अन्तर-आत्मा जिसे सही न माने वह गलत है, गलतियों से बचें...

अन्तर-आत्मा जिसे सही न माने वह गलत है, गलतियों से बचें – आचार्य जिनमणिप्रभ सागरजी

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दुर्ग। ऋषभ नगर में संचालित चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि दैनिक जीवन में हमारे द्वारा किए गए कार्यकलापों पर हमारी अंतर-आत्मा तत्काल अपनी प्रतिक्रिया देती है। हमारी अन्तर-आत्मा जिसे सही न माने वह गलत है। हमें ऐसी गलतियों से बचने के लिए अन्तर-आत्मा की आवाज सुनना चाहिए। अनजाने में की गई गलतियों को तो क्षम्य माना जा सकता है किन्तु जानबूझकर आनन्द के लिए की गई गलतियों के दुष्परिणाम हमें अशांति के चरम तक पीड़ा पहुँचा सकते है।

श्री जैन श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ और संघ शास्ता चातुर्मास समिति द्वारा ऋ षभ नगर, दुर्ग में आयोजित प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य गलतियों का पुतला है। वह गलतियां स्वभावगत रूप से जाने-अनजाने करता है। अनजाने में की गई गलतियों को क्षम्य बताते हुए उन्हें स्वीकारने और प्रायश्चित्त करने का प्रावधान है। जान बूझकर किन्तु मजबूरी में की गई गलतियों के लिए कत्र्ता द्वारा प्रायश्चित्त की व्यवस्था भी है किन्तु जान बूझकर आनन्द के लिए की गई गलतियों के दुष्परिणों से हमें ऐसी क्षति भी हो सकती हैं जो हमारे संपूर्ण जीवन को ही अशान्त बना दे।

आचार्यश्री ने कहा कि गलतियाँ हमारे आचरण, हमारे विचारों और हमारी आत्मा को भी मैला कर देती है। शंका की तरह, गलतियों को अपने हृदय में स्थान देने से हमें बचना होगा। इसके लिए हमें सावधान शब्द रूपी चेतावनी का निरन्तर ध्यान रखना होगा। हमारी अन्तर-आत्मा हमें अपनी गलतियों के क्रियान्वयन के पूर्व हमें ऐसा न करने की चेतावनी देकर सावधान करती है। हमें उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। सुनने, बोलने, धर्म निर्वहन, जीवन-यापन आदि में सत्य और शुद्ध आचरण हमें गलतियों से बचाता है। सच्चाई, अच्छाई और उपयोगिता की कसौटी हमारे कार्य व्यवहार में गलतियों को परखने का अवसर देती है। आचार्यश्री ने कहा कि सत्य को छुपाने की आवश्यकता नहीं होती, किन्तु असत्य को छुपाने के लिए लम्बी प्रक्रिया चलते रहती है, अत: असत्य आचरण से स्वयं को बचाना भी आवश्यक है।

धर्मसभा को सम्बोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि एकान्त क्षणों में हमें अपने दैनिक क्रियाकलापों का आत्मावलोकन कर अपनी गलतियों को न दोहराने के संकल्प के साथ अपनी गलतियों को जानकर, समझकर उनका प्रायश्चित कर आत्मशान्ति, आत्मकल्याण के लिए सतत् सावधान रहकर जीवन जीना चाहिए। धर्मसभा में अपना उपवास समाप्त कर पारणा लेने वाली संगीता बाघमार, राखी पारख और सतीश लोढ़ा को चातुर्मास समिति की ओर से सम्मानित किया गया। प्रश्नोत्तरी प्रवचन और पारिवारिक प्रवचन श्रृंखला के अन्तर्गत स्नेह का धागा, स्वास्थ्य की कैचीÓÓ विषय पर होने वाले प्रवचन की जानकारी श्रोताओं को दी गई। सभा का संचालन महेन्द्र दुग्गड़ ने किया। बाहर से आए श्रद्धालुओं सहित बड़ी संख्या में जैन बंधुओं ने प्रवचन का लाभ लिया।