खौड (जूनाखेडा, करणपूरा) / Khod

खौड (जूनाखेडा, करणपूरा) / Khod

SHARE

राजस्थान के पाली जिले के गोडवाड क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर जैतपुरा चौराहा से ६ किमी. व रानी रेलवे स्टेशन से ३० किमी. दूर तथा जवाली रेलवे स्टेशन से ८ किमी. और पाली रेलवे स्टेशन से ३२ किमी. दूर ‘खौड’ कस्बा अवस्थित है। आज से करीब 850 वर्ष पहले खौड गावं की नदी के उस पार दाहिनी ओर खेतलाजी मंदिर के आस-पास ‘जूना खेडा’ गांव ‘करणपुरा’ नाम से बसा हुआ था। कालांतर में प्रलय एवं समय की करवट से पूरा गांव जमीन के नीचे दब गया। खुदाई में आज भी एक प्राचीन मंदिर के अवशेष मिले हैं। पुरातत्व विभाग यदि इस तरफ ध्यान दे तो यहां और प्राचीन सभ्यता का भंडार प्राप्त होने की संभावना है। कालांतर में किसी कारणवश जूनाखेडा-करणपूरा से विस्थापित होकर, ओसवाल व पोरवाल परिवार, पोरवाल बहुल गावं खौड में आकर बस गए, जिस कालखंड को बीते हुए ८५० वर्ष बीत गए।

पहले इस गांव का नाम करणपुरा एक ढाणी के रूप में प्रचलित था। उस समय यहां पर बहुत कम घरों की बस्ती थी। एक बार गांव में अकाल पडा। लोगों ने पीने के पानी के लिए भगवान शंकर की नदी के किनारे बैठकर पूजा-अर्चना व प्रार्थना की और सबने मिलकर कुआं खोदना प्रारंभ किया। भगवान शंकर की कृपा से कुएं से खांड (शक्कर) के समान मीठा पानी प्राप्त हुआ, जिसके फलस्वरूप खुदे हुए कुए का नाम ‘महादेवजी का वेरा’ तथा गांव का नाम ‘खौड’ पड गया। गावं की देशी बोली में ‘केवे ओ तो पुरो खौड रे जेरो मीठो है’, यह कहावत यहां चरितार्थ होती है। इसी का उल्टा हो तो ‘केवे ओ तो जोणे धतुरा रे जेरो खारो जेर है’। वैसे गांवों में तो दोनों ही तरफ के लोग बसते हैं।

आज के ग्राम खौड का प्राचीन जिनालय, जिसमें आदि तीर्थंकर प्रभु ॠषभदेवजी मूलनायक के रूप में विराजमान थे, करीब ७०० वर्ष प्राचीन था। उस तत्कालीन जिनालय का जीर्णोद्धार करवाकर प्रतिष्ठा महोत्सव, वीर नि. संवत् २४७३, शाके १८६८ व वि. स. २००३ महासुदि १३, सन् १९४७ ई. (आजादी के समय) में हुआ था और द्वितीय जिनालय के श्री पाशर्वनाथ भगवान के मंदिर का प्रतिष्ठोत्सव सं. २००४ में हुआ था। काल ने करवट ली और वि. सं. २०२२ में आ. श्री सुशीलसूरिजी के सानिध्य में श्री आदेश्वर प्रभु का विलेपन करवाया गया व शांतिस्नात्र पूजा महोत्सव हुआ, साथ ही चतुर्विध संघ सह कापरडाजी की यात्रा का आयोजन हुआ, जिसमें मीठालालजी संचेती को संघमाला वि. सं. २०२२के फा. सु. ९ को पहनाई गई एवं सं. २००३ के प्रतिष्ठापित, इस जिनालय का नवनिर्माण करवाने का, श्री संघ को आदेश प्राप्त हुआ। इस आदेशित आशीर्वाद के प्रेरणाश्रोत वि. सं. २०२९ में पू. उपा. श्री दर्शनसागरजी एवं मु. श्री नित्योदयसागरजी बने और उनके करकमलों से वि. सं. २०२९ के श्रावण सुदि १५ मंदिर जी का शिलारोपण हुआ।

Khaud 4 Khaud 5पांच वर्ष के निर्माण काल में द्विमंजिला त्रिशिखरी कलात्मक जिनालय सुशोभित हुआ, जिसकी धरा से ध्वजा की ऊंचाई ६५ फूट है। वीर नि. सं. २५०४, शाके १८९९, नेमि सं. २९ व विक्रम संवत् २०३४ के माघ शुक्ल १०, शुक्रवार, दि. १७ फरवरी १९७८ को रवियोग के शुभ मुहूर्त में राजस्थान दीपक आ. श्री सुशीलसूरिजी, पूज्यवाचक विनोदविजयी, पंन्यास श्री विकास विजयजी आ. ठा. एवं वल्लभ समुदायवर्ती मुनिभूषण श्री वल्लभदत्त विजयजी (फक्कड महाराज) के करकमलों से २१वें तीर्थंकर मूलनायक श्री नेमिनाथ भगवान आदि जिनबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा तथा ऊपरी मंजिल पर ‘जैन तीर्थ सर्वसंग्रह’ के अनुसार संवत् १७०० के प्रतिष्ठित (लगभग ३७० वर्ष पूर्व) पूर्व मूलनायक श्री ॠषभदेवजी को पुन: गादीनशीन किया गया। पूर्व में पाषाण की ७ व धातु की ९ प्रतिमाएं स्थापित थी। नूतन विशाल एवं अप्रतिम कलात्मक जिन चैत्य में मूलनायकजी सहित कुल १९ प्रभु प्रतिमाएं विराजमान हुई। जिसमें १४ नई व ५ प्राचीन हैं। इन प्रतिमाओं में नूतन सुपाशर्वनाथजी व सुविधिनाथजी की प्रतिमा लेख के ठीक ऊपर संभवत: अष्टमंगल तराशे गए हैं, जो अपने आप में बेजोड़ है। इस तरह प्रतिमा पर अष्टमंगल अन्यत्र शायद ही देखने को मिलते हैं। जिनालय की ध्वजा का लाभ श्रीमान् मीठा्लालजी फौजमलजी संचेती परिवार को मिला।

Khaud 1Khaud 6धर्मयात्रा के तीसरे पड़ाव में वि. सं. २०५१, वैशाख वदि ७, दि. २ मई, १९९४ को आ. श्री सुशीलसूरिजी के हस्ते अधिष्ठायक श्री नाकोडा भैरवजी एवं श्री पद्मावती देवी की प्रतिष्ठा एवं कलशारोहण का भव्य एकादशाहिंका महोत्सव के साथ जिनालय का शत प्रतिशत निर्माण परिपूर्ण हुआ। वि. सं. २०५६ में शांतिदूत आ. श्री नित्यानंदसूरिजी आ. ठा. के. चातुर्मास के उत्तरार्ध चैत्य में धर्मोद्योत पूर्ण अट्ठारह अभिषेक सह पंचाहिंका महोत्सव की पूर्णाहुति कार्तिक सुदि ७, सं. २०५६, दि. १५.११.१९९३ सोमवार को हुई।

गत २५ वर्षों से श्री संघ द्वारा स्वर्णिम युग के रूप में नगर का निरंतर विकास हुआ व कई लोकोपयोगी निर्माण हुए। खौड गांव की धन्य धरा पर, दि २५.१२.२०१० से २९.१२.२०१० तक ‘रजत जयंती स्नेह सम्मेलन-खौड’ श्री कविरत्न केवलचंदजी तेलीसरा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। यहां की आबादी २०००० के करीब है। गांव के प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण है व नगर के दोनों ओर दो बडे तालाब हैं। जैनों की कुल २०० घर हौती है।

खौड ग्राम को सन् १९९७ में एक साथ ४ राष्ट्रपति पुरस्कार मिले, जो कि गर्व की बात है। यहां दो जिनालय हैं। दूसरा मेहतों का वास श्री पाशर्वनाथ प्रभु का है। उसकी अलग पेढी है। हिन्दू मंदिरों में श्री खौड खेतलाजी, नृसिंह का द्धारा, सत्यनारायण, हनुमानजी, पद्मनाथजी, शनिश्वरजी मंदिर प्रमुख हैं। ग्राम पंचायत, पोस्ट ऑफिस, दूरसंचार, बैंक, विद्यालय, अस्पताल, परिवहन, पुलिस चौकी इत्यादि सारी सुविधाएं उपलब्ध है। ३ चिकित्सालय, पशु चिकित्सालय, बालिका विद्यालय, माध्यमिक-सेकेंडरी व हायर सेकेंडरी (जूनियर कॉलेज), छोटे कारखाने, आदि यहां की विशेष उपलब्धि हैं। अनेक पुण्यशाली आत्माओं ने यहां से संयम मार्ग को अपनाकर कुल व नगर का नाम रोशन किया है। यहां का विशाल रावला देखने योग्य है। श्री पुतली हनुमानजी व खेतलाजी का प्रतिवर्ष मेला लगता है। यहां का ‘लोक गैर नृत्य’ प्रसिद्ध है।

Khaud 3 Khaud 2श्री चिंतामणि पाश्र्वनाथजी मंदिर : खौड नगरी के मेहतों के वास में स्थित, प्राचीन श्री चिंतामणि पाशर्वनाथ प्रभु के शिखरबंध जिनालय की प्रथम प्रतिष्ठा श्री संघ अनुसार वि. सं. १९५२ में हुई एवं ‘जैन तीर्थ सर्व संग्रह’ ग्रंथ अनुसार सं. १९५१ में हुई व मु. श्री पाशर्वनाथ सह पाषाण की ३ व धातु की ७ प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हुई।

तिथि व प्रतिष्ठाचार्य की संघ को जानकारी नहीं, स. १९५१ में वरकाणा तीर्थ पर ६०० जिनबिंबों की अंजनशलाका आ. श्री राजसूरिजी (भट्टारक) के हस्ते माघ सु. ५ गुरुवार को हुई थी।

संवत् को अगर ध्यान में लें तो शायद वरकाणा सही हो। सं. १९५२ में मूलनायक श्री चिंतामणि पाशर्वनाथ (वर्तमान में श्री शंखेश्वर पाशर्वनाथ) सह शांतिनाथजी व अभिनंदन स्वामी स्थापित हुए। उस समय मूलनायक के नीचे वर्तमान जैसी कमलाकर गादी नहीं थी। प्रतिमा लेख पर अगर ध्यान दें तो वस्तुस्थिति समझ सकते हैं।

संभवत : मंदिर की जीर्ण-शीर्ण स्थिति को ध्यान में लेकर श्री संघ ने जीर्णोद्धार करवाया, तीनों प्रतिमाएं यथावत रखी, सिर्फ मूलनायक श्री चिंतामणि के नीचे सुंदर कमलाकर ऊंची गादी का निर्माण कर वीर नि.सं. २४७४, शाके १८६९, ई. सन् १९४८ व विक्रम संवत् २००४ में नाकोडा तीर्थोद्धारक आ. श्री हिमांचलसूरिजी आ. ठा. के वरद हस्ते प्रतिष्ठा संपन्न हुई व ध्वजा का लाभ स्व. ओटरमलजी परथीराजजी मेहता परिवार वालों ने लिया। मंदिर के दायीं तरफ कुलदेवी श्री सच्चियाय माताजी (श्री ओसियाजी माता) के मंदिर में देवी की स्थापना हुआ। यह मंदिर भूमि से २ फूट ऊँचा बना है। कहा जाता है कि इस पावन स्थल पर माता देवी ने खुद प्रकट होकर स्वयं दर्शन दिये थे।

प्रतिष्ठा के ५० वर्ष बाद श्री संघ ने, जिनालय को आमूल पुन: निर्माण की तैयारी की और मूर्तियों का उत्थापन एवं श्री जिनमंदिर व माताजी मंदिर का खात मुहूर्त सं. २०५१, महा सुदि १३, सोमवार दि. १३.२.१९९५ को, आ. श्री नित्योदयसूरिजी के हस्ते संपन हुआ तथा शिलान्यास दि. ३१ मई ९५ को पू. आ. श्री की निश्रा में संपन्न हुआ।

नूतन जिन प्रासाद, जो कि भूमि से ५ फूट की ऊंचाई (९ सीढियों से युक्त) पर है, श्वेत पाषाण से निर्मित प्रवेशद्वार पर दोनों ओर दो श्वेत हाथियों से रक्षित है। इस सुंदर कलात्मक शिखरबंध जिनमंदिर में कोरणीयुक्त कलात्मक परिकर में प्राचीन चिंतामणि व वर्तमान में श्री शंखेश्वर पाशर्वनाथजी कमलाकार गादी सह आसपास नूतन श्री सुमतिनाथजी व श्री वासुपूज्यस्वामी जिनबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, आ. श्री नित्योदयसागरसूरिजी आ. श्री चंद्राननसागरसूरिजी आ. ठा. व नीतिसमुदायवर्ती मुनि श्री रैवत विजयजी के सानिध्य में वीर नि. सं. २५२४, शाके १९१९ व विक्रम संवत् २०५४, वैशाख शुक्ल ७ शनिवार दि. २ मई १९९८ को जिनमंदिर सह माताजी मंदिर की नवाहिंका महोत्सव पूर्वक संपन्न हुई। माताजी मंदिर में चार भुजा युक्त भगवती मां कुलदेवी सच्चियाय माताजी की प्राचीन प्रतिमा स्थापित हुई। सं. २००४ से २०१४ अर्थात ठीक ५० वर्ष बाद स्वर्ण जयंती पर यह महोत्सव हुआ। श्री शंखेश्वर ट्रस्ट की सहयोगी संस्था ‘श्री जैन युवा मंडल, खौड’ है, जिसने ‘जैन निर्देशिका खौड’ द्वितीय संस्करण-२००५ का सुंदर प्रकाशन किया है। पूर्व में सन् १९९५ में प्रथम संस्करण प्रकाशित हुआ था। सन् १९७८ ई. में स्थापित श्री जैन सेवा मंडल ने ‘नामावली पुस्तिका’ का प्रकाशन किया था। स. २०३४ की प्रतिष्ठा का संपूर्ण विवरण काव्य रूप ‘श्लोंकों’ में हुआ है।

मार्गदर्शन : जिला पाली में रेलवे स्टेशन से ३२ किमी. राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर, जैतपुरा से ७ किमी. दूर जवाली जाने वाली सडक पर खौड अवस्थित है। यह जवाली रेलवे स्टेशन  से ८ किमी. रानी स्टेशन से ३० किमी. व जोधपुर हवाई अड्डे से ११८ किमी. दूर स्थित है। प्रायवेट बस, टैक्सी, ऑटो आदि आवागमन के सारे साधन उपलब्ध है।

सुविधाएं : श्री नेमिनाथ ट्रस्ट के अंतर्गत न्याति नोहरा, आराधना भवन, क्रिया भवन, दादावाडी के साथ यांत्रिक भवन में नॉन अटैच २० कमरे व अटैच १४ कमरे व ३ हॉल (१०० x ६०) की अच्छी सुविधा है। १५० के करीब बिस्तर के सेट हैं। ३०+३० जनरल शौचालय-स्नानघर है। कस्बे की दृष्टि से यह उत्तम व्यवस्था है। मेहतो के वास में पेढी, जो विशाल उपाश्रय में अवतरित है, आराधना भवन, विशाल न्याति नोहरा व उत्तम भोजनशाला की दोनों ट्रस्टों में अलग-अलग व्यवस्था है।

पेढी : १. श्री नेमिनाथ जैन देवस्थान पेढी

चाचोडी रोड, मु. पो. खौड – ३०६११९, तह –रानी स्टेशन, जिला पाली, राज. संपर्क पेढी – ०२९३२-२८६८२४ मुनीमजी : नितिन मेहता- ०९९५०३१२६१३  पुजारी : बंसीलाल-०९९५०९७१६०७

२. श्री शंखेश्वर पाशर्वनाथ चेरीटेबल ट्रस्ट, जैन पेढी, खौड

संपर्क : मुनीमजी : ०२९३२-२८६८८२ अध्यक्ष : श्री जयचंदजी एम. मेहता – ०९३२२६२४६२५ पुजारी : नारायणजी रावल – ०७७४२९२३६७२