जैन समाज जीता, शिवसेना हारी – सिद्धराज लोढ़ा

जैन समाज जीता, शिवसेना हारी – सिद्धराज लोढ़ा

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मुंबई। महानगर पालिका के चुनाव में मीरा भायंदर में शिवसेना को करारी हार मिली। लेकिन कौन जीता, यह सबसे बड़ा सवाल है। क्या यह बीजेपी की जीत है, या जैन संत नयपद्म सागर महाराज की जीत है। क्या वहां की जनता की जीत है या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की जीत। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की जीत है या वहां के विधायक नरेंद्र मेहता की जीत है। सवाल बहुत सारे हैं, लेकिन उत्तर सिर्फ और सिर्फ एक ही है कि यह जीत है जैन समाज की, जिसने पूरी ताकत पूरी हिम्मत और हर मेहनत से उस पार्टी को हराया, जो हर मौके बे मौके जैन समाज को नीचा दिखाने की कोशिश करती रहती है। शिवसेना ने जैन समाज को डराया, धमकाया हमने देखा है कि बीते कई अवसरों पर शिवसेना ने वोटों की राजनीति के लिए हमारे मंदिरों के सामने बकरे काटे, मुर्गे मारे, मछलियां बेची। और अंत में जैन समाज को शिवसेना ने धमकाते हुए जब यह कहा था कि – मुसलमान तो पाकिस्तान चले जाएंगे, लेकिन तुम कहां जाओगे, तो शायद शिवसेना और उसके नेताओं को यह पता नहीं था कि उनकी यह धमकी बहुत भारी पडऩेवाली है। मीरा भायंदर के चुनाव का जो परिणाम आया, वह जैन समाज के विरोध में शिवसेना की उसी कारवाई का प्रतिबिंब था।

व्यक्तिगत और सामाजिक संबंधों का फर्क

हालांकि जैन समाज में शिवसेना से प्रेम करनेवालों की भी कमी नहीं है। हमारे समाज के ही कुछ लोग शिवसेना के साथ मिलकर समाज को बांटने काम करते हैं। यह लोकसभा चुनाव में भी हुआ, विधानसभा चुनाव में भी हुआ और फिर मुंबई महानगरपालिका के चुनाव में भी हुआ और अब मीरा भायंदर के चुनाव में भी हुआ। हमारे ही समाज के चंद लोग शिवसेना के मोहरे बनकर हमारे समाज के उम्मीदवारों को ही हराने में जुटे रहे। लेकिन उन लोगों को यह समझना चाहिए था कि समाज बहुत ताकतवर होता है, वह कभी हारता नहीं है। बीते चुनाव में भी जैन समाज के वोट पाने के लिए शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने जब जैन समाज के लोगों को बुलाया तो, कुछ लोग ठाकरे के घर जाकर समर्थन का वादा करके आए थे, लेकिन क्या हुआ। कुछ भी तो नहीं। जो लोग वहां गए थे उन्हें समझना चाहिए था कि व्यक्तिगत संबंध अलग होते हैं, और सामाजिक संबंध अलग। और यह भी समझना चाहिए कि व्यक्तिगत संबंधों के लिए किसी का भी राजनीतिक मोहरा नहीं बनने से बचना चाहिए।

नयपदम सागर महाराज पर अनर्गल प्रलाप

बुरी तरह हारने के बाद बौखलाई हुयी शिवसेना ने पूज्य गुरुदेव नयपदम सागर महाराज को कख्यात मुस्लिम जाकिर नाईक से तुलना की और कहा कि यह मनी और मुनि की जीत है। बीजेपी पर जैन संत को आगे करके चुनाव लडऩे का आरोप लगाते हुए नयपदम सागर महाराज के बारे में शिवसेना ने जो कुछ कहा वह जैन समाज को नागवार गुजरा। शिवसेना को जैन समाज के बारे में इस हद तक बोलने और पूजनीय संत के बारे में अनर्गल प्रलाप की बजह से आगे भी नुकसान हो सकता है।

समाज में भी हैं कुछ गद्दार

मीरा भायंदर के चुनाव में भी जैन समाज के ही कुछ लोगों ने हमारे समाज के मजबूत, सक्षम, ताकतवर और हिम्मतवान विधायक नरेंद्र मेहता और नयपद्म सागर महाराज के विरुद्ध खूब अपप्रचार किया। सोशल मीडिया के माध्यम से महाराज साहेब को कटघरे में खड़ा करने और राजनीति से संतों को दूर रहने की सलाह देने के साथ ही अपने ही समाज के विधायक मेहता के विरोध में भी जबरदस्त मुहिम चलाई। लेकिन समाज के खिलाफ गद्दारी का काम करनेवालों को मुंह की खानी पड़ी। जैन समाज द्वारा शिवसेना को करारी मात देने के बाद शिवसेना की जो बौखलाहट सामने आई उससे साफ है कि शिवसेना ही जैन समाज की कट्टर विरोधी है। राजनीति में विनम्रता से अपनी हार को स्वीकार करने के बदले शिवसेना ने जिस तरह से जैन समाज के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप किया, इससे जैन समाज को अपनी ताकत समझनी चाहिए।

असल जीत किसकी

वैसे देखा जाए, तो असल में मीरा भायंदर महानगर पालिका के चुनाव में जो जीत हुई है, उसका असली सेहरा विधायक नरेंद्र मेहता के सर पर है। मेहता ने मेहनत की, मेहता ने ही हिम्मत के साथ शिवसेना का मुकाबला किया, उन्हीं की विनती पर नयपद्म सागर महाराज चातुर्मास के लिए पधारे, उन्हीं ने एक विशेष रणनीति के तहत योजना बनाकर महाराज साहेब के आदेशानुसार सामाजिक जागृति की सुविधाएं खड़ी की। उन्हीं ने सकल समाज को एक करने के लिए महाराज साहेब के आदेशानुसार काम किया। उसी कारण वहां जबरदस्त जीत हुई और जैन समाज की प्रतिनिधि के रूप में डिंपल मेहता महापौर के पद पर चुनी गईं। विधायक नरेंद्र मेहता के जज्बे को सलाम कीजिए, क्योंकि उन्होंने राजनीति से ऊपर समाज को तवज्जोह दोकर समाज का मान बढ़ाया है। वे चाहते तो, शिवसेना से समझौता करके भी चुनाव में शानदार जीत हासिल कर सकते थे, और अपनी पार्टी का, अपनी पसंद का महापौर भी बनवा सकते थे। लेकिन जिस शिवसेना ने हर मौके पर जैन समाज को नीचा दिखाया, डराया, धमकाया और मंदिरों के सामने मांस बेचकर करके हमारे धर्म को कलंकित करने की कोशिश की, उसके आगे नरेंद्र मेहता नहीं झुके और जबरदस्त लड़ाई लडक़र जीत हासिल की। वरना, शिवसेना के आगे सर झुकानेवालों और नाक रगडऩेवालों की भी जैन समाज में कमी कहां है।