देसुरी (देवसुरी) / Desuri : देसुरी गांव का नाम ‘देवसुरी’ था, जिसका...

देसुरी (देवसुरी) / Desuri : देसुरी गांव का नाम ‘देवसुरी’ था, जिसका प्रमाण जैन पेढी पर अंकित है। ‘श्री ॠषभदेव भगवान जैन पेढी देवसुरी एवं पंचायत भवन’ नाम था। भगवान के तिगडे पर भी लेख में देवसुरी गांव अंकित है। कालक्रम में यह अपभ्रंश होकर देसुरी हो गया। वि. स. १८३० तक ठाकुर वीरमदेव सोलंकी का देसुरी पर राज्य था और यह मारवाड के अधीन था।

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अरावली पर्वत की तराई में हरियाली से भरपूर नोमा व सुखडी नदी या बडी नदी के मध्य व जोधपुर उदयपुर मेगा हाईवे क्र. १६ की मुख्य सडक पर स्थित है देसुरी अर्थात प्राचीन देवसुरी नगर। मारवाड व मेवाड को जोडने वाला ऐतिहासिक गावं ,वीरों व संतों का गांव, जोधपुर डिवीजन व पाली जिले में गोडवाड का प्रथम गांव देवसुरी इतिहास प्रसिद्ध राठौड व राणाओं का आधिपत्यवाला गांव रहा।

देसुरी गांव का नाम ‘देवसुरी’ था, जिसका प्रमाण जैन पेढी पर अंकित है। ‘श्री ॠषभदेव भगवान जैन पेढी देवसुरी एवं पंचायत भवन’ नाम था। भगवान के तिगडे पर भी लेख में देवसुरी गांव अंकित है। कालक्रम में यह अपभ्रंश होकर देसुरी हो गया। वि. स. १८३० तक ठाकुर वीरमदेव सोलंकी का देसुरी पर राज्य था और यह मारवाड के अधीन था।

वीर वंशावली में सतरवें आ. श्री वृद्ध देवसुरी हुए। आप श्री ओसिया नगर से उग्र विहार कर , वीर संवत् ५८५ में ३०० श्रावकों के साथ नाडुलाई होकर देवसूरी किनारे पर श्रावकों को बसाया। उस गांव के श्रावकों द्वारा बसा हुआ गांव देवसुरी कहलाया। आज देसुरी में ‘नोमा माता’ का मंदिर है, जो शिल्प एवं कला की दृष्टि से जैन देरासर है। इन सभी से ज्ञात होता है कि कल का देवसुरी ही आज का देसुरी है। वीर दुर्गादास राठौड का ससुराल देसुरी में था।

मास्टर छोटालालजी शर्मा के अनुसार, यहां का इतिहास देसुरी पर शासनकर्ता थे बोरणा राजपूत इन्हीं के दो भाईयों के नाम थे देवसिंह (देवा) व सुरसिंह (सूरा)। इन्हीं दोनों के नाम पर गांव का नाम पडा देवसूरी। बोरणा ठाकुरों द्वारा बसाया गया देवसूरी का मूल गांव नोमा माता मंदिर के उत्तर में स्थित था। ठाकुर साहब के दो पुत्रों के साथ चार पुत्रियां थीं। जो इतिहास के अनुसार समाधि में स्थिर होकर बाद में देवियां बन गईं। क्रमश: रेवलीबाई – रेली माता नवलीबाई – नोमा माता, जो बोराणा जैन व ठाकुरों की कुलदेवी कही जाती है, तीसरी चौथीबाई – चौधरा माता – उन्हें छत्तीस कौम वाले उनकी कसम व मानता मानते हैं, चतुर्थ शैलीबाई शेली माता, आज जहां इनका मंदिर हैं, वह जगह शैली माता के चमत्कार के रूप में प्रसिद्ध है आस-पास कहीं पानी की धारा नहीं बहती मगर मंदिर के पास १२ महीने पानी की धारा बहती रहती है।

बोरणा ठाकुरों के पश्चात देवसुरी पर मादरेसा चौहान का राज आया, जो मेवाड के महाराणाओं के मातहत थे, इसलिए उन दिनों देसुरी मेवाड का भाग बन गया। देसुरी की नाल से ही सिर्फ मेवाड़ में प्रवेश होता था। इस कारणवश बाद में महाराणा ने मदरेसा चौहान के भानजे सोलंकियों को देसुरी का राजभार दे दिया। सोलंकियों ने अपने मामा मादरेसा चौहानों की षडयंत्र द्वारा हत्या करवाके देसुरी पर अपना आधिपत्य जमाया।

सोलंकियों ने अपना महल (रावला) अलग से बनवाया, जिसमें आज देसुरी तहसील व मुन्सिफ कोर्ट है। सोलंकियां ने अपने राज्य का विस्तार उत्तर में सोमेसर व बुसी हनुमानजी मंदिर तक किया था। इन्होंने सुमेर की नाल में मुगल बादशाह औरंगजेब को परास्त किया था। सोलंकी भी मेवाड महाराणा के अधीन थे।

उस समय जोधपुर पर महाराजा जसवंसिंहजी विराजमान थे। एक समय रात के दूसरे पहर में महाराजा व महारानी किले के प्राचीर पर बैठकर बातें कर रहे थे, उस समय अरावली पर्वत पर रानीजी को एक दीपक जलता हुआ दिखा। रानी जी बोली कि ऐसा भी कोई राजा है, जिसके राज में अभी तक दीपक जल रहा है। महाराजा को यह बात सहन नहीं हुई और उन्होंने रानी को देशनिकाला दे दिया। महारानी अपनी दासियों के साथ दीपक की सीध में निकल पडी, जो कुम्भलगढ पर जल रहा था। आप कुम्भलगढ पहुँचकर महाराणा को पूरी दास्तान सुनाई। महाराणा ने इन्हें बेटी बनाकर शरण दी। दूसरी ओर जोधपुर महाराजा को जब इस बात की खबर लगी तो वे कुम्भलगढ पर आक्रमण करने निकल पडे।

देसुरी के बाहर घाणेराव के नाके पर मुकाबले की ठानी, लेकिन कुम्भलगढ ऊंचाई पर होने से जीतना असंभव सा लगा। उधर, रानी ने महाराजा को संदेश भेजा कि झाडी कटाई झाली मिले, रण कटाये राज। कुम्भलगढ रा कांगरे राजा मच्छर वे ने आव। संदेश पढकर महाराज ने महाराणा को कहलवाया कि आप मेरी झाली रानी को वापस जोधपुर भेज दें। मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। तब महाराणा का दूत संदेश लेकर आया कि आप जमाईराजा बनकर कुम्भलगढ पधारियें। मेरी पुत्रियों को सहर्ष विदा-करूंगा। महाराजा के पधारने पर शाही स्वागत हुआ। महाराणा ने दहेज के बतौर हाथी घोडे नौकर चाकर, हीरे जवाहरात व देसुरी का पूरा आंवल विभाग महाराजा को दे दिया। इस पर सीमा निर्धारण का फार्मूला इस प्रकार रहा आंवल-आंवल राणाजी, बावल-बावल राजाजी। बाद में जोधपुर महाराजा ने देसुरी को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाया, भव्य महल बनाये। जोधपुर महाराज को ‘नवकोटि’ महाराज की पदवी थी। यहां कुल चार जैन मंदिर हैं। सभी संप्रतिकालीन हैं।

श्री संभवनाथजी मंदिर : श्री ओसवाल जैन श्वे. मू. पू. संघ पेढी व श्री चंद्रपभुस्वामी मंदिर के ठीक सामने विशाल दो मंजिला शिखरबंध जिनालय में मूलनायक श्री संभवनाथ प्रभु की आकर्षक प्रतिमा प्रतिष्ठित है। द्वार पर दो विशाल हाथी खडे हैं, जिससे जिनालय की भव्यता और बढ रही है। वि. सं. १९०१ के लगभग ( जैन तीर्थ सर्वसंग्रह के अनुसार) इसमें संप्रितकालीन मूलनायक के रूप में श्री आदेश्वर भगवान, पाशर्वनाथ सह तिगडे रूप में प्रतिष्ठित थे। आ.श्री जिनेन्द्रसूरिजी की प्रेरणा से सामूल जीर्णोद्धार करवाकर वीर स. २४९६ एवं वि. स. २०२७, जेठ सुदि ६, सोमवार दि. १०-०६-१९७० को आ. श्री के हस्ते महोत्सव पूर्वक भव्य प्रतिष्ठा संपन्न हुई व मूलनायक श्री संभवनाथजी प्रतिष्ठित हुए व प्राचीन श्री आदेश्वरदादा ऊपर शिखर मंदिर में प्रतिष्ठित हुए। समय चलते गुरु भगवंतों से प्रेरणा मिली कि अधिष्ठायक देव –देवियों को विराजमान करो। श्री संघ ने सुझावों को ध्यान में रखकर श्री नाकोडा भैरवदेव, श्री मणिभद्रवीर, श्री पद्मावतीदेवी व ऊपर श्री आदेश्वर दादा के सन्मुख मरुदेवी माता की गज पर प्रतिमाओं की मंगलकारी अंजनविधि हेतु पू. आ. श्री आनंद घनसूरिजी की निश्रा में वि.स. २०५९, वैशाख सुदि ६, सोमवार दि. ०७.०५.२००३ को चारभुजा नगर भेजी गई। विधि सह अंजन हुई प्रतिमाओं को मेहमान रूप में ७ कि.मी. दूर सुमेर तीर्थ में विराजमान की गई। नूतन देवकुलिकाओं की प्रतिष्ठा वि. स. २०६१ माघ वदि ४, शनिवार दि. २९.१.२००५ को आ. श्री पद्मसूरिजी के हस्ते संपन्न हुई व एक दिन पूर्व २८.०१.२००५ को श्री ओसवाल न्याति भवन का खनन मुहूर्त भी हुआ।

श्री चंद्रप्रभस्वामी मंदिर : श्री संभवनाथजी मंदिर के ठीक सामने व श्री ओसवाल जैन संघ पेढी कार्यालय के ऊपर पहली मंजिल पर, प्राचीन शिखरबंध मंदिर में चौमुखी प्रतिमाओं Desuri 4में मूलनायक श्री चंद्रप्रभस्वामी की मनभावन प्रतिमा प्रतिष्ठित है। इसके अलावा श्री अजितनाथ, श्री शीतलनाथ व श्री आदेश्वर भगवान विराजमान हैं। जैन तीर्थ सर्वसंग्रह ग्रंथ अनुसार वि. स. १९४० के लगभग का मंदिर है। मूथा परिवार ने सं. १९८४, फा. शु. ३, शुक्रवार दि. २४ फरवरी में छत्री बिठाई का लाभ लिया। पास ही उपाश्रय भी है। जेठ वदि ६ को पुनमिया परिवार ध्वजा चढाते हैं।

श्री विमलनाथ मंदिर : देरों की वास में प्रभु शांतिनाथजी मंदिर व श्री पोरवाल जैन संघ, देसुरी पेढी के ठीक सामने जीर्णोद्धारित नूतन जिन मंदिर में श्री विमलनाथ प्रभु की सुंदर परिकर सह मनमोहक प्रतिमा विराजमान है। जैन तीर्थ सर्वसंग्रह के अनुसार, वि. स. १९५५ के लगभग, मूलनायक श्री चिंतामणि पाशर्वनाथ प्रभु की प्रतिमा इस जिनालय में विराजमान थी, जो वर्तमान में प्राचीन तिगडे सह रंगमंडप के एक देहरी में प्रतिष्ठित है। वि. स. २०११ (वीर स. २४८१) के माघ सुदि १० को आ. श्री जिनेन्द्रसूरिजी ने संपूर्ण जीर्णोद्धार करवा के नूतन मंदिर की प्रतिष्ठा की थी व मूलनायक के रूप में प्रभु श्री विमलनाथजी को विराजमान किया। स. २०६६ में दीक्षादानेश्वरी आ. श्री गुणरत्नसूरिजी की प्रेरणा पाकर श्री संघ ने जिनालय का सामूल जीर्णोद्धार करवाकर वि. स. २०६९ के वैशाख सुदि ६ गुरुवार दि. १६.०५.२०१३को भव्य महोत्सव पूर्वक अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न करवाई। इसके पूर्व में स. २०६६ जेठ वदि १ दि. २८.०५.२०१० को भूमिपूजन तथा आषाढ वदि ६, शुक्रवार, दि. २.७.२०१० को शिलान्यास संपन्न हुआ था। मंदिर के ठीक सामने पेढी व भोजनशाला व आयंबिल भवन है, जिसका वहीवाट श्री पोरवाल जैन संघ पेढी देखती है।

श्री शांतिनाथजी मंदिर : यह मंदिर करीब ९०० वर्ष प्राचीन होने के प्रमाण मिलते हैं। देरों के वास में स्थित शिखरबंध भव्य-दिव्य जिनालय में प्रभु शातिनाथ दादा की अलौकिक प्रतिमा विराजमान है। तिगडे की सभी प्रतिमाएं संप्रतिकालीन हैं। वि. स. २०१२ (वीर स. २४८२) के माघ सुदि १० को पू. आ. श्री जिनेन्द्रसूरिजी के हस्ते संपूर्ण जीर्णोद्धारित जिनालय की प्रतिष्ठा संपन्न हुई। उसके बाद वीर स. २५२८ वि. स. २०५८ वैशाख वदि ७, शुक्रवार दि. ३ मई २००२ में पुन: जीर्णोद्धार करवाकर पू. आ. श्री पद्मसूरिजी के वरद हाथों प्रतिष्ठा संपन्न हुई। जैन तीर्थ सर्वसंग्रह के अनुसार ये मंदिर पंद्रहवीं शताब्दी का माना गया है। पोरवाल पेढी वहीवट करती हैं। पोरवालों के २६० घर हैं।

शासन सम्राट श्री नेमिसूरिजी के शिष्य मु. श्री जीतविजयी का सं १९७१ में यहां स्वर्गवास हुआ था। यहां से अनेक भव्य आत्माओं ने संयम का मार्ग स्वीकारा है।

देसुरी किला : देसुरी के चारों तरफ शहरपनाह (कोट) और छोटी सी पहाडी पर मजबूत किला समुद्रतल से १५८७ फीट ऊंचा है। पहले परकोटे के चार दरवाजे थे। यह परगना पहले मादरेसा चौहान व सोलंकियों के अधिकार में रहा। बाद में उदयपुर राणाजी व उसके बाद सं. १८२६ में विजयसिंहजी को मिला। इस किले का निर्माण ११वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध माना गया। देसुरी की नाल को पगल्या नाल कहा जाता है। यह पर शैली बांध व दादीया बांध है। इस दुर्ग में घनेश्वर शिवालय दर्शनीय है।

मार्गदर्शन : देसुरी फालना रेलवे स्टेशन से ४० कि.मी., रानी से ३६, जोधपुर हवाईअड्डे से १३५ किमी., नाडोल से १७ किमी., सुमेर तीर्थ से ७ किमी. मेगा हाइवे पर स्थित है। यहां से श्री हिमाचलसूरिधाम १६ कि.मी. दूर है। देसुरी बस स्टैंड पर सरकारी व प्रायवेट तकरीबन हर रोज १२५ बसों का आवागमन होता है।

सुविधाएं : यहां के न्याति भवन में कुल ९ सादा व ९ अटैच कमरे हैं। एक हॉल है। उपाश्रय व आराधना भवन हैं। होटल व डाकबंगला है, दो बैंक है, पुलिस थाना, १२वीं तक शिक्षा व्यवस्था, हास्पिटल, दूर संचार इत्यादि सारी व्यवस्था है। कुल जनसंख्या करीबन ९००० है। श्री शांतिनाथ युवा मंडल व जिनेन्द्र युवा मंडल, यहां की दो सहयोगी संस्थाएं हैं। भोजनशाला व आयंबिल की उत्तम व्यवस्था है।

पेढी १: श्री ॠषभदेवजी की पेढी

श्री ओसवाल जैन संघ, मेन ऊपर का बाजार, मु.पो. देसुरी ३०६७०३. जिला पाली (राज.)

संपर्क ०२९३४-२५४१३६

मुनीमजी: श्री रणजीतमलसा मेहता-

पेढी -२: श्री शांतिनाथ विमलनाथ भगवान की पेढी

देहरों की वास, श्री पोरवाल जैन संघ, मु.पो. देसुरी- ३०६१०३, जिला पाली (राज.)

संपर्क – ०२९३४-२५४१०४०

मुनीमजी श्री हीरादास वैष्णव