ढालोप / Dhalop (धारा नगरी): ढालोप को प्राचीन काल में धारा नगरी...

ढालोप / Dhalop (धारा नगरी): ढालोप को प्राचीन काल में धारा नगरी के रूप में जाना जाता था। यह नगरी विशाल भूखंड पर आबाद थी, जिसका एक द्वार सेवाडी – बीजापुर नदी के किनारे तो दूसरा सुरमेर की नाल व तीसरा बोता रघुनाथगढ स्थान पर था

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राजस्थान के पाली जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. १४ स्थित केनपुरा चौराहा से रानी स्टेशन होकर सादडी जाने वाले मार्ग पर, वाया सिन्दली से तथा जोधपुर-उदयपुर मेगा हाईवे न. ६७ पर नाडोल से वाया कोटडी होकर १० कि.मी. दूर सादडी जाने वाली सडक पर अरावली की गोद में नदी किनारे स्थित है ‘ढालोप’

यह नगर करीब १५०० वर्षों से ज्यादा प्राचीन है। ढालोप को प्राचीन काल में धारा नगरी के रूप में जाना जाता था। यह नगरी विशाल भूखंड पर आबाद थी, जिसका एक द्वार सेवाडी – बीजापुर नदी के किनारे तो दूसरा सुरमेर की नाल व तीसरा बोता रघुनाथगढ स्थान पर था। इसे सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र की नगरी भी कहते हैं। कहा जाता है कि ८वीं शताब्दी में यहां के प्रसिद्ध ब्रम्हाजी मंदिर के जीर्णोद्धार के समय यहां के प्रांतीय अधिकारी दंडाधिकारी ने भी राज्य कोषागार से सहायता भेजी थी। ८वीं शताब्दी में जीर्णोद्धार होने का अर्थ है कि मंदिर का निर्माण इससे कहीं पहले हुआ और यही इसकी प्राचीनता भी प्रकट करती है। विक्रम की १४वीं शताब्दी में रांका गोत्र के वंशज समरेली (मेवाड) से ढालोप आकर बसे। उन्होने काफी धन खर्च करके श्री चंद्रप्रभ स्वामी भगवान का मंदिर बनवाया। बाद में कुछ परिवार ढालोप से चारभुजा जाकर बसे।

जैन तीर्थ सर्वसंग्रह ग्रंथ के अनुसार श्री संघ ढालोप ने शिखरबद्ध मंदिर का निर्माण करवाकर, वि. स. १९८४, (वीर नि. श. २४५४, शाके १८४९) में मूलनायक श्री आदिनाथ सह पाषाण की ६ व धातु की एक प्रतिमा प्रतिष्ठित करवाई। पूर्व में यहां १२५, जैन, २ उपाश्रय और एक धर्मशाला थी। ‘मेरी गोडवाड यात्रा’ पुस्तक के अनुसार, ७० वर्ष पूर्व में यहां के जैन मंदिर में मूलनायक श्री ॠषभदेव स्वामी प्रतिष्ठित थे। एक उपाश्रय, एक धर्मशाला व जैनों के ३०घर विद्यमान थे।

श्री ॠषभदेवजी मंदिर :

नगरजन व प्रतिमा लेख से प्राप्त जानकारी के अनुसार, वीर नि. स. २४५६, शाके १८५१, वि. स. १९८६, फाल्गुन शुक्ल ३, शुक्रवार, दि.मार्च १९३० को , तपागच्छाधिपति, सूरिचक्र, चक्रवती पू. शासनसम्राट आ. श्री नेमिसूरिजी हस्ते, सुंदर शिखरबद्ध जिनप्रासाद में प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ प्रभु की श्वेतवर्णी, २१ इंची, पद्मासनस्थ, मूलनायक जिनबिंब सह श्री संभवनाथ तथा श्री विमलनाथ प्रभु की प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न करवाई।

इसके बाद गोडवाड रत्न, प्रतिष्ठा शिरोमणि पू. आ. श्री जिनेंद्रसूरिजी के करकमलों से वीर नि. श २४८२, शाके १८७७, वि. सं. २०१२, माघ शुक्ल १०, फरवरी १९५६ सोमवार को श्री गौमुख यक्ष की प्रतिष्ठा संपन्न हुई। भमती देहरी में श्री शांतिनाथ प्रभु की प्राचीन प्रतिमा का विलेपन किया हुआ है, पर लांछन साफ नजर आता है और प्रतिमा पर लेख नहीं है। दायीं तरफ की देहरी में प्रतिष्ठित श्री नमिनाथजी की अंजनशलाका प्रतिष्ठा वीर नि. श. २४८१, शाके १८७६, वि. स. २०११, बुधवार को पन्यास श्री कल्याण विजयजी गणी के हस्ते हुई हैं। मंदिर के पीछे देहरी में आदिनाथ, पाशर्वनाथ और महावीर स्वामी त्रिगडे की प्रतिष्ठा वीर.नि. स. २५०४, शाके १८९९ , वि. सं. २०३४, वैशाख सुदि ११, दि. १८.०५.१९७८ को, संपन्न हुई है। इसमें प्राचीन पाशर्वनाथ प्रभु प्रतिमा लेख अनुसार, वि. सं. १८२६ में इसकी अंजनशलाका प्रतिष्ठा हुई है। प्रतिवर्ष ध्वजा वै. शुदि ६ को शा. मालचंदजी भैराजी पालगोता चौहान परिवार चढाते हैं।

प.पू. आ. श्री विकास चंद्रसूरिजी, श्री विशारद विजयजी, श्री चंद्रोदय विजयजी आदि ठाणा बेडा में वि.सं. २०१९ में फाल्गुन वदि ८ से अमावस तक महोत्सव करवाकर ढालोप पधारे और वीर. नि.स. २४८९, शाके १८८४, वि. स. २०१९, चैत्र मासे दि १९.०४.१९६३ से २९.४.१९६३तक, ॠषभ चैत्य में प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न करवाया। (संदर्भ -पुस्तक दो के बीच, से पृष्ठ क्र. ११९)

दीक्षा महोत्सव :

श्री शा. हस्तीमलजी की सुपुत्री सुशीला का दीक्षा महोत्सव वीर नि. स. २५१२, शाके १९०७ वि. सं. २०४२, फाल्गुन सुदि २ बुधवार दि. १२ मार्च १९८६ को ढालोप में संपन्न हुआ। सुशीला से पू. सा. श्री संयमशीलाश्रीजी बनकर पू. सा. लेहरो म.सा. की शिष्या घोषित हुई।

ढालोप: यहां पंचायत में चौहान, लोढा, राठौड और पुनमिया गोत्र के १०५ जैन परिवार (घर हौती) की कुल ६०० जनसंख्या है। ग्राम पंचायत ढालोप की कुल जनसंख्या ३००० के करीब है। गांव में राजकीय सेकेंडरी, प्रायवेट अंग्रेजी स्कूल, आयुर्वेदिक दवाखाना, प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, पशु चिकित्सा , पोस्ट ऑफिस, दूरसंचार, सिंचाई इत्यादि सारी सुविधाएं उपलब्ध है।

Dhalop Brahma Temple
Dhalop Brahma Temple

श्री प्राचीन ब्रम्हा मंदिर : ढालोप गांव राज्य के उन गिने-चुने स्थानों में से एक है. जहां ब्रह्माजी की सदियों पुराना मंदिर है। मदिर में इसी गांव के भूगर्भ से प्राप्त विशाल एवं विश्व की दुर्लभतम मूर्तियां स्थापित है। यह मंदिर पुष्कर के ब्रम्हाजी मंदिर से भी पुराना है।

कहते हैं कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी ने यहां कुछ क्षण देवताओं के साथ मंत्रणा हेतु विश्राम किया था। बाद में आकाशवाणी हुई कि गांव वालों तुम विधाता की कृपा मानना और इस भूमि पर ब्रह्मा के मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा करवाना। यह सावित्री के प्रभाव की भूमि है। स्वयं ब्रह्मपुत्र नारदजी ने मंदिर हेतु भूमि अंकित की। बाद में ८वीं शताब्दी में इस मंदिर के जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है। स्थापत्यकला से युक्त चारमुखी यह प्रतिमा अदभुत है। पूर्ण रूप से वेदशास्त्रानुकुल यह मूर्ति ५ फीट७ इंच ऊंची है। ब्रह्माजी की ओर सावित्री ओर नारदजी की प्रतिमाएं स्थापित हैं। चैत्र वदि २ को सांस्कृतिक कार्यक्रम व भाद्रपद सुदि १४ को गांव भर में प्रसाद बंटता है।

श्री संत रघुनाथ पीर : सड़क पर स्थित रघुनाथ पीर धुणी विशाल परिसर में बापा रघुनाथ पीर का समाधि स्थल लाखों लोगों के श्रद्धा का स्थान है। श्रद्धावंत पाकिस्तान तक फैले हुए हैं। रघुनाथ पीर ढालोप के निवासी व मेघवाल जाति के थे। उन्होने हरढाण पीर किसनाजी खींची से आत्मज्ञान प्राप्त किया था। वि.सं. १३८५, वैशाख सुदि १२, शनिवार को मेघवाल जाति के लोगों ने उनके समाधि स्थल पर रघुनाथ पीर आश्रम का निर्माण करवाया। यहां शिवरात्रि के दिन हजारों-लाखों की तादाद में लोग आकर रघुनाथ पीर को याद करते हैं।

मार्गदर्शन : नाडोल से १० किमी., रानी स्टेशन से २२ किमी.सादडी से २० किमी. और फालना से ३० किमी. दूर स्थित ढालोप हेतु बस, टैक्सी और ऑटो की सुविधा है।

सुविधाएं : मंदिर के पास विशाल अतिथि भवन का निर्माण हुआ है। सारी आधुनिक सुविधाओं से युक्त धर्मशाला में दो हॉल तथा ७ कमरे हैं। भोजनशाला की उत्तम व्यवस्था है।

पैढी : श्री जैन संघ देवस्थान पेढी

सादडी-नाडोल रोड, हिम्तोबा हवेली के सामने,मु. पो. ढालोप – ३०६६०३ वाया- नाडोल तह, देसूरी जिला – पाली, राजस्थान

पेढी संपर्क :

श्री लालचंद, ढालोप

ट्रस्टी श्री जेठमलजी लोढा, मुंबई ०९८६९७६७१५५,. श्रीप्रकाश जी मुंबई, ०९८२०१९९४२६, श्री अमृतजी राठौड , ढालोप ०९६४९४३१४७१