बैंगलोर में पंन्यास प्रवर निजानंदी श्री महेन्द्रसागरजी म.सा. भव्य चार्तुमास प्रवेश

बैंगलोर में पंन्यास प्रवर निजानंदी श्री महेन्द्रसागरजी म.सा. भव्य चार्तुमास प्रवेश

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बैंगलोर। श्री नाकोडा पाश्र्वनाथ जैन श्वेताम्बर संघ बैंगलोर के तत्त्वाधान में आयोजित चार्तुमास मंगल प्रवेश के दौरान निजानंदी पन्यास श्री महेन्द्रसागरजी, मुनिश्री राजपद्मसागरजी एवं मुनिश्री मेरुपद्मसागरजी की अगवानी कर हर कोई अपने को धन्य मान रहा था। सुबह साढे ८ बजे स्थल से बैंड बाजे के साथ नाचते गाते भक्तों का काफिला लंबा होता चला गया। राजाजी नगर के प्रमुख मार्गो से होकर धर्मसभा तक पहुंचने में काफी समय लगा। मार्ग में जगह-जगह पर तोरणहार बांधकर संतों का मंडलों एवं परिवारों का स्वागत किया गया। जुलूस में कई शहरों के संघ सदस्य व अध्यक्ष शामिल हुए। गुरूभक्ति गीत पर नाचते, सिर पर मंगल कलश लिये महिलाएं और जिनशासन के राजा, जैनम् जयति शासनम्, गुरूजी हमारा अंतर्नाद, के उद्घोषों के साथ पन्यासजी की अगवानी में उमड़ा जैन समाज। यह नजारा यहां सुबह-सुबह देखने को मिला। भव्य प्रवेश का हिस्सा बनने के लिये जनता का भारी रेला स्थल की ओर चल पड़ा था। धवल एवं रंग बिरंगे परिधान में सुसज्ज पुरूषवर्ग मस्तक पर राजस्थान की आन-बान-शान का प्रतीक पंचरंगी साफा प्रवेशोत्सव में चार चांद लगा रहा था। महिलाएं चुनड़ी की साड़ी में मस्तक पर मंगल कलश धारण किये गुरूदेव को बधाने के लिये आतुर नजर आ रही थी। बैंड की मधुर झंकार, ढोल की कर्ण प्रिय थाप और सुरीली स्वर लहरियां ऑसमान की ओर उठ रही थी और पूरे वातावरण को थिरकने के लिये मजबूर कर रही थी। मंदिरजी पहुंचते ही यह जुलूस धर्मसभा में परिवर्तित हुआ। यहां मंगलचारण गुरूवंदन के पश्चात मंडलों के द्वारा स्वागत गीत प्रस्तुत किये गये। इस दरम्यान पन्यासजी द्वारा लिखित / संपादित चार किताबों एवं पत्र संदेश का विमोचन भी किया गया। पन्यासजी ने इस प्रवेशोत्सव पर संबोधित करते हुए कहा कि जल की अकेली बंूद को हवा उड़ा ले जाना चाहती है, मिट्टी उसे सोख लेना चाहती है, सूरज की किरणें उसके अस्तित्व से छेड़-छाड़ करती है और पक्षी उसे चोंच में समा सकता है। वहीं बूंद सागर या सरिता में मिल जाती है तब स्वयं सागर बन जाती है, फिर उसे कोई भय और डर नहीं रहता है। मैने भी संयम स्वीकार कर संघ और गुरू चरणों में अपने आपको मिला दिया तो मेरा भी डर और भय चला गया। समर्पण ने मुझे साहस और शौर्य दिया है। चातुर्मास में अब जो करना है, आपको ही करना है, मेरा काम आने का था और मैं आ गया हूं। मैं चौमासा करूंगा, आपको चौमासा कराना है परंतु चौमासा करने से भी चौमासा कराना कठीन होता है। इस प्रसंग पर मुनि श्री राजपद्मसागरजी ने भी अपना तेजस्वी उद्बोधन दिया। प्रवेश प्रसंग पर अहमदाबाद-मुंबई, बेलगावी, हुबली, गदग, हडग़ली, होसपेट, बल्लारी-कम्पली-सिंकदराबाद, सिन्दनूर, धारवाड़, मैसूर-कोयम्बटूर, बागलकोट, विजयवाड़ा, मडगांव, कलीकर आदि शहर नगरों से गुरूभक्त पधारे थे।

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