धणा / Dhana : मरुधर की पावन पवित्र वीरभूमि के गोडवाड क्षेत्र...

धणा / Dhana : मरुधर की पावन पवित्र वीरभूमि के गोडवाड क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर केनपुरा चौराहा से मात्र ५ कि.मी. और रानी स्टेशन से १५ किमी. दूर लापोद जाने वाली सडक पर स्थित है गांव ‘धणा’

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मरुधर की पावन पवित्र वीरभूमि के गोडवाड क्षेत्र में राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ पर केनपुरा चौराहा से मात्र ५ कि.मी. और रानी स्टेशन से १५ किमी. दूर लापोद जाने वाली सडक पर स्थित है गांव ‘धणा’

जिला पाली के मध्य बसा, धणा गांव है नाम।

उमठी नदी के तीर पर, यह सुंदर है धाम।।

यहां पूर्व में एक घरमंदिर था, जिस पर शिखरबद्ध जिनमंदिर का निर्माण करवाकर श्री संघ द्वारा प्रतिष्ठा वीर नि. स. २४५८, शाके १८५३, वि. स. १९८८ के माघ सुदि ६, शुक्रवार, दि. फरवरी १९३२ को पू. १००८ श्री हितविजयजी म.सा. अपने बालमुनि पू. श्री हिम्मतविजयजी (बाद में आ. श्री हिमांचलसूरिजी) आ. ठा. की शुभ निश्रा में संपन्न हुई थी।

जैन तीर्थ सर्वसंग्रह ग्रंथ के अनुसार श्री संघ ने वि. स. १९०१ में जिन मंदिर का निर्माण करवाकर मूलनायक श्री आदिनाथजी सह पाषाण की ६ प्रतिमा एवं धातु की १ प्रतिमा स्थापित करवाई, प्रतिमा पर अंकित लेख अनुसार, यह सं. १५४५ की प्रतिष्ठित है। पहले यहां ६० जैन घर, एक उपाश्रय और एक धर्मशाला थी।

प्रथम तीर्थंकर श्री ॠषभदेवजी मंदिर में वि. स. १५ में निर्मित लगभग २०५५ वर्ष पुरानी अति प्राचीन श्री श्रेयांसनाथ प्रभु की ऐतिहासिक प्रतिमा विद्यमान है। यह प्रतिमा श्री संप्रतिराजा द्वारा भरवाई गई थी, जो आज भी शिलालेख पर अंकित है।

कालचक्र के साथ मंदिर धीरे-धीरे जीर्ण अवस्था में पहुँच गया। श्री संघ ने विचार-विमर्श के बाद इसके जीर्णोद्धार का निर्णय कर, कार्य प्रारंभ की तैयारी की। सर्वप्रथम सभी प्रतिमाओं का उत्थान वीर नि. स. २५०७, शाके १९०२ , वि. स. २०३७, माघ सुदि ११, शनिवार दि. १४ फरवरी १९८१ को शुभ मुहूर्त में त्रिस्तुतिक पू. गच्छाधिपति आ. श्री विद्याचंद्रसूरिजी के शिष्यरत्न शांतमूर्ति पू. मु. श्री तत्पश्चात इसका भूमिपूजन (खनन विधि) वि. सम. २०३७ के वल्लभ समुदायवर्ती गोडवाड सादडी रत्न पू. आ श्री हींकारसूरिश्वरजी आ. ठा. की शुभ सानिध्य में संपन्न हुआ एवं आपश्री की ही निश्रा में, वि. स. २०३७ के ज्येष्ठ सुदि ७, सोमवार दि. ८ जून १९८१ को शिलास्थापना संपन्न हुई।

भूमिपूजन और मुख्य शिला के श्री धूलचंदजी तेजाजी तलेसरा परिवार लाभार्थी बने।

करीब ८ वर्ष के लंबे अंतराल के बाद प्राचीन प्रतिमाओं का मंगल प्रवेश, पू.मु. श्री जयानंदविजयजी की निश्रा में वीर नि. स. २५१५, शाके १९१०, वि. स. २०४५ के वैशाख सुदि १० सोमवार दि. १५ मई १९८९ को सानंद संपन्न हुआ। जिनमंदिर के निर्माण की प्रेरणा, पू. सा श्री वल्लभश्रीजी एवं पू. सा. श्री सुमतिश्रीजी की रही। समय बीत रहा था, पर प्रतिष्ठा का योग नहीं बन रहा था। समय के साथ आपसी तालमेल से आखिर प्रतिष्ठा का निर्णय हुआ और मुहूर्त भी पा लिया गया।

वर्षों से जो आस लगी थी, अब हो रही साकार. . .

प्रभु उत्थापन दि. १४.२.१९८१.. प्रभु स्थापना दि. २२.५.१९९६ करीब १५ वर्षों बाद वो मंगल घडी आ ही गई.. प्रभु होंगे गादीनशीन। आरस पाषाण में भव्य शिल्पकलाओं से नवनिर्मित, सुरम्य, शिखरबद्ध श्री ॠषभदेव जिनप्रासाद में श्वेतवर्णी, १७ इंची, पद्मासनस्थ-महावीर स्वामीजी आदि जिनबिंबों की अंजनशलाका प्रतिष्ठा, यक्ष-याक्षिणी, अधिष्ठायक देवी-देवताओं की मूर्तियों की मंगल स्थापना, १२ दिवसीय महोत्सव में वीर नि. सं. २५२२ शाके १९१७, वि. स. २०५२ नेमि सं. ४७ के ज्येष्ठ शुक्ल ५, बुधवार दि. २२ मई १९९६ को, संपूर्ण जीर्णोद्वार कृत शिखरबद्ध चैत्य में नूतन कलात्मक परिकर में प्रथम तीर्थंकर श्री ॠषभदेव को राजस्थान दीपक, १३२वीं प्रतिष्ठा के शिल्पकार, पू. आ. श्री सुशीलसूरिजी, पंन्यास प्रवर श्री जिनोत्तम विजयजी आ. ठा. की पावन निश्रा में मंत्रोचार व विधि-विधान से प्रभु को गादीनशीन अर्थात प्रतिष्ठित किया गया। नूतन प्रतिमाओं की अंजनशलाका ज्येष्ठ शु. ३ सोमवार दि. २० मई १९९६ को संपन्न हुई। रंगमंडप के गोखलों में, वि. सं. १५ निर्मित श्री श्रेयांसनाथ प्रभु की अति प्राचीन प्रतिमा एवं वि. सं. १९५१, माघ शु. ५ गुरुवार, फरवरी १८९५ को वरकाणा तीर्थ प्रतिष्ठा पर, भट्टारक आ. श्री राजसूरिजी के हस्ते अंजनशलाका की हुई प्रभु श्री पाशर्वनाथ भगवान की प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित की गई। प्रतिष्ठा के चढावों की जाजम आ. श्री विमलभद्रसूरिजी की निश्रा में मुंबई में दि.२३ फरवरी १९९६, शुक्रवार को संपन्न हुई थी। प्रतिवर्ष जेठ सु. ५ को श्री मोहनलालजी चुन्नीलालजी सुराणा परिवार ध्वजा चढाता है।

नगर में जैनों के करीब ६० घर हैं। शिक्षा क्षेत्र में भी धणा अहम भू्मिका में है। यहां करीब ५० व्यक्ति स्नातक, डॉक्टर, वकील, इंजीनियर और चार्टर्ड एकाउंटेट है। यह वीरभूमि के नाम से भी जाना जाता है, कारण कि वीर राजपूत श्री छतरसिंहजी ने प्रथम विश्वयुद्ध में, बडी वीरता से लडाई की थी और इस वीरता के फलस्वरूप उन्हें ताम्रपत्र प्राप्त हुआ था। १४०० बीघा जमीन पर घने ओरण (जंगल) से घिरा, अति प्राचीन श्री चामुंडा माता का भव्य मंदिर है, जहां हर वर्ष चैत्र सुदि १४ को विशाल मेले का आयोजन होता है। यहां एक शिवालय और खेडे पर स्थित ९ खुणो की प्राचीन बावडी भी दर्शनीय स्थल है। श्री हनुमानजी, श्री महालक्ष्मीजी,श्री चारभुजाजी, श्री शीतला माता और श्री रामदेवजी का मंदिर भी यहाँ मुख्य आकर्षण हैं। विद्यालय व नि:शुल्क जैन हास्पिटल आदि सुविधाएं उपलब्ध हैं।

मार्गदर्शन : यह नेशनल हाईवे न. १४ पर केनपुरा चौराहा से मात्र ५ कि.मी. रानी स्टेशन से १६ कि.मी. पाली से ५० किमी. जोधपुर हवाई अड्डे से १२५किमी और वरकाणा तीर्थ से २३ किमी दूर है। यहां आगमन के लिए बसे, टैक्सी और ऑटो की सुविधाएं प्राप्त होती है।

सुविधाएं मंदिर के बगल में न्याति नोहरा, सामने सुंदर भोजनशाला, उपाश्रय, आराधना भवन तथा ४ कमरे व एक हॉल के साथ धर्मशाला की सुविधा है।

पेढी : श्री ॠषभदेव जैन श्वे. देवस्थान पेढी

महाजनों की वास, मु.पो. धणा ३०६११५

तह-सुमेरपुर, जिला पाली, राजस्थान

पेढी संपर्क – ०२९३८-२५०२४७

मुनीमजी: मनुभाई ०८१०७८९६०

ट्रस्टी-अध्यक्ष: श्री भागचंदजी सोनिगरा, पुणे -०९९७५११२२२२