पंचमंगल महाश्रुतस्कंध स्वरुप श्री उपधान तप आराधना संपन्न

पंचमंगल महाश्रुतस्कंध स्वरुप श्री उपधान तप आराधना संपन्न

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पालीताणा। राजस्थान प्रदेश के परम उपकारी प.पू. आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय सुशीलसूरीश्वरजी के पट्टधर, अनेक तीर्थो के प्रतिष्ठाचार्य प.पू. आचार्य प्रवर श्रीमद् विजय जिनोत्तमसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने परम उपकारक गुरु भगवंत की जन्म शताब्दी के महोत्सव निमित्त तीर्थाधिराज श्री शत्रुंजय की छत्रछाया में उपधान तप करवाने की भावना श्री अष्टापद जैन तीर्थ-सुशील विहार-रानी के मंत्री जुगराज पुनमिया के समक्ष व्यक्त की।

अष्टापद तीर्थ के ट्रस्ट मंडल की मीटिंग बुलाकर सामूहिक उपधान तप करवाने के शुभ आशय से समिति की रचना की गई। समिति के संयोजक जुगराज पुनमिया एवं उपसंयोजक अशोक तापडिय़ा के नेतृत्व में टीम का गठन हुआ एवं कार्य का शुभारंभ हुआ। दानदाताओं से संपर्क किया गया। लुणावा-पालकोत निवासी श्रीमती सुकीबाई शेषमलजी नीम सोलंकी परिवार के राजेन्द्रकुमार एवं विपिनकुमार ने मुख्य आयोजक बनने की तथा सांडेराव निवासी मातुश्री हुलासीबाई मुलचंदजी मेहता परिवार ने सहआयोजक बनने की सहमति दी। उपधान तप की जानकारी सभी संघों में प्रसारित की गई। एक तरफ दानवीरों के नाम हेतु संपर्क तो दूसरी ओर आराधकों के फॉर्म-संकलन का कार्य तेजी से बढऩे लगा। समदडी भवन बुक किया गया। आहार व्यवस्था हेतु आर. पुरोहित केटरर्स, सूरत-जोधपुर वालों को तय किया गया। समिति का कार्य उत्साह एवं सामंजस्यपूर्वक चल रहा था।

शत्रुंजय गिरिराज की छत्रछाया में की गई प्रत्येक क्रिया का अनेक गुना फल प्राप्त होता है। ३०.९.२०१७ के शुभ दिन-शुभ घड़ी में प्रथम माला के १०६ आराधकों सहित १५ से ८५ वर्ष के २६५ आराधक उपधान तप का प्रारंभ कर दिव्य-भच्य क्रियाओं के माध्यम से अपने पाप कर्मो का क्षय करने में लयलीन हो गये। दानवीर परिवारों ने अपनी लक्ष्मी का सद्व्यय कर अनेक गुना पुण्योर्जन किया। सभी आराधकों की निवी – आयंबिल-निवास एवं क्रिया हेतु उत्कृष्ट व्यवस्था के साथ साथ मेहमानों की एकासणा बियासणा तथा प्रतिदिन २५०-३०० साधु साध्वी भगवंतो की गोचरी का लाभ प्राप्त होता था। मुख्य आयोजक परिवार ने हृदय के द्वार खोल दिए थे। साधु साध्वी भगवंतो द्वारा क्रिया का विशेष माहौल तेयार किया गया था। प.पू.आ. प्रवर श्री रविचन्द्रसूरीश्वरजी सहित अन्य साधु भगवंतों तथा पू.सा. श्री भव्यगुणाश्रीजी आदि साध्वीजी म.सा. ने विशिष्ट क्रियाओं द्वारा आराधकों को त्यागमय जीवन से जोड़ा। उपधान तप के दौरान अनेक शुभ कार्य संपन्न हुए, जिनमें प्रमुख रुप से श्री पाश्र्व-भैरव धाम सुशील विहार का खनन मुहूर्त तथा शिलान्यास किया गया। तदुपरांत प.पू.आ.भ. श्रीमद रविचंद्रसूरीश्वरजी म.सा. के शिष्य श्री रत्नचंद्रविजयजी म.सा. के वीसस्थानक तप की पूर्णाहुति एवं श्री वद्र्धमान तपाराधिका सा. श्री भव्यगुणाश्रीजी म.सा. व पू.सा. श्री प्रफुल्लप्रज्ञाश्रीजी म.सा. के श्रेणी तप की पूर्णाहुति निमित्त रत्नत्रयी महोत्सव का मंगलमय कार्यक्रम रखा गया। श्री उपधान तप मोक्षमालारापण निमित्त भव्य उद्यापन सहित रखा गया। जिसके दौरान प्रतिदिन पूजन, प्रभावना, आंगी, एवं रात्रि में भक्ति-भावना का आयोजन किया जाता था। पू. गुरु सुशीलसूरि गुरुपद महापूजन का लाभ श्री बाली जैन संघ ने लिया। दि. १६.११.२०१७ को हाथी, रथ, इंद्रध्वजा, बग्गी, घोड़े तथा ३०००-३५०० व्यक्तियों सहित भव्य वरघोड़े का ठाठ-बाट पूर्वक आयोजन हुआ। ठाणे से पधारे हुए श्री वल्लभ गुरु भक्त मंडल ने वरघोड़े की शोभा व व्यवस्था में चार चांद लगा दिए।

महोत्सव के दौरान प्रतिदिन ५००० लोगों की भोजन व्यवस्था की गई। मोक्षमाला मगसर वद १७.११.२०१७ के दिन यह संख्या ७५०० तक पहुंच गई थी। मोक्षमाला हेतु विराट स्टेज बनाया गया था, इतना विराट एवं भव्य स्टेज पालीताणा के इतिहास में प्रथम बार बना था। अंतिम तीन दिन के सभी कार्यक्रम इस भव्यतम मंडप में संपन्न हुए।

आज की परिस्थिति को ध्यान में रखते हुए तथा मोक्षमालारोपण कार्यक्रम के दौरान समय की कमी के मद्देनजर पू. गुरुदेव व समिति ने माला हेतु नकरों का निर्णय लेकर ऐतिहासिक परंपरा का प्रारंभ किया। मालारोपण कार्यक्रम में आराधकों को राजाशाही ठाठ से बिठाकर प्रत्येक आराधक पर हेलीकॉप्टर द्वारा पुष्पवर्षा की गई। प्रत्येक आराधक को डोली में बिठाकर स्टेज पर ले जाया गया, फिर कंकुतिलक, पुष्पवर्षा, गुलाबजल छिडकाव, स्वर्ण चेन पहनाने के बाद आचार्य श्री से वासक्षेप ग्रहण कर माला अर्पण करने के बाद मंत्रोच्चारण पूर्वक थालीवादन करते हुए माला पहनाई गई व हेलीकॉप्टर से पुष्पवर्षा की गई।

पू. आचार्य देवेश की जन्म शताब्दी निमित्त विशेष रुप से बनाए गए २० ग्राम के चांदी के सिक्के द्वारा बाहरगांव से पधारे हुए गुरुभक्तों का, आयोजन परिवार का तथा उपधान तप समिति के कर्मवीरों का बहुमान पू.आ.भ. श्री जिनोत्तमरीश्वरजी म.सा. द्वारा किया गया। समिति के संयोजक जुगराज पुनमिया ने १२ महीनों से कार्यरत रहकर कार्य को गति एवं अंजाम दिया। उनका तथा सहसंयोजक अशोक तापडिय़ा, चंदूभाई जैन, शांतिलाल पारेख, अमृत परमार तथा धीरज बंबोली का विशेष सहयोग हेतु बहुमान किया गया। इस अनुपम और अभूतपूर्व व्यवस्था हेतु पू. गुरुदेव ने प्रसन्न होकर सभी को भरपूर आशीर्वाद दिये।

उल्लेखनीय है कि श्री अष्टापद तीर्थ रानी स्टेशन पर स्थित है। रानी निवासी लोगों के तीर्थ के प्रति भावनात्मक लगाव के चलते लाभ लेने में, आराधना करने में एवं सेवा करने में रानी निवासी अग्रणी रहे। इस भीष्म कार्य को संयोजक जुगराज पुनमिया के कर्मठ नेतृत्व में सुचारु रुप से संपादित कर रानी स्टेशन के अनेक दानवीरों ने, धर्मवीरों ने तथा कर्मवीरों ने रानी नगरी एवं श्री अष्टापद तीर्थ के नाम और यश-कीर्ति की पताका दसों दिशाओं में फहरा दी है और समस्त गोड़वाड में एक अभूतपूर्व गौरव दिलवाया है। आपके जैसे सेवाभावी सुश्रावकों द्वारा जिनशासन की धुरा वहन की जाती है, इसलिए शासन के ऐसे उम्दा कार्य संपन्न हो पाते हैं।

इस महोत्सव के दौरान पालीताणा महातीर्थ के करीबन ढाईसौ रुम लेकर, पधारे हुए मेहमानों को निवास व्यवस्था की गई रमेश छाजेड व किशन पारेख, थाना वालों द्वारा विशेष सेवा का योगदान रहा। मालारोपण कार्यक्रम में संगीतकार अनिल गेमावत व मंच सम्राट के बेताज बादशाह श्री ललित परमार ने कार्यक्रम को अद्भूत निखार प्रदान किया।