मुंबई में जैनों का महासम्मेलन १ से १० तक जनवरी तक ‘मारुं...

मुंबई में जैनों का महासम्मेलन १ से १० तक जनवरी तक ‘मारुं भारत, सारुं भारतÓ का लोकार्पण

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मुंबई। श्रीमद विजय रत्नसुदंरसूरीश्वरजी म.सा. द्वारा लिखित ३००वीं पुस्तक ‘मारुं भारत, सारुं भारतÓ के लोकार्पण समारोह का भव्य आयोजन मुंबई स्थित सायन (पूर्व) में चूनाभट्टी, एवरार्ड नगर स्थित सोमैया अस्पताल ग्राउंड में १० जनवरी २०१६ को प्रात: ९ बजे से किया जा रहा है। जिसका विमोचन भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी करेंगे। कार्यक्रम में गृहमंत्री राजनाथ सिंह के अलावा कई राजनैतिक हस्तिया शिरकत करेगी। यह दस दिवसीय समारोह में एक जनवरी से १० जनवरी तक विविध कार्यक्रम आयोजित तपागच्छाधिपति पूज्यपाद आचार्य भगवंत विजय प्रेमसूरीश्वरजी म.सा. प्रशांतमूर्ति पूज्यपा आचार्य भगवंत श्रीमद विजय राजेन्द्रसूरीश्वरजी म.सा. और सरस्वती लब्धप्रसाद पूज्यपाद आचार्य भगवंत श्रीमद विजय रत्नसुंदरसूरीश्वरजी म.सा. की पावन निश्रा में आयोजित किया जा रहा है। समारोह के आयोजक रत्नत्रयी ट्रस्ट और निमंत्रक साहित्य सत्कार समारोह समिति है। ज्ञात हो कि श्रीमद विजय रत्नसुंदरसूरीश्वरजी म.सा. द्वारा लिखित ३००वीं पुस्तक ‘मारुं भारत, सारुं भारतÓ (मेरा भारत, महान भारत) चार भाषाओं गुजराती, हिंदी, मराठी और अंग्रेजी में रचित है। रत्नत्रयी ट्रस्ट और साहित्य सत्कार समारोह समिति के संरक्षक राजेश मुणोत (राजपुर-छत्तीसगढ़), कल्पेश वि. शाह (अहमदाबाद), कीरीटभाई शाह (सायन-मुंबई), संजय शाह (सूरत), कुमार मेहता (माटुंगा-मुंबई), प्रवीण सिसोदिया (नासिक), मनीषभाई (घाटकोपर-मुंबई) और निखिल कसुमगर (नागपुर) हैं। आज से वर्षों पूर्व श्रीमद रत्नसुंदरसूरीश्वरजी म.सा. ने एक अनोखी साहित्य सृजन की यात्रा श्रीमद विजय रत्नसुंदरसूरीश्वरजी म.सा. ने जीवन उद्योत नामक प्रथम पुस्तक से वीर संवत २०३८ में, गुजरात के पालनपुर गांव में अपने परमोपकारी, गुरुदेव श्री भुवनभानुसूरीश्वरजी के आशीर्वाद से एवं मां सरस्वती की कृपा से आरंभ की।

इस यात्रा की विशेषता यह थी कि यह यात्रा स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए थी। सभी के जीवन को आनंदमय बनाने के लिए थी। श्रीमद विजय रत्नसुंदरसूरीश्वरजी म.सा. की इस साहित्य सृजन यात्रा ने सफलताओं के एवं सिद्धियों के मुकामों को स्पर्श किया और आज भी अविरत रुप से आगे बढ़ रही है। सर्वाधिक आनंद की बात यह है कि अनेक उपलब्धियों के साथ कुछ ही समय में यह यात्रा ३००वें चरण में प्रवेश करने जा रही है। इस ऐतिहासिक क्षण को अविस्मरणीय बनाने के लिए ‘साहित्य सत्कार समारोह समितिÓ ने इस भव्यातिभव्य समारोह का आयोजन किया है। श्रीमद विजय रत्नसुंदरसूरीश्वरजी म.सा. का जन्म गुजरात के सौराष्ट्र जिले के देपला गांव में पांच जनवरी, १९४८ को हुआ था। आचार्य श्री माता चंपाबेन और पिता दलीचंदजी ने बचपन से अपने पुत्र को उत्तम संस्कारों से पल्लवित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि १९ वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपने पुत्र रजनी को पूज्य आचार्य श्री भुवन भनुसूरीश्वरजी के मार्गदर्शन में सुपुर्द किया और इसके बाद में मुनि रत्नसुंदरविजय के नाम से विख्यात हो गए।