सांडेराव (संडेरक नगर) / Sanderao

सांडेराव (संडेरक नगर) / Sanderao

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Sanderao 13 राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर गोडवाड के प्रवेशद्वार फालना रेलवे स्टेशन से १२ कि.मी. दूर उत्तर-पश्चिमी में निम्बेश्वर महादेव की पहाडियों में हेकजी पहाडी की तलहटी में बसा हुआ ‘सांडेराव’ गोडवाड का एक ऐतिहासिक नगर है, जिसे प्राचीन काल में संडेरा, संडेरक, षंडेरक, खंडेरक, वृषभनगर आदि नामों से जाना जाता था। राव सांडेजी द्वारा बसाया हुआ गांव होने से इसका नाम सांडेराव पडा। कभी यह विशाल नगरी के रूप में बसा हुआ था, जिसका प्रमाण यहां विद्यमान प्राचीन जैन तीर्थ शांतिनाथ भगवान का वह मंदिर है, जो देवविमान के समान आज भी शोभायमान है।

संडेरा : अनुश्रुति के अनुसार काठियावाड से लौटते समय श्री यशोभद्रसूरिजी यहां के एक तालाब के किनारे रूके, जहां एक सिंह एवं सांड के युद्ध में सांड को विजयी देखकर उन्होंने इस स्थान का नाम ‘संडेराव’ रख दिया। आ. श्री सिद्धसेनसूरि ने अपने ‘सकल तीर्थ स्त्रोत’ में तीर्थ स्थानों की सूची में ‘संडेरा’ का नाम भी दिया है। यहां पर संडेरकगच्छ के महावीर और पार्श्वनाथ के दो जैन मंदिर थे। सन् १०९२ ई. के अभिलेख के अनुसार, इस कस्बे की गोष्ठी ने संडेरकगच्छ के मंदिर में जिनचंद्र के द्वारा एक मूर्ति की स्थापना करवाई। नाडोल के चौहान शासकों ने संडेरा में जैन धर्म की गतिवियों को संरक्षण दिया। संडेरक के श्रेष्ठि गुणपाल ने अपनी पुत्रियों के साथ महावीर जैन मंदिर में, १२वीं शताब्दी में एक चतुष्किका निर्मित करवाई। यह भी ज्ञात होता है कि पोरवाल जाति के पेथड के पूर्वज भोखू संडेरक के ही मूल निवासी थे और महावीर के अनन्य उपासक थे। पेथड और उसके ६ छोटे भाइयों ने संडेरक में दो जैन मंदिर बनवाए। यह तथ्य सन् १५१४ ई. लिखित ‘अनुयोगद्वारवृति सूत्रवृत्ति’ की प्रशस्ति से ज्ञात होता है। (संदर्भ: मध्यकालीन राजस्थान में जैन धर्म पृष्ठ क्र. २१५-२१६ से)

Sanderao 15 Sanderao 16पांडवों के वंशधर राजा गंधर्वसेन द्वारा निर्मित अत्यंत भव्य-दिव्य जिनालय गांव के मध्य, सूर्यवंशीय क्षत्रिय राजघराने के महल (रावला) से सटा हुआ है। अत्यंत विशाल एवं वास्तुकला से परिपूर्ण जिनालय का पूर्व काल में जीर्ण अवस्था होने पर, बार-बार जीर्णोद्धार होने व प्रतिष्ठाएं होने के प्रमाण मिलते हैं। इसी दौरान मंदिर के मूलनायक की प्रतिमाओं में भी बदलाव लाया गया है। कहा जाता है कि पूर्व में यहां, आदिनाथ भगवान की प्रतिमा स्थापित थी और उसके बाद चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी और फिर पार्श्वनाथ प्रभु मूलनायक के रूप में रहे और अब इसमें कुमारपाल के समय की सोलहवें तीर्थंकर श्री शांतिनाथ प्रभु की पद्मासनस्थ, श्वेतवपूर्ण व लगभग ७५ सें.मी. की मनमोहक प्रतिमा, तोरण व प्राचीन कलात्मक परिकर सहित विराजमान है।

भगवान शांतिनाथ के तीनों ओर नक्काशीयुक्त तोरण हैं, जिनकी अद्भुत शिल्पकला दर्शनीय है। यह मंदिर भूमि से छ: फूट नीचे निर्मित है। गंभारे के बाहर रंगमंडप में संप्रतिकालीन प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित हैं। इसके अलावा एक आचार्य की कलात्मक प्रतिमा है, जिसकी पलाठी में नीचे सं. ११९७ (सन् ११४१) का इस प्रकार लेख है।

‘श्री षनडेरक गच्छे पंडित जिन चन्द्रेण गेष्ठियुतेन विजयदेव नागमूर्ति: कारिता मुक्तिवांछता संवत् ११९७ वैशाख वदि ३ थिरपाल : शुभंकर:।’

कहते है यह संडेरक गच्छीय आचार्य श्री यशोभद्रसूरिजी की प्रतिमा है। दसवीं शताब्दी में जिन्होंने विक्रम संवत् ९६९ यानि सन् ९१३ ई. में यहां मूलनायक श्री महावीर स्वामी की प्रतिमा की प्रतिष्ठा संपन्न करवाई थी।

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जैन साहित्य संशोधक खंड १, अंक-३, पृष्ठ २५ के अनुसार श्री यशोभद्रसूरिना उपदेश से घोषिर गोत्रे दो घनराई ने वि.सं. ९६९ वर्षे मंदिर बंधाया व श्री श्रेयांसनाथ भगवान की प्रतिष्ठा की।

सं. १७४६ में शीलविजयजी महाराज द्वारा रचित प्राचीन तीर्थमाला संग्रह भाग १ पृष्ठ १३६ के अनुसार, सांडेराव सं. १७५५ में एक ही मंदिर था ‘सांडेरे प्रसाद एक’।

Sanderao 12मंदिर के प्रवेशद्वार की एक बारशाख में सं. १२२१ का एक लेख है – ‘संवत १२२१ माघ वदि २ शुक्रे अधेह श्री केल्हणदेवरा (ज्ये) तस्य मातृराज्ञी श्री आन (ल) देव्या श्री षंडेरकीय मूलनायक श्री महावीर देवाय (चैत्र) वदि १३ कल्याणीकनि (मि) त्तं…’ इसके अनुसार मंदिर हेतु दान की व्यवस्था हुयी थी। दूसरे मंडप के एक स्तंभ पर १२३६ के लेख इस तरह हैं – ‘(थां) था सुत राल्हा पाल्हा (भ्यां) मातृप (द) श्री निमि (ते) (स्तं) भको (क:) प्रदत: (त्त:) (सं:) वत् १२३६ का (र्ति) क वदि (२) बुधे अ (घे) ह श्री नडुले महाराजाधिराज श्री केल्हणदेवकल्याणविजय राज्ये प्रवत्रमाने (राज्ञी) श्री जाल्हणदेविभुको (क्तो) श्री षं (डेर) कदेव श्री पार्श्वनाथप्रतापत : … संवत् १२३६ वर्षे घे (ज्ये) ष्ठ सुदि १३ शनौ सो (यं) मातृधारमति पुन: (पुण्यार्थे?) स्तंभकों उधृ (द्धृ) (त:) ||’

पहले लेख के अनुसार जान पड़ता है की यह मंदिर मूलनायक श्री महावीर स्वामी का था और दूसरे लेख से मूलनायक श्री पार्श्वनाथ भगवान का होने का मालूम पड़ता है। तत्पश्चात १६वीं शताब्दी में पुन: जीर्णोद्धार के समय श्री शांतिनाथ प्रभु की चमत्कारिक प्राचीन प्रतिमा, अन्यत्र से लाकर यहां स्थापित करने का उल्लेख है, जो अभी मूलनायक के रूप में विद्यमान है, जिस पर कोई लेख नहीं है। मूलनायक भगवान की दोनों प्राचीन प्रतिमाएं भी यहीं विराजमान हैं, जिन पर लेप किया हुआ है। वि.सं. ८४१ से ८४५ तक पांच वर्ष का दुष्काल पड़ा था, जिससे जैन मुनियों को आहार न मिलने से धार्मिक पढाई व स्वाध्याय में शिथिलता आ गई। उस समय के आचार्यश्री की प्रेरणा से अनेक ज्ञान भंडारों की स्थापना हुई, उसमें सांडेराव में ज्ञान भंडार स्थापन करने का उल्लेख मिलता है।

Sanderao 9पं. खुशाल वि.म.सा. द्वारा रचित पट्टावली व वीरवंशावली में भी इसके उल्लेख मिलते हैं। मंदिर के भोयरे में एक शिलालेख है, जिस पर १२६८ के महा वदि ५ को सोमवारे नर्डूल (वर्तमान नाडोल) के महाराज संग्राम सिंह के राज्य में शेठ कर्मसिंह आदि द्वारा दान किए जाने का उल्लेख जान पड़ता है।

वि.सं. १४२९ और १४८६ तथा १५५३ के बाद भी कई बार जीणोद्धार व प्रतिष्ठा के उल्लेख प्राप्त होते हैं। जो इसकी प्राचीनता को उजागर करते हैं। मंदिर के एक प्राचीन परिकर पर वि.सं. १११५ का लेख उत्कीर्ण है। गूढ मंडप की रचना भव्य है।

 

Sanderao 4विशिष्टता : कहा जाता है कि वि.सं. ९६९ में यहां पर हुए जीर्णोद्धार के समय प्रतिष्ठा महोत्सव पर, अनुमान से कई अधिक लोग महोत्सव में दर्शनार्थ पहुचें जिससे भोजन में घी समाप्त हो गया। इस बात की जानकारी आचार्य श्री यशोभद्रसूरिजी को होने पर, उन्होंने दैविक शक्ति से (विद्याबल या मंत्र शक्ति) पाली के व्यापारी ‘धनराजशाह’ के गोदाम से लाकर घी के पात्र भर दिये। प्रतिष्ठा के सभी कार्य संपन्न हो जाने पर आचार्यश्री ने श्रावकों से, घी का पैसा पाली के व्यापारी धनराज को दे आने के लिए कहा। जब सांडेराव के श्रावक पाली पहुँचकर घी के दाम देने लगे तो व्यापारी चकित हो गया और कहा कि मैंने आपको कोई घी नहीं बेचा तो दाम किस बात का लू? तब श्रावकों ने गोदाम चेक करने को कहा। व्यापारी ने गोदाम देखने पर घी के सारे पात्र खाली पाए। इस प्रकार आचार्यश्री के चमत्कार से प्रभावित पाली के धनराजशाह व्यापारी ने घी का पैसा लेने से इंकार करते हुए आग्रह किया कि प्रतिष्ठा में जो घी खर्च हुआ है, वह मेरी तरफ से समझ ले| मगर श्रावको के बार-बार आग्रह पर उसने उन रुपयों से पाली में भव्य ५२ जिनालय का निर्माण करवाया, जो आज भी १०८ पार्श्वनाथ में ‘नवलखा पार्श्वनाथ’ के नाम से विद्यमान है और अपनी गौरव गाथा का परिचय दे रहा है। नौ लाख रुपये से निर्मित होने से इसका नाम नवलखा पार्श्वनाथ पड़ा। इस घटना का उल्लेख ‘ऐतिहासिक रास संग्रह’ के भाग-२ के पृष्ठ ३२ पर इस प्रकार लिखा है –

‘पुहता सूरि नगरि संडेरि, हुई प्रतिष्ठा भुंगल भेरि,

नादि नवल संघ सबलऊ जिमई, धृत खुंटऊ गुरु जणिऊ तिमई,

पल्लि नगरि सहा धनराज, धृत आणि गुरि सारियूं काज...’

मंत्र शक्ति से पाली से घी लाया, इसकी हकीकत सं. १५८१ में ईश्वरसूरि द्वारा बनाई ‘सुमित्र ॠषि चरित्र’ से भी प्राप्त होती है।

Sanderao 5संडेरक गच्छ : दसवीं शताब्दी में संडेरक नगर में इसकी स्थापना होने से इसका नाम ‘संडेरक गच्छ’ पडा। पूर्व मध्य काल उद्भुत में इस गच्छ का उल्लेख सन् १२११ ई. से १५३१ ई. तक के ३८ मूर्ति लेखों में भी मिलता है। इस गच्छ में वि.सं. ९६४ के लगभग अनेक प्रभावशाली आचार्य हुए, जैसे आ. श्री शांतिसूरि, शालिसूरि, सुमतिसूरि, आ.श्री ईश्वरसूरि व मांत्रिक, प्रकांड विद्वान आ. श्री यशोभद्रसूरिजी आदि हुए। आ. श्री यशोभद्रसूरिजी का जन्म सं. ९५७ में आचार्य पद सं. ९६८ में मुंडारा (राज.) में हुआ और सं. ९६९ में उम्र के १२वें वर्ष में आपश्री ने सांडेराव व मुंडारा में प्रतिष्ठा संपन्न करवाई। इस गच्छ में यशोभद्र, बलभद्र व क्षमार्षि ये आचार्य बडे प्रभावक हुए। इनके संबंध में संस्कृत भाषा में प्रबंध व लावण्यसमय रचित रास उपलब्ध है। १७वीं सदी तक के इस गच्छ के अभिलेख प्रकाशित हैं। इतिहासवेत्ता मु. श्री जिनविजयजी द्वारा प्रकाशित जैन पुस्तक ‘प्रशस्ति संग्रह’ की प्रशस्ति नं. ९१ के अनुसार इसका पूर्वनाम वालमगच्छ था।

Sanderao 6कला व सौंदर्य : प्रभु की प्रतिमा अलौकिक, भव्य-दिव्य, कलापूर्ण व चमत्कारी है। मन को मोहने वाली यह प्रभावशाली प्रतिमा सुंदर व सौम्य है। प्रतिमा के तीन ओर कलात्मक परिकरयुक्त तोरण है। इसमें २३ तीर्थंकरों की प्रतिमाएं अत्यंत ही कलापूर्ण तरीके से कोरी गई हैं। इसकी कोरणी खूब ही झीणी व सुंदर है। तोरणों से आवृत्त श्री शांतिनाथ प्रभु अत्यंत सुशोभित लगते हैं। मंदिर निर्माण की कला अजोड़ व अलौकिक व बड़ी वैज्ञानिक है। मंदिर का भाग समतल से ६ फूट नीचे हैं। वर्षा के समय मंदिर में खूब पानी भरता है, चौक में तीन-चार छोटे से छिद्र हैं। पानी छिद्रों से होकर किस प्रकार कहां जाता है, उसका अभी तक पता नहीं लगाया जा सका है। ऐसी स्थापत्यकला अन्यत्र दुर्लभ है। खुदाई करते समय मंदिर के नीचे भोयरों का पता चला। खुदाई के समय लगभग १५० चांदी के प्राचीन सिक्के मिले थे, जिसमें से अनेक २००० वर्ष से अधिक प्राचीन थे। प्राचीन मूलनायक के अधिष्ठायक श्री पार्श्वयज्ञ की प्रतिमा व भमति में प्रतिष्ठित भी धरणेंद्रदेव की सर्पाकार प्रतिकृति अपने आप में चमत्कारिक है। श्री धरणेंद्रदेव यदा-कदा नाग देवता के रूप में प्रगट होकर श्रद्धलु भक्तजनों को दर्शन देते हैं। वर्तमान में जिनालय का पुन: जीर्णोद्धार का कार्य वर्षों से निरंतर जारी है।

Sanderao 2अन्य जैन मंदिर : मूल मंदिर के ठीक सामने स्थित उपाश्रय में सबकी मनोकामना पूर्ण करने वाले अधिष्ठायकदेव श्री मणिभद्रवीर की चमत्कारिक प्राचीन प्रतिमा, कांच के कोरिव छोटे से मंदिर में विराजमान है। जिसका जीर्णोद्धार मुनिभूषण की वल्लभदत्तजी (फक्कड़ महाराज) की प्रेरणा से हुआ है एवं सं. २०३८ में इसकी प्रतिष्ठा हुई है। ओसवाल बगीची में इन्हीं गुरुदेव का, अष्टकोनी कलात्मक सुंदर गुरु समाधि मंदिर है। गुरुदेवश्री सांडेराव में दि. ४.१०.१९८४, वि.सं. २०४० के विजयादशमी के दिन, अर्हत का ध्यान करते हुए स्वर्गवासी हुए थे। इस गुरु मंदिर की प्रतिष्ठा वि.सं. २०४६ वैशाख सुदि ६ दि. ३० अप्रैल १९९० को, जिनालय की पुन: प्रतिष्ठा के अवसर पर आ. श्री हेमप्रभसूरिजी के करकमलों से सानंद संपन्न हुई।

दूसरा मंदिर : सांडेराव नगर में बॉकली वास में, गुरुभक्त शाह मोतीजी वरदाजी फागनीया परिवार द्वारा निर्मित श्री केसरीया आदेश्वर भगवान की भव्य कलात्मक व शिखरबंध जिनालय का मुहूर्त वि. सं. १९७३ में दादा गुरुदेव श्री राजेंद्रसूरिजी के प्रिय शिष्यरत्न आ. श्री मोहनविजयजी म.सा. की प्रेरणा से संपन्न हुआ। इन्हीं के वरदहस्ते वि. सं. १९८८ के माघ सुदि ६ को प्रतिष्ठा संपन्न हुई। श्री ताराचंद जी एवं उनकी मातोश्री हांसीबाई ने महोत्सव पूर्वक प्रतिष्ठा व ध्वजदंड व कलश स्थापित किए। पुन: वि. सं. २०४६ के मगसर सुदि ४ शनिवार दि. २.१२.१९८९ को, आ. श्री जयंतसेनसूरिजी के हस्ते भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा व गुरुदेव श्री राजेंद्रसूरिजी के गुरुमंदिर की प्रतिष्ठा संपन्न हुई। वर्तमान में इसका पुन: जीर्णोद्धार का कार्य चालू है। पीछे श्राविकाओं के उपाश्रय में श्री पार्श्वनाथ भगवान विराजमान हैं।

Sanderao 3तीसरा मंदिर – श्री नाकोड़ा पार्श्वनाथ मंदिर : सांडेराव के मुख्य बाजार में वल्लभ वाटिका के पास श्री मोहनलालजी ओंकारमलजी मेहता परिवार द्वारा स्वद्रव्य नवनिर्मित श्री नाकोडा पार्श्वनाथ भगवान का सुंदर जिनालय है। इसमें मूलनायक श्री नाकोडा पार्श्वनाथ सहित मुनिसुव्रत स्वामी, महावीर स्वामी आदि जिनबिंब एवं श्री विजयानंदसूरिजी, पंजाब केसरी आ. श्री वल्लभसूरिजी, आ. श्री समुद्रसूरिजी, मुनिभूषण श्री वल्लभदत्तविजयजी (फक्कड महाराज) आदि गुरुबिंब, देवी-देवताओं की प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, आ. श्री इन्द्रदिनसूरिजी आ. ठा. के सानिध्य में, वि.सं. २०४६, मगसर सुदि ६, दि. १६.११.१९९२ को संपन्न हुई। सांडेराव में आ. श्री यशोभद्रसूरिजी की स्मृति में आ. श्री वल्लभसूरिजी ने जैन पुस्तकालय और वाचनालय की स्थापना की थी। स्थानकवासी पुस्तकालय, जीवदया चबूतरा, न्याति नोहरा, छोटी-बडी अनेक धर्मशालाओं को निर्माण हुआ।

अन्य मंदिर :  मुख्य बाजार में स्थित दक्षिण सुंडधारी श्री सिद्धिविनायक गणेशजी व मस्जिद, श्री चारभुजाजी, श्री लक्ष्मीजी, श्री रामदेवरा व ग्राम दैवत ईलोजी, विशाल तालाब के किनारे स्थित क्षत्रिय घराने छत्रिया, अति प्राचीन वट का पेड़ आदि प्राचीन धरोहर हैं। यहां से ५ कि.मी. दूर पहाडियों से घिरा जग विख्यात पांडव कालीन श्री निम्बेश्वर महादेवजी का विशाल मंदिर है, जो जन-जन का श्रद्धा स्थान है। साण्डेराव के तालाब के किनारे एक अति प्राचीन चबूतरा है, जिसके खंभे प्राचीन शिल्पकला के उत्कृष्ट नमूने हैं।

Sanderao 1नूतन जीर्णोद्धार : इस जिनालय की शिल्पकला अत्यंत ही कलात्मक व सुंदर है। इसका निर्माण वास्तुसार प्रकरण एवं दीपार्णव आदि के आधार पर किया गया है। इसकी रचना लगभग दस हजार वर्गफूट के घेरे में की गई है। पहले यह मंदिर ५२ जिनालय वाला था, लेकिन वर्तमान में यह २४ जिनालय का है। मंदिर में प्रवेश करने के लिए सात सीढियां नीचे उतरना पडता है। जहां दूर सामने मूलनायक की चमत्कारी प्रतिमा के दर्शन हो जाते है। २४ देहरियों की प्रतिष्ठा संवत् १९५४ में गुरुदेव श्री हितविजयजी के वरदहस्ते व नेतृत्व में संपन्न हुई थी। शेष देहरियों में प्रतिमा स्थापन व २४ देहरियों पर ध्वज, दंड, कलश आदि आरोहण, वि. सं. १९९५ के वैशाख शुक्ल ६ दि. ५ मई १९३८ को शुभ मुहुर्त में बाल ब्रह्मचारी प. पू. पंन्यासप्रवर श्री हिम्मतविजयजी व मु. श्री गुमानविजयजी आ. ठा. की निश्रा में प्रतिष्ठा संपन्न हुई। इसका विधिविधान यति श्री राजविजयजी ने संपन्न किया।

विगत दशाब्दी में जिनालय के जीर्ण शिखर को संपूर्ण उतारकर मु. भगवान की प्रतिमा के अलावा अन्य प्रतिमाओं का उत्थापन करके आमूलचूल नया भव्य शिखर निर्मितकर, दि. ३० अप्रैल १९९० वि. सं. २०४६ वैशाख सुदि ६ के शुभ मुहूर्त पर शासन प्रभावक प.पू. आ. श्री हेमप्रभसूरिजी आ.ठा. की पावन निश्रा में जिन बिंबों की पुन: प्रतिष्ठा नूतन कलश दंड – ध्वजारोहण के साथ-साथ कमलाकार गुरु मंदिर में मरुधररत्न मुनिभूषण श्री वल्लभदत्तविजयी की गुरुमूर्ति की प्रतिष्ठा विधि हर्षोल्लास से संपन्न हुई। जिनमंदिर की वार्षिक ध्वजा वैशाख सुदि ६ को श्री मिश्रीमलजी नथमलजी की केरिंग परिवार (पुणे) द्वारा चढाई जाती है। महावीर जयंती और गुरुदेव श्री राजेंद्रसूरि की गुरुसप्तमी बडी धूमधाम से मनाई जाती है। श्री यशोभद्रसूरिजी जैन सेवा मंडल, पूनम मंडल व महिला मंडल आदि संस्थाएं क्रियाशील है। ८०० घरों की घर ओली व ३००० से ४००० तक जैनों की जनसंख्या है। गांव की कुल जनसंख्या लगभग २०००० है। दो बैंक, १५ से २० विद्यालय, अस्पताल, प्याऊ, कन्याशाला, दूरसंचार केन्द्र, होटल, डाकबंगला, विश्राम गृह इत्यादि यहां की अन्य उपलब्धियां हैं। राजकीय व्यवस्था के रूप में, ग्राम पंचायत सांडेराव छ: वार्डो में विभाजित है।

पुणे जिले के नगरवासियों को एक सूत्र में पिरोने हेतु दि. २६ अप्रैल १९९९ को श्री सांडेराव जैन संघ, पुणे की स्थापना हुई। इसके वर्तमान अध्यक्ष श्री मदनजी सेठिया हैं। जानकारी हेतु श्री चंपालालजी संघवी का काफी सहयोग रहा।

अन्य उपलब्धियां: श्री शत्रुंजय महातीर्थ की पावन भूमि पर गोडवाड की सबसे प्राचीन धर्मशाला श्री सांडेराव जिनेन्द्र भवन व श्री सहस्रफणा पार्श्वनाथ प्रभु का जिन मंदिर है। यहीं पर नवनिर्मित ए.सी. धर्मशाला का हाल ही में रविवार दि. २३ जून २०१३ को उद्घाटन संपन्न हुआ है। गिरिराज आबू पर निर्मित श्री महावीर केंद्र, बदलापुर स्थित छात्रावास, सांडेराव में माध्यमिक विद्यालय, कन्याशाला, श्री चोपडा चिकित्सालय इत्यादि नगरवासियों की उदारता व दानशूरता के जीवंत उदाहरण है।

सुविधाएं : ओसवाल बगीचे की दो मंजिल की इमारत, मंदिर के पास पुरानी धर्मशाला व नूतन निर्मित श्री भोमियाजी भवन में, आधुनिक शैली की सुविधायुक्त धर्मशाला है। श्री नाकोडा भैरव आराधना एवं अतिथि भवन है। अनेक कमरे व विशाल हॉल की सुविधा है। उपाश्रय व धर्मशालाओं के साथ उत्तम जैन भोजनशाला की सुंदर व्यवस्था, नियमित आयंबिल की सुविधा आदि है।

मार्गदर्शन : सांडेराव नगर जिला पाली से ५४ कि.मी. फालना रेलवे स्टेशन से १२ कि.मी. जोधपुर हवाईअड्डा से १४० कि.मी. विधानसभा क्षेत्र सुमेरपुर मंडी से २१, जवाई बांध से ३० कि.मी., राणकपुर तीर्थ से ४५, गोडवाड की राजधानी वरकाणा से ३० किमी. दूर, महामार्ग पर स्थित है। आवागमन के सारे साधन उपलब्ध है।

पेढी : श्री शांतिनाथ जैन मंदिर ट्रस्ट पेढी

सांडेराव मेन बाजार, लायब्रेरी के सामने, मु. पो. सांडेराव, जिला-पाली, रेलवे स्टेशन – फालना, राजस्थान, पिन- ३०६७०८ संपर्क : ०२९३८-२४४१५६, मुनीमजी – ०७५९७८४३२११, ०९६३६२११४४४, अध्यक्ष – श्री रतनजी पुनमिया – ०९८६९०४३५२०, मुंबई पेढी : ०२२-२२०८६२७९, पुणे पेढी : ०२०-२६३४२६१७, मुख्य प्रवक्ता : श्री संपतजी धोका – ०९८२२५२३४१२