विषयों पर काबू पाना जिनाज्ञा: पंन्यास महेन्द्रसागरजी म.सा.

विषयों पर काबू पाना जिनाज्ञा: पंन्यास महेन्द्रसागरजी म.सा.

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बेंगलुरु। यहां के राजाजीनगर नाकोडा जैन श्वेताम्बर संघ में पंन्यासजी महेन्द्र सागरजी म.सा. ने कहा कि मनुष्य का धार्मिक दृष्टि से परम कर्तव्य है जिनेश्वर की आज्ञा के पालन करना। कषायों पर नियंत्रण, विषयों पर काबू पाना जिनेश्वर की आज्ञा है। वर्षावास में तप त्यागादि की आराधना का नव्य रंग लगता है परन्तु ये तब तक महत्वपूर्ण बनता है जब प्रभु आज्ञा की आराधना के साथ आराधना हो। प्रभु आज्ञा की आराधन सबसे बढक़र आराधना है। प्रभु आज्ञा की आराधना से महत्ती कर्म निर्जरा हुआ करती है। त्याग योग, व्रत योग, स्वाध्याय योग होते है ये अच्छी बात है परन्तु प्रभु आज्ञायोग और भक्ति योग में अपने आपनो नहीं जोड़ा तो आप किसी भी योग से नहीं जुड पाएंगे। पन्यासश्री ने कहा कि जीवन केवल भोग विलास एवं ऐश्वर्य के लिए ही नहीं मिला है इन सबके बीच भी यदि प्रभु भक्ति के ििलए अवसर निकालेंगे तभी हमारा जीवन सफल बनेगा। पन्यासश्री ने रत्नाकर पच्चीसी काव्य ग्रंथ पर प्रवचन करते हुए कहा कि निंदा करने में बहादुरी नहीं है, आत्मनिंदा करने में बहादुरी है। सरलमान, प्रभु एवं भवभीरु व्यक्ति ही स्वयं के पापों को प्रगट कर स्वीकार कर सकता है। स्वयं के पापों को प्रगट कर स्वीकार कर सकता है। स्वयं के पापों को स्वीकार कर उसका पश्चाताप करने वाला ही किए हुए पापों को घटाता है। बुराई दूसरों की करना आसान है परन्तु स्वयं के दोषों को देखना बहुत कठिन है।