अशोक गहलोत की लोकप्रियता और वक्त की जरूरत – निरंजन परिहार (विशेष...

अशोक गहलोत की लोकप्रियता और वक्त की जरूरत – निरंजन परिहार (विशेष संपादकीय)

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राजस्थान के किसी भी जिले के किसी छोटे से गांव में भी चले जाइए। किसी भी अन्य राजनेता के मुकाबले अशोक गहलोत के अनगिनत समर्थक वहां जरूर मिलेगें। ऐसा नहीं है कि सिर्फ वे लोग ही गहलोत को जानते हैं, बल्कि गहलोत भी उन लोगों को निजी रूप से जानते हैं। प्रदेश के किसी अनजान से सुदूर गांव में भी राजनीति की कतई जानकारी न रखनेवाले किसी साधारण व्यक्ति से पूछ लीजिएगा कि प्रदेश में कांग्रेस का सबसे बड़ा नेता कौन है, तो जवाब में अशोक गहलोत का नाम ही सुनाई देगा। और यह तो सबसे बड़ा तथ्य है कि किसी आदिवासी गांव में भी कांग्रेस को चाहे कितना भी बड़ा नेता चला जाए, लोग आज भी यही कहते हैं कि गहलोत की पार्टी से कोई आया है। अशोक गहलोत की यही राजनीतिक पूंजी है। लोग सही कहते हैं कि प्रदेश के सबसे सम्मानित नेताओं के शिखर पर गहलोत की बराबरी का कोई और नेता कांग्रेस में तो क्या किसी और पार्टी में भी नहीं है। और इससे बड़ा तथ्य और क्या हो सकता है कि अशोक गहलोत राजस्थान में कमसे कम तीन लाख से भी ज्यादा कांग्रेस कार्यकर्ताओं को नाम से, शक्ल से और उनके काम से जानते हैं। इसीलिए उनकी विरोधी पार्टी बीजेपी के लोग भी यहां तक कहते हैं कि राजस्थान में स्वर्गीय भैरौंसिंह शेखावत की बराबरी के जनाधारवाला अगर कोई नेता है, तो वह सिर्फ अशोक गहलोत ही है। राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को गहलोत की यही प्रसिद्धि, प्रतिष्ठा और पराक्रमी अंदाज चुभने लगे हैं। चुभन तो कांग्रेस में भी कइयों को है, लेकिन खुलकर कोई बोल नहीं पाता। क्योंकि कांग्रेस में ही नहीं बीजेपी में भी, दिल्ली से लेकर राजस्थान तक सभी जानते हैं कि प्रदेश में फिर से कांग्रेस को जिताने और सत्ता में लाने का अगर किसी में माद्दा है, तो वह सिर्फ और सिर्फ गहलोत ही है, जिनमें हर किसी को पानी पिलाने की क्षमता है।

पहली बार राजस्थान के मुख्यमंत्री तो खैर वे सन 1998 में उस दौर में बने, जब राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी दोनों पार्टियों में जाट, राजपूत और ब्राह्मण नेता सबसे ज्यादा ताकतवर और सर्वाधिक प्रभावशाली उपस्तिथि में थे। उस दौर के समूचे राजस्थान को छोड़ दीजिए, तो उनके अपने ही घर, जोधपुर संभाग में ही उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती थे दमदार जाट नेता परसराम मदेरणा और रामनिवास मिर्धा, वजनदार राजपूत नेता नरेंद्र सिंह भाटी और खेतसिंह राठौड़। एक एक करके इन सबसे से पार पा लेने के बाद बाकी सभी के सामने भी वे ताकत से खड़े रहे। उधर जिन्हें अपने प्रदेश अध्यक्षीय काल में गहलोत ने सन 1988 और 1990 में मुख्यमंत्री बनवाया वे दोनों मेवाड़ के नेता शिवचरण माथुर और हरिदेव जोशी भी कोई कम ताकतवर नहीं थे। लेकिन जोशी और माथुर जैसे ही मजबूत नवलकिशोर शर्मा तक को भी गहलोत ने एक एक करके सबको साध लिया। इसलिए कांग्रेस में भले ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट के समर्थक यह कहते हों कि अब जमाना युवा का है। मगर, यह कहनेवाले भी यह अच्छी तरह जानते हैं कि गहलोत के बिना कांग्रेस की नैया पार लगना नामुमकिन है। सन 1980 में पहली बार सांसद बनने के बाद कुल पांच बार सांसद, चार बार केंद्र में मंत्री, तीन बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और दो बार मुख्यमंत्री रहनेवाले अशोक गहलोत आज राजस्थान में किसी भी दल में निर्विवाद रूप से सबसे बड़े और सबसे अनुभवी नेता माने जाते हैं। और उनके सामने अकेली चुनौती हैं राजस्थान में बीजेपी को हटाना और कांग्रेस को एक बार फिर सत्ता में लाना। प्रदेश में फिलहाल बीजेपी की पीठ पर राज्य की सत्ता विरोधी लहर है, और फिर महारानी की मुद्राएं भी परेशान कर रही हैं। ऊपर से अपने भाषणों से बहुत बड़बोले साबित हो चुके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की असफलताओं का आकाश भी लोगों में निराशा का वातावरण विकसित करता जा रहा है। लेकिन राजस्थान में कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट का राजनीतिक रूप से बहुत नया होने के साथ साथ जाति से गुर्जर होना, कोई बहुत उम्मीद नहीं जगाता। हालांकि प्रदेश कांग्रेस के मुखिया होने के कारण लोग उनसे जुड़ रहे हैं, लेकिन गहलोत जैसा कद पाने के लिए उनको बहुत लंबा वक्त लग सकता है। राजस्थान में सत्ता विरोधी लहर बन रही है, लेकिन इस लहर को आंधी का रूप देकर सत्ता का तख्ता पलट कर देना अकेले सचिन पायलट के बूते की बात नहीं है, यह भी सच्चाई है। ऐसे में प्रदेश में कांग्रेस को कुल मिलाकर सिर्फ अशोक गहलोत का ही सहारा है। क्योंकि गहलोत की सरलता प्रदेश को लुभाती है और उनका साधारण जीवन उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। राजस्थान में मारवाड़ के गांधी के नाम से विख्यात गहलोत अब फिर कमर कस रहे हैं। क्योंकि कांग्रेस को संजीवनी देने और अपने अच्छे कार्यों को फिर से जनता को याद दिलाने का सबसे उपयुक्त समय यही है। वैसे, सन 2013 में सरकार में आने के बाद बीते तीन सालों में सरकार के कामकाज के हिसाब से और नेतृत्व के मामले में बीजेपी में ही मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की हर कदम पर बहुत आलोचना होती रही है। उनका राजनीतिक कौशल और महिलाओं में उनका आकर्षण उन्हें फिर बार जिताने के लिए काफ़ी नहीं है। क्योंकि महिला मतदाता ही उनसे सबसे ज्यादा नाराज हैं। इस नाराजगी की वजह महिलाओं को रह रहकर गहलोत की याद आना है। दरअसल, मुख्यमंत्री रहते हुए गहलोत ने महिलाओं, वंचितों, कमजोर और गरीब वर्ग के लिए बहुत सारी योजनाओं की बौछार शुरू कर दी थी। जिनका समाज को सीधा लाभ मिल रहा था। उन्होंने उन लोगों के लिए भी एक विशेष पेंशन योजना भी शुरू की, जो उन लोगों के लिए थी, जो किसी भी अन्य पेंशन योजनाओं में किन्हीं कारणों से समाहित नहीं हो पा रहे थे। हालांकि मुख्यमंत्री रहते गहलोत ने अपनी सरकार की सारी योजनाओं को आगे किसी के न बदलने जैसे बहुत मजबूत तरीकों से तय किया था, फिर भी वसुंधरा राजे की सरकार ने गहलोत सरकार की शुरू की गई ज्यादातर योजनाएं बंद ही कर दीं। वसुंधरा का इन योजनाओं को बंद कर देना प्रदेश की आम जनता रास नहीं आ रहा है। महिलाएं नाराज हैं और लोग चिढ़े हुए हैं। यह चिढऩ दिन ब दिन गुस्से में बदलती जा रही है। जनता के पास बदला लेने के लिए सिर्फ उसका वोट होता है, राजस्थान अब यह बदला लेने के लिए वोट के दिन का इंतजार कर रहा है। हालांकि वसुंधरा राजे इस बात पर संतोष कर सकती है कि चुनाव में अभी करीब पौने दो साल हैं, तब तक वे कोई रास्ता निकाल लेंगी। लेकिन राजे की सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि उनकी पार्टी में उनके विरोधियों की संख्या का संसार लगातार विकसित होता जा रहा है और इसके उलट प्रदेश की जनता के दिलों में गहलोत की एक कर्मठ नेता की तस्वीर का कद लगातार बढ़ता जा रहा है। आनेवाले वक्त में गहलोत की इस तस्वीर के ये रंग और ज्यादा चमकते दिखेंगे, यह अभी से साफ लग रहा है। और राजस्थान के राजनीतिक इतिहास में संभवतया यह पहला अवसर है, जब किसी मुख्यमंत्री का तख्त दो साल पहले से ही हिलने लगा हो। वक्त की जरूरत यही है कि राजस्थान में गहलोत की लोकप्रियता, विश्वसनियता और उनके जबरदस्त जनाधार का अभी से उपयोग किया जाए। समय कोई बहुत ज्यादा बचा नहीं है।

Niranjan_Parihar

 

 

 

 

 (लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)