जैन समाज की घटती संख्या एवं युवाओं में साधु-संतो के प्रति घटता...

जैन समाज की घटती संख्या एवं युवाओं में साधु-संतो के प्रति घटता मोह चिंताजनक – आचार्य विमलसागरसूरिजी म.सा.

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मुंबई। आचार्य विमलसागरसूरिजी म.सा. का ४ वर्ष बाद लालबाग स्थित कमल दर्शन विजय रेजीडेंसी में महिला मंडल की बहनों द्वारा कलश परिक्रमा एवं गाजे-बाजे के साथ भव्य स्वागत हुआ। वर्धमान स्टेट निवासी राजस्थान के तखतगढ़ निवासी देवीचन्द नरसिंग परिवार के विशेष आग्रह पर पधारे आचार्य विमलसागरसूरिजी म.सा., मुनि पद्मविमलसागरजी म.सा के पगलिये के दौरान सैकड़ो की संख्या में जैन समाज के साथ हिन्दू समाज के लोगों ने भी पलक पांवड़े बिछाकर म.सा. की आगवानी की। प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने जैन समाज की घटती संख्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि मैं आज यहां आप सभी को जगाने आया हूं। जैन समाज की संख्या दिनों-दिन घट रही है, और बाकी समाजों की बढ़ रही है। जैन समाज की एकता खंडित हो गई है। युवाओं में समाज एवं धर्म के प्रति निष्ठा खत्म हो रही है। जैन समाज के लोग आज अन्य समाज में आपसी विरोध देखने को मिल रही है। समाज तेरापंथी, मंदिरमार्गी, स्थानकवासी, दिगंबरी, तपोगच्छी, ओसवाल, पोरवाल आदि में बटा हुआ है। इस विषय पर चिंतन नहीं किया गया तो समाज टुंकड़ो में बंटते-बंटते खत्म हो जाएगा। जैन समाज के सभी सम्प्रदाय आपस में शादी-विवाह करते है, भोजन व्यवहार करते हैं, सभी अपने को महावीर की संतान बताते हैं फिर गुरु एवं संतो को लेकर क्यों बट जाते हैं? अगर ऐसा ही चलता रहा तो १८० सालों में जैन समाज खत्म हो जाएगा। यह बात में अपने ३४ सालों के साधु जीवन के अनुभव के आधार पर बड़ी भावुकता के साथ कहता हूं आज बहुत से जैन परिवारों अजैन बन गए है, खान-पान रहन-सहन एवं धर्म से कोसो दुर चले गए है। मेरा कोई बैंक बैंलेंस नहीं है, कही मंदिर या उपाश्रय नही बनवाए, मुझे किसी प्रकार का लालच नहीं है। परन्तु समाज की घटती संख्या से मैं बहुत दुखी हूं। सन १९९६ से मैं आप सभी को आगाह कर रहा हूं। अगर अब भी नहीं जगे तो बहुत देर हो जाएगी। जैन समाज को कोई विजन नहीं, कोई एजेंडा नही, एकता नही। जिसके कारण कोई आपको पीट रहा है, मार रहा है, गाली दे रहा है। आखिर समाज का कोई नेता क्यों नहीं है। हमारी युवा पीढ़ी हम दो हमारे एक पर आखिर क्यों अड़ी हुई है। अगर ऐसा ही रहा तो हमारा हाल भी फारसियों जैसा होगा। फारस की खाड़ी ईरान में फारसियों का राज था। मगर उनमें एकता नहीं थी। उन्हें मारा गया, लूटा गया, बहन बेटियों के साथ दुष्कर्म किया गया, धर्म परिवर्तन किए गये। बचे हुए लोग गुजरात और मुंबई आए और उनकी संख्या मात्र १० प्रतिशत रह गई है। जैन समाज की संख्या में १५ साल पहले एक करोड़ थी जो अब मात्र ६० लाख रह गयी है। आचार्यश्री जैन धर्म से इतर अन्य धर्म के साधु-संतो को मानने पर भी कटाक्ष किया। वहीं जैन परिवार की धार्मिक भावना पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने कहा कि घर में चार लोग है परन्तु व्याखान सुनने केवल 1 लोग आते है, बाकी नहीं। क्योंकि जैन साधुओं में भी विवाद है। जैन श्रावक भी आपस में भी विवाद है। घर में जो जैन उन्हें भी जैन बनाए रखना मुश्किल है। राजस्थानी समाज सबसे ज्यादा धर्म से बिछड़ रहे है। आप गिरनार, पालीताणा, केशरियाजी एवं अन्य तीर्थों के लेने की बात करते हैं। परंतु उनकी रक्षा कैसे करेंगे? आपके पास तो संख्या ही नही है। कुछ दिनों में दूसरे लोग आपके धार्मिक स्थानों, जमीन-जायदाद, घर, बहन-बेटियों को दूसरे लोग तलवार की नोक पर लूटेंगे। समय आ गया है। धर्म को बढ़ाओं, परिवार को बढ़ाओं, समाज की एकता को बढ़ाओं। कार्यक्रम के दौरान देवीचन्द नरसिंग परिवार की ओर से गुरुदेव एवं साध्वीवृंद को कामली वोराई गई। व्याख्यान के पश्चात देवीचन्द नरसिंग परिवार की ओर से भोजन प्रसादी का भी आयोजन किया गया था, जिसका सभी ने लाभ लिया। गुरुदेव प्रतिदिन होने वाले व्याख्यान में महाराज अन्य विषयों, समस्याओं एवं समाधान के प्रति श्रावकों का जागरूक करेंगे।