तो क्या इसे पाली की राजनीति से जैन समाज की विदाई माना...

तो क्या इसे पाली की राजनीति से जैन समाज की विदाई माना जाए?

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निरंजन परिहार

जयपुर। राजनीतिक रूप से पाली में जैन समाज का प्रभुत्व खत्म होता दिख रहा है। अब तक कुल 12 बार बीजेपी एवं कांग्रेस दोनों पार्टियों से जैन उम्मीदवार विभिन्न लोकसभा चुनावों में पाली से विजयी रहे हैं। लेकिन अब बीजेपी और कांग्रेस दोनों ने जैन उम्मीदवारों से किनारा कर लिया है। सन 2004 आखरी लोकसभा चुनाव था, जब बीजेपी के पुष्प जैन के सामने कांग्रेस के सुरेंद्र सुराणा थे। इस चुनाव तक पाली में अकसर जैन उम्मीदवार ही आमने सामने होते थे। लेकिन इसके बाद तस्वीर बदल गई। सन 2009 में कांग्रेस ने सुरेंद्र सुराणा के बजाय जाट नेता बद्री राम जाखड़ को उतार कर जैन समाज का पत्ता साफ कर दिया, तो पिछले चुनाव में बीजेपी ने भी किसान समुदाय से पीपी चोधरी को उम्मीदवारी देकर पाली सीट से जैन समाज को खारिज कर दिया।

लोकसभा में पाली से सांसद के रूप में दो बार बीजेपी के पुष्प जैन, तीन बार बीजेपी से न्यायमूर्ति गुमानमल लोढा, तीन बार कांग्रेस से मूलचंद डागा एवं एक – एक बार कांग्रेस से मीठालाल जैन, जनता पार्टी से अमृत नाहटा, स्वतंत्र पार्टी से सुरेंद्र कुमार तापडिय़ा व कांग्रेस से जसवंत राज मेहता सांसद रहे हैं। सन 1962 में कांग्रेस से विजयी सांसद मेहता के बाद 1967 में स्वतंत्र पार्टी के तापडिय़ा, 1971 में कांग्रेस के डागा, 1977 में जनता पार्टी के नाहटा, 1980 एवं 84 में फिर डागा, 1989, 91 एवं 96 में लगातार बीजेपी से लोढ़ा, 1998 में मीठालाल जैन तथा 1999 एवं 2004 में पुष्प जैन सांसद रहे। बीच में सिर्फ एक साल के शंकरलाल शर्मा के कार्यकाल को छोड़ दें, तो सन 1962 से लगातार 2009 तक कुल 47 साल तक जैन समाज के नेता ही पाली से सांसद रहे हैं। कांग्रेस ने भी लक्ष्मीमल सिंघवी, धर्मीचंद जैन और सुरेंद्र सुराणा, तो बीजेपी ने पुष्पा जैन आदि नेताओं को उम्मीदवार बनाया। ये सभी पाली का राजनीति में कद्दावर नेता रहे हैं।

लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने पुष्प जैन का टिकट काटकर किसान समुदाय के पीपी चौधरी को उम्मीदवार बनाया। चौधरी फिलहाल केंद्र में कॉरपोरेट मामलों के राज्यमंत्री हैं। मोदी लहर में पीपी चौधरी पाली से जीत तो गए, लेकिन वे ना तो पाली के हैं और ना ही उनके मंत्री होने का पाली जिले को कोई फायदा नहीं हुआ। उल्टे जैन समाज ही नहीं की अन्य जातियां और समाज भी बीजेपी से नाराज़ हैं। तस्वीर साफ है कि पाली की राजनीति में जैन समाज की अवहेलना हो रही है।

पाली लोकसभा क्षेत्र में जैन समाज को राजनीतिक तौर पर प्रतिष्ठित करने एवं जैनों का राजनीतिक दबदबा बनाने में कांग्रेस में मूलचंद डागा, सुरेंद्र सुराणा, धर्मीचंद जैन, मीठालाल जैन, केवलचंद गोलेछा एवं बीजेपी में जस्टिस गुमानमल लोढा,  पुष्पा जैन, पुष्प जैन, ज्ञान पारेख आदि ने काफी मेहनत की एवं वे सफल भी रहे। लेकिन अब बदले हुए राजनीतिक हालात में डागा, लोढ़ा, सुराणा, जैन, गोलेछा, पारेख आदि की मेहनत पर पानी फिर रहा है। कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने किसान समुदाय से उम्मीदवार देकर पाली लोकसभा सीट से जैन समाज का राजनीतिक सफाया कर दिय़ा है, जिसे जैन समुदाय समझ रहा है। पाली जिले का जैन समाज देश भर में फैला हुआ है। वह राजनीतिक पार्टियों को वोट भी देता रहा है और नोट भी।

लेकिन फिर भी राजनीतिक दल अगर जैन समाज के बारे में नहीं सोचे, तो आगे क्या करना है, यह जैन समाज को सोचना है। क्योंकि सीधी ऊंगली से घी नहीं निकलता। फिर राजनीति तो वैसे भी टेढ़ी खीर मानी जाती है।