श्री पंच परमेष्ठि श्री सिद्धचक्र यंत्र-मंत्र से ही…केवल ज्ञान, मोक्ष सुख रुपी...

श्री पंच परमेष्ठि श्री सिद्धचक्र यंत्र-मंत्र से ही…केवल ज्ञान, मोक्ष सुख रुपी शक्ति का भंडार भरा पडा है – मुनि श्री विनीतरत्न विजय (सज्जाईवाला) म.सा.

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-सुरत। धर्म नगरी सुरत के विशाल न्यु मॉर्डन सिटी में जिन मंदीरों व उपाश्रय से शोभायमान पाल क्षेत्र के श्रीपाल श्वे. मू. पू. जैन संघ में चैत्र मास की नवपद शाश्वत ओली की आराधना साधना में विशाल जाहीर प्रवचन में महावीर स्वामीजी जन्म महोत्सव का संगीत साथे व श्री शत्रुंजय गिरीराज की संगीत, साथे भाव यात्रा के साथ संपन्न हुआ।

इस दौरान मुनिवर्य श्री विनितरत्न विजयजी म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि जैन धर्म के तत्वसार रुपी श्री पंच परमेष्ठि व श्री सिद्धचक्र यंत्र का ध्यान-जाप-तप-ज्ञान के साथ हृदय में स्थिरता से आत्म जागृता के साथ शान्ति-समाधि-सद्गति के साथ परमगति। सिद्धपद तक पहुंचाने की शक्ति भरी पडी है सिर्फ जागृत करने की जरुरत है। हजारों साल पहले का जिवता जागता द्रष्टान्त श्रीपाल राजा और मयणां सुन्दरी का जीव मात्र को जागृत करता है ऐसे आज भी हजारों द्रष्यंत इतिहास के पन्नेपर भरे पड़े है।

जगत में शाश्वत-श्वास मंत्र-जाप-तप-भक्ति ध्यान-ज्ञान सिर्फ सिद्धचक्र के नवपद पंच परमेष्ठि के पांच पद को हृदय रुपी आत्मा में स्थिर करके खून के दीपे दीपे में अरिहन्त-अरिहन्त की आवाज भर दो – यही इसी दुनिया में सब कुछ प्राप्त होगा कही बाहर किसी के पास भटकने की भीख मांगने की जरुरत नहीं पड़ेगी इतिहास के पन्ने पन्ने में हजारों द्रष्यंत पड़े है। दुनिया जगत को सुधारने की जरुरत नही है जातको सुधारने के लिये जगत को देखने की जरुरत नही अन्दर के आत्मा रुपी बंद दरवाजा को खोलो – हृदय भाव के साथ दर्शन वंदन जाप करोगे तो अपार खजाना भरा पड़ा है इस आत्मा रुपी साक्षात जात के दर्शन होते ही काया। शरीर-इन्द्रिय – को भूलकर यहीं संसार में साधुवेश में ही केवलज्ञान रुपी ज्ञान का व आत्मा रुपी परमपद सिद्धपद का दर्शन होता रहेगा -देव परमात्मा व गुरु की आज्ञा मानी यानि मन को मारा जीवन सफल – परन्तु जिसने मन का माना अनन्त संसार में रखडपट्टी चालू रहेगी, विचारना अन्त में आत्म कल्याण-समाधि-आनन्द-शान्ति-सदगति-परमपद के लिये हृदय रुपी आत्मा में चलते – फिरते – उठते – बैठते – २४ घंटे अरिहन्त-अरिहन्त – एक ही पद खून के टीपे में स्थिर कर दो।

अनुकुलता -एकाग्रता – चित्त प्रसन्नता – चित्त प्रसन्नता – खुमारी शान्ति टाईम मिले तब आँख बंद करके सामने श्री सिद्धचक्र यंत्र पद स्थिर करके खूब उत्साह के साथ ॐ ह्रीं श्री पंच परमेष्ठि नमो नमह: (२१ बार) ॐ ह्रीं श्री सिद्धचक्राय नमो नमह: (२१ बार) का खूब भाव से जाप-ध्यान-के साथ स्थिर हृदय में करलो – कुछ ही दिनों में आप पायेंगे जिसके लिये में रात-दिन भटक रहा हँू वह तो मेरे अन्दर ही है जिन्दगी जिने का मजा ही कुछ और आयेगा व अन्य को प्रेरणा भी मिलेगी। अत: में चतुविर्ध संघ में खूब उत्साह-आनन्द- के साथ अगले आने वाले चातुर्मास की विनंती भी की।