धर्म की चर्चा नहीं चर्या होनी चाहिए – पंन्यास श्री महेन्द्रसागरजी म.सा.

धर्म की चर्चा नहीं चर्या होनी चाहिए – पंन्यास श्री महेन्द्रसागरजी म.सा.

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हुबली । केशवापुर जैन श्वेताम्बर संघ में पंन्यासश्री महेन्द्रसागरजी म.सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि धर्म अपने आप में पवित्र जीवन जीने का एक दिव्य राजमार्ग है। यह सिर्फ दुखदायी दुर्गति से बचने के लिए है। शुभगति पाने के लिए नहीं अपितु मन के विकारों को शांत करने के लिए और कषायों से मुक्त होने के लिए है। जिनेश्वर भगवान द्वारा निर्दिष्ट एक – एक आराधना उपासना में इन्हीं बातों का हेतु समाया हुआ है। उन्होंने कहा कि धर्म की चर्चा नहीं चर्या होनी चाहिए। धर्म का निवास स्थान पवित्र अन्त:करण है। जिस मन में क्रोध, अहंकार, कपट, लोभ, राग, द्वेष आदि का गंदापन है वह मन किसी भी रुप से धर्म साधना के योग्य नहीं हो सकता है। पहले अपने मन को स्वच्छ बनाएं एवं उसके बाद धर्म, अध्याय और परमात्मा की बातें करें। इस संसार में दो प्रकार की शुद्धियां है, बाह्य और आंतरिक। बाह्य शुद्धि का संबंध तन और परिवेश के साथ है, जबकि अंतर शुद्धि का संबंध मन के साथ है। आज जितनी सजगता और उपाय बाह्य शुद्धि के लिए होते हैं उतने उपाय अंतर शुद्धि के लिए नहीं होते है। सुबह स्नान, वस्त्र धुलाई, घर आंगन की सफाई के लिए जितना समय खर्च किया जाता है। उतना समय अंतर शुद्धि के लिए खर्च नहीं होता है। व्यक्ति अपनी अंतर शुद्धि के लिए कभी उतना समय खर्च करता है? बाह्य शुद्धि की तरह आत्मा की शुद्धि के लिए जप, तप, नियम, व्रत, सामायिक, स्वाध्याय, ध्यान, प्रतिक्रमण, दान और शील जैसी प्रवृत्तियों से जुडक़र हमें अंतर को शुद्ध रखने और करने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि जो क्रोध मौके पर प्रेम जगा दे, लोभ के वातावरण में संतोष ला दे, अहंकार के अवसर पर विनम्रता पैदा कर दे और विलासिता के माहौल में संयम के भाव पैदा करे उसी का नाम धर्म है। धर्म को बाहर ही बाहर दिखावे तक सीमित मत रखिए, उसे अंदर प्रवेश करने दीजिए। धर्म दिखावे के लिए नहीं बल्कि जीने के लिए है। तीर्थों में जाकर स्नान पूजा अर्चना करना सरल है किन्तु घर में रहकर आत्मा को निर्मल भावों में रखना मुश्किल है।