रानीगांव (सरदारगढ) / Ranigaon : राजस्थान की मरुस्थल भूमि का गौरवमय जिला...

रानीगांव (सरदारगढ) / Ranigaon : राजस्थान की मरुस्थल भूमि का गौरवमय जिला पाली, जिसे गोडवाड का हृदयस्थल कहा जाता है

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राजस्थान की मरुस्थल भूमि का गौरवमय जिला पाली, जिसे गोडवाड का हृदयस्थल कहा जाता है, में राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर केनपुरा चौराहा से ८ किमी. एवं अहमदाबाद-दिल्ली पश्चिम रेलवे के प्रसिद्ध औद्योगिक नगर रानी रेलवे स्टेशन से २ किमी. दूर सुकडी नदी के किनारे छोटी सी पहाडी की गोद में बसा है ‘रानीगांव’। गांव की १२०० घरों की बस्ती में जनसंख्या १५ हजार के लगभग है। जैनों की ४५० घर हौती (ओली) २००० के करीब जैन जनसंख्या है।

इतिहास के पन्ने पलटने से गांव की पुरानी यादें ताजा होने लगती हैं। ‘जैन तीर्थ सर्वसंग्रह’ ग्रंथ के अनुसार, श्रीमान् जत्राजी कुशलाजी ने वीर नि. सं. २३२१, शाके १७१६, ई. सन् १७९५, वि.सं. १८५१ में शिखरबंध जिनालय का निर्माण करवाकर संप्रतिकालीन श्री शांतिनाथ प्रभु की प्रतिमा सह पाषाण की ६ व धातु की २ प्रतिमाएं स्थापित की एवं मंदिर वहीवट हेतु श्री संघ को सौंप दिया। उन दिनों ६०० जैन, उपाश्रय और २ धर्मशालाएं थीं। पुस्तक भंडार तथा चैत्य में कांच का जडाव सुंदर व भींत पर चित्रकाम काफी प्राचीन प्रतीत होता है। उपरोक्त जानकारी से नगर की प्राचीनता भी जान पड़ती है। पहले के जीणोद्धार की जानकारी उपलब्ध नहीं है।

प्राचीन शिलालेख : मंदिर में मुख्य दरवाजे के पास लगे प्राचीन शिलालेख से उपरोक्त जानकारी भी सही जान पडती है। वीर नि.सं. २३२४, शाके १७१९, ई. सन् १७९८ व वि. सं १८५४ प्रवर्तमाने, मगसर शुक्ल ५, गुरुवार को मंदिरजी रो पायो (शिलान्यास व नींव) भरीयों। मंदिर निर्माण की पूर्णता पर वीर नि.स. २३२६, शाके १७२१, ई. सन् १८०० व विक्रम संवत १८५६ माघ शुक्ल ५, गुरुवार को उरजणसिंह राज्ये, रानीनगरे श्री तपागच्छ भट्टारक श्री विजय जिनचंद्रसूरिजी के वासक्षेप व. प. कांतिविजयजी गणी के उपदेश से प्रतिष्ठा संपन्न हुई एवं मूलनायक संप्रतिकालीन श्री शांतिनाथ प्रभु प्रतिष्ठित किए गए। कालचक्र निरंतर अपनी गति से घूमता रहा। देखते ही देखते १६० वर्ष बीत गए। इस प्राचीन जिनालय का भव्य जीर्णोद्धार होकर नूतन मंदिर का निर्माण हुआ।

नूतन जिनमंदिर प्रतिष्ठा : वीर नि. सं. २४८६, शाके १८८१, ई. सन् मई १९६०, वि. सं. २०१६ वर्षे, वैशाख शुक्ल ६, सोमवार को श्री संघ ने जीर्णोद्धारित भूमि जिनप्रासादे जैनाचार्य श्रीमद् विजय जोजावर रत्न जिनेन्द्रसूरिजी आ.ठा. के वरद हस्ते नूतन मूलनायक श्री सुपाशर्वनाथ, प्राचीन शांतिनाथदि जिनबिंबों की महोत्सवपूर्वक प्रतिष्ठा संपन्न हुई। समय के प्रवाह में १८ वर्ष बीत गए, एक नए प्रसंग के आगमन में।

दूसरी प्रतिष्ठा :  मंदिर के कुछ नए निर्माण हुए। नूतन देहरी में मूलनायक श्री आदिनाथ, नूतन परिकर युक्त व शीतलनाथ महावीर स्वामी, नूतन दूसरी देहरी में मूलनायक श्री सहस्त्रफणा पाशर्वनाथदि, तीसरी देहरी में मूलनायक श्री सुमतिनाथि, दो अलग-अलग देहरियों में श्री जीरावला व शंखेश्वर पाशर्वनाथ एवं यक्ष-यक्षणी आदि मूर्तियों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि. सं. २५०४, शाके १८९९, विक्रम संवत् २०३४, ज्येष्ठ शु. १०, शुक्रवार दि. १६.६.१९७८ को नीति समुदायवर्ती, राजस्थान दीपक आ. श्री सुशीलसूरिजी, पू. वाचक विनोदविजय गणी, चाचोडी रत्न पू. पंन्यास विकासविजयजी आ.ठा. की निश्रा में महोत्सव पूर्वक संपन्न हुई।

इसी मुहूर्त में गांव के बारह दादावाडी की एक देहरी में कल्पवृक्ष तले श्री ॠषभदेव प्रतिमा एवं दादा की चरण-पादुका की प्रतिष्ठा भी साथ में संपन्न हुई। बच्छावत परिवार हर वर्ष ध्वजा चढाते हैं।

नूतन समाज भवन : श्री संघ ने ५० वर्ष पूर्व दूरदर्शिता रखकर ९५०० वर्गफीट की विशाल भूमि पर न्याति नोहरे का निर्माण करवाया था। नूतन कार्यकारिणी ने जिनालय की ५०वीं वर्षगाठ के अवसर पर इसका आमूलचूल जीर्णोद्धार करवाकर इसे विशाल भवन का रूप दिया| वर्तमान युग की हर आधुनिक सुविधायुक्त इस भवन में व्याख्यान हॉल, आराधना भवन, प्याऊ, भोजनकक्ष, विशाल रसोईघर, स्वागत कक्ष इत्यादि सुविधाओं को ध्यान में रखकर निर्माण किया गया है। जिनमंदिर की ५४वीं वर्षगांठ के अवसर पर नूतन भवन संघार्पण स्नेह मिलन व दीक्षा महोत्सव का भव्य आयोजन रख वि. सं. २०६९ वै. सु. ६, गुरुवार दि. १६.५.२०१३ को गुरुदेवों का सामैया, नूतन भवन का उद्घाटन व ५४वां ध्वजाजारोहण हुआ एवं वै.सु. १०, सोमवार दि. २०.५.२०१३ को कु. मुमुक्षु निशा का दीक्षा महोत्सव हुआ। संपूर्ण कार्यक्रम में शांतिदूत आ. श्री नित्यानंदसूरिजी, अखंड वर्षीतप तपस्वी आ. श्री वसंतसूरिजी आ.ठा. की निश्रा में संपन्न हुआ। रानी रत्न पंन्यास श्री रविन्द्र विजयजी एवं गोडवाड दीपिका सा. श्री लेहरो महाराज सह कुल २० आत्माओं ने जिनशासन में समर्पित होकर कुल, संघ और समाज का गौरव बढाया है। ‘श्री जैन युवक सेवादल’ जो श्री संघ की सहयोगी संस्था है, ने ‘संघ निर्देशिका २०००’ का प्रकाशन करवाया।

दुर्ग एवं श्री जोगमाया मंदिर : श्री सुखदेव प्रासादकाक जोधपुर स्टेट में सर प्रतापसिहंजी के शासनकाल में मुसायबा आला कहलाते थे। इनको सन् १९०५ में लॉर्ड कर्जन ने देश निकाला दे दिया था। इसके बाद इनको जागीर मिली थी., जिसमें रानीगावं भी था। इस स्थान पर पहाडी की ऊंचाई को सुरक्षा की दृष्टि के मद्देनजर रखते हुए, सन् १९२० में इस भव्य शाही महल का निर्माण करवाया। यहां के प्रसिद्ध ‘जोगमाया’ का मंदिर है। इनके दर्शनार्थ श्रद्धालु दूर-दूर से आते हैं।

चातुर्मास : सं. २०२६ व २०३० में मु. जितेन्द्र वि. सं. २०४१ में आ. श्री सुशीलसूरिजी व सं. २०४४ में आ. श्री प्रद्योतनसूरिजी एवं मु. श्री रत्नसेन वि. के चातुर्मास हुए हैं।

मार्गदर्शन : रानी रेलवे स्टेशन से मात्र २ कि.मी, पाली से ५० कि.मी. जोधपुर हवाई अड्डे से १३५ कि.मी. और राजमार्ग पर केनपुरा चौराहा से ८ कि.मी. दूर स्थिति है रानीगांव। यहां के लिए हर प्रकार के आवागमन के साधन उपलब्ध है।

सुविधाएं : नूतन निर्मित भवन में हर तरह की आधुनिक सुविधा उपलब्ध है। नया व पुराना उपाश्रय, संघ, अतिथि गृह, उत्तम भोजनशाला, धर्मशाला, विद्यालय, हॉस्पिटल आदि सभी सुविधाएं हैं। ठहरने हेतु नई शैली के कमरे बने हैं। २ किमी. दूर रानी स्टेशन व अष्टापद तीर्थ पर हर तरह की  भरपूर सुविधाएं उपलब्ध है।

पेढी : श्री सुपाश्र्वनाथ जैन देवस्थान पेढी

मुख्य बाजार, मंदिर रोड, मु. पो. –रानीगांव ३०६११५, तहसील-देसूरी, जिला-पाली, रेलवे स्टेशन रानी, राजस्थान

पेढी संपर्क: ०२९३४-२२६१२८,