन खोदने पर अवशेष मिलते है।

बुजुर्गो के अनुसार, बालाजी लंबा पतरी (वृज घोटा)और गोल पत्थर (गेंद) खेलने जाते थे तथा कई बाद वृज घोटा और गेंद (बैट-बॉल) जंगल में ही छोड़ आते थे। ठिकाना वालों के अनुसार, लोग बैलगाड़ी में डालकर वापस इसे मंदिर में यथास्थान पर रखते थे, जो आज भी मौजूद है। यह चमत्कार बुजुर्गो द्वारा प्रत्यक्ष देखा हुआ है।

कहते है सं. १८९३ में गंठीया रोड (धास्ती) में गले में गांठ की महामारी का प्रकोप फैल गया था। कई लोगों को मौत के मुंह में जाना पड़ा। ठिकाने के घराने द्वारा बालाजी की पूजा अर्चना की गई। जब बालाजी का भाव (बरतावा में) बताया गया, तो उसके अनुसार ग्राम के गाय, भैस का दूध एकत्रित कर बालाजी का चरणामृत दूध में डालकर मिट्टी के बड़े बर्तन (मटका) के नीचे छेद कर दूध से भरकर गांव के चारों ओर घुमाया गया और बाकी का चरणामृत नगरवासियों द्वारा अपने-अपने घरों में छिड़कतें ही महामारी बीमारी का प्रकोप नष्ट हो गया।

कभी इस नगरी का विस्तार नाडोल (नंदावती नगरी), जो बुसी से २५ कि.मी. दूर है, तक था। नाडोल की सरहद बूसी गांव तक फैली हुई थी। आज भी सड़क की तरफ दक्षिण दिशा के फलसे को नाडोल का फलसा कहलाता है। हर मंगलवार और शनिवार को दर्शनाथ मेला सा लगता है। दूर-दूर से लोग मन्नत मांगने व पूर्णता पर प्रसाद चढाने आते है।

ट्रस्ट द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार का निर्णय कर प्रत्यक्ष कार्य प्रारंभ किया गया। प्रतिष्ठा पूर्व बालाजी का आकार गेंद की तरह गोल था। मंदिर के हटाने पर पता चला की अंदर मूर्ति है। मूर्ति के ऊपर का सिंदूर और मालीपना हटाने पर सवा पांच फीट की श्री हनुमानजी की मूर्ति के दर्शन हुए। मूर्ति पर से हटाया गया सिंदूर मालीपना की परतें ५५ बोरों में भरी गई और इन्हें बाजे-गाजे के साथ हरिद्वार में गंगा नदी में विधिपूर्वक विसर्जित करवाया गया।

नूतन जीर्णोद्धारित मंदिर श्री राममंदिर की प्रतिष्ठा वि.सं. २०६९, आषाढ वदि ९, बुधवार दि. १३ जून, २०१२ को महोत्सवपूर्वक संपन्न हुई। पांडवकालीन होना ही नगर की प्राचीनता को प्रकट करता है।

जिनमंदिर ी प्राचीनता : कहते है कि यहां का जैन मंदिर ३०० से अधिक वर्ष पुराना है। नूतन मंदिर में प्रथम मंजिल पर जाती सीढ़ीयों के पास दीवार में शिलालेख लगा है, जिसके अनुसार सं. १८९७, शाके १७६२ प्रवर्तमान (वीर नि.सं. २३६७ और ई. सन् १८४२) वैशाख मासे कृष्ण पक्षे १३ तीथी सोमवारे… का बड़ा शिलालेख है। मगर संवत् से २७५ वर्ष प्राचीन प्रमाणित होता है। शिलालेख में ऊपर ।।श्री वीर प्रमातमा ऐ नमा।।‘  लिखा है। इसके अगल-बगल में चांद व सूरज उकेरा हुआ है। इससे यह पूर्व से ही महावीर स्वामी का मंदिर साबित होता है।

जैन तीर्थ सर्वसंग्रह ग्रंथ के अनुसार, श्री संघ बूसी ने वि. सं. १८५० मं शिखरबंध मंदिर का निर्माण करवाया और मूलनायक श्री महावीर स्वामी आदि पाषाण की ४ और धातु की ३ प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई। प्रतिमा पर लेख का संवत् १८९३ वर्ष है। पहले यहां ५० जैन, एक उपाश्रय और १ धर्मशाला थी। यह प्राचीनता का दूसरा प्रमाण है।

कालांतर में समय-समय पर जीर्णोद्धार होते रहे होंगे, मगर कोई प्रमाण नहीं मिलते। कुछ वर्षो पूर्व सा. श्री दानलताश्रीजी से प्रेरणा पाकर श्री संघ ने जिनालय में प्राचीन मूलनायक श्री महावीरस्वामीजी आदि जिनबिंबों को तल मंजिल व नूतन श्री पार्श्वनाथ प्रभु आदि जिनबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि. संवत् २५१७, शाके १९१२, वि.सं. २०४७, द्वि. १९ मई १९९१ को विजय मुहुर्त में आ.श्री प्रतिष्ठा शिरोमणि पद्यसूरिजी आदि ठाणा व सा. श्री दानलताश्रीजी आ.ठा. सह चतुर्विध संघ की उपस्थिती में प्रथम मंजिल पर नूतन पार्श्वनाथजी वासुपूज्य व शांतिनाथजी की प्रतिष्ठा संपन्न हुई। दो अन्य नूतन प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा सं. २०४८ माघ शु. ११, शनिवार, फरवरी १९९२ को श्री पद्यसूरिजी के हस्ते संपन्न हुई है। ध्वजा के लाभार्थी श्री जितेन्द्रकुमार अखेराजजी बोहरा परिवार है।

दो े बीच पुस्तक (पृष्ठ क्रं.१०६) के अनुसार, वीर नि.सं. २४७९, शाके १८७४, वि.सं. २००९, मागसर सुदि ११, दिसंबर १९५३ में, पं. हीरमुनिजी व सुंदरमुनिजी के हस्ते यहां पर प्रतिष्ठा संपन्न हुई है। लेकिन किसकी? इसका उल्लेख नहीं है। नगर में पांच छोटी बड़ी स्कूले, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, दूरसंचार, मारवाड़ ग्रामीण बैंक, पुलिस चौकी खौड, इत्यादी सभी सुविधाएं उपलब्ध है। कुल ५००० की जैन आबादी है। जैनों के ३०० घर (हौती) है और १५०० के लगभग जैन जनसंख्या है। नगर से लुणिया व चंगेडिया परिवार से दो दीक्षाएं संपन्न हुई है।

मार्गदर्शन : पाली-नाडोल मेगा हाईवे पर स्थित बूसी नगर नेशनल हाईवे क्र. १४ पर मंडली से २५ कि.मी. दूर स्थित है। सोमेसर रेलवे स्टेशन से मात्र ५ कि.मी. दूर हाईवे पर स्थित होने से यहां आवागमन के लिये सरकारी बसें, प्रायवेट बसें, टैक्सी, ऑटो आदि की पूर्ण सुविधाएं है। नजदीक का हवाई अड्डा जोधपुर यहां से ११० कि.मी. दूर है।

सुविधाएं : मंदिर के ठीक पीछे विशाल न्याति नोहरे में आधुनिक सुविधायुक्त ८ अटैच कमरे है। एक बड़े हॉल के साथ, संघ व बड़े आयोजन हेतु बड़ा रसोईघर है। कुल १२५ लोगों हेतु बिस्तर के पूरे सेट है। उपाश्रय व उत्तम भोजनशाला की सुंदर व्यवस्था है। जैन स्थानक  में भी सुविधा है।

पेढी : श्री जैन श्वेताम्बर देव ी पेढी

बालाजी हनुमान चौक, रावले के पास, मु.पो.बूसी-३०६५०३

पाली-नाडोल मेगा हाईवे, तहसील-रानी, राजस्थान।

पेढी संपर् : सूरजमलजी मेहता – ०२९३४-२४२०२८,

श्री शांतिलालजी मेहता-०९९८२३३१६९८

ट्रस्टी : श्री जयंतीलालजी बोहरा, मुंबई-०९३२३९७५२५३

पुजारी : जनक ठाकर – ०९६६०४६४३६९