शांति, मैत्री और बंधुत्व पर आधारित व्यवस्था की स्थापना के लिए अहिंसा...

शांति, मैत्री और बंधुत्व पर आधारित व्यवस्था की स्थापना के लिए अहिंसा एकमात्र रास्ता है

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भगवान महावीर जब धरती पर अवतारित हुए थे तो भारतीय समाज में अनेक तरह की कुरीतियों के कारण लोगों का जीवन दुष्कर हो गया था। छुआछुत, ऊँच-नीच धनी और निर्धन के भेदभाव के कारण समाज में असमानता व्याप्त थी। महावीर स्वामी समाज के निम्न निर्धन लोगों की पीड़ा से दु:खी हुए।   उन्होंने स्वयं राज पाट त्यागा और सन्यास लेकर तप करने निकल पड़े। कई वर्षों के कठिन तपस्या मय जीवन बिताने के बाद जो ज्ञान प्राप्त किया। वह व्यावहारिक व समाज को बदलने वाला था। महावीर ने समाज के दोषों का विवेचन किया और व्यावहारिक तथा सरल निष्कर्ष निकाले। महावीर स्वामी के ये शिक्षा संदेश आज की पीडि़त मानवता के लिए मार्ग दर्शन बन गये। अति तुच्छ भोग-विलास व सुख सुविधाओं को त्यागकर उन्होंने सरल, सादा व कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा दी।   आज से ढ़ाई हजार से भी अधिक वर्ष पूर्व जैन परम्परा के चौबीसवें और अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर ने एक नये विश्व एवं एक नये समाज के निर्माण हेतु तीन महत्वपूर्ण सूत्रों का प्रतिपादन किया था- अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्तवाद। अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, सामाजिक, राजनीतिक एवं वैयक्तिक स्तर पर अनेक असमानताएं मौजूद हैं, जैसे साम्राज्यवादी गुलामी, अमीर-गरीब का भेंद, जातिगत या नस्लगत उंच-नीच, तानाशाही, नर-नारी की असमानता, मानवाधिकारों का हनन आदि। इन गैर बराबरियों के विरूद्ध अनादि काल से संघर्ष चलता आ रहा है। कभी हिंसा के रास्ते से और कभी अहिंसा के रास्ते से।

हिंसा का रास्ता कभी कभी त्वरित सफलता देने वाला पाया गया है। परन्तु वह स्थायी और समाधानकारी परिवर्तन का मार्ग कभी नहीं रहा। स्थानीय और सुखद परिवर्तन के लिए तो हिंसा वालों को भी अंतत: अहिंसा का मार्ग ही अपनना पड़ता है। महावीर ने ‘जीवÓ की अवधारणा को जितना व्यापक विस्तार दिया, उतना किसी भी अन्य धर्म में दिखाई नहीं देता। इस अवधारणा में पेड़-पोधों को भी समाहित कर लिया गया। महावीर का मानव जाति को सबसे बड़ा योगदान उनका वह दर्शन है, जिसमें हर ‘जीवÓ की सुरक्षा की व्यवस्था है यही उनका अहिंसा का दर्शन हैं और पर्यावरण का सुदृढ़ सुरक्षा कवच भी। मनुष्य के हित में प्रकृति को बचाने की बात सभी करते है पर महावीर ने प्रत्येक जीव को बचाने की बात सोची। वस्तुत: हर जीव को बचाने का रूप देकर महावीर ने धरती को व उसके पर्यावरण को बचाने का दर्शन दिया है। सच तो यह है कि जब तक समाज में हर जीव को बचाने की जागृति पैदा नहीं होगी जंगलों को बचा पाना दुष्कर होगा। छले दिनों दुनिया भर में जो वैचारिक खुलापन आया है और उससे विश्व शांति की संभावना में जो स्वागत योग्य वृद्धि हुई है, वह अनेकातंवाद की महत्ता को रेखांकित करती है। महावीर का दिव्यदर्शित्व इसमें है कि उनके ये सिद्धान्त उनके काल की तुलना में आज विश्व और मानव समाज की परिस्थितियों में अधिक ही प्रासंगिक हो उठे हैं। यदि हम न्याय शांति, मैत्री और बंधुत्व पर आधारित नया मानवतावादी समाज और नयी विश्व व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं तो हमें तीर्थंकर महावीर द्वारा प्रतिपादित अहिंसा , अपरिग्रह और अनेकांत के सिद्धान्तों को उनका आधार बनाना ही होगा। परमात्मा परिग्रह नहीं करता। वह अपनी आवश्यक वस्तु रोज की रोज पैदा करता है। अत: यदि हमारा उस पर विश्वास है, तो हमें समझना चाहिए कि वह हमें आवश्यक चीजें रोज की रोज देता है, देगा। रोज के काम भर का रोज पैदा करने के ईश्वरीय नियमों को हम नहीं जानते अथवा जानते हुए भी पालते नहीं है। अत: जगत में विषमता और उससे होने वाले दु:ख भोगते हैं। यदि सब लोग अपनी आवश्यकता भर को ही संग्रह करें तो किसी को तंगी न हो और सबको संतोष रहे। यदि महावीर की इस शिक्षा का शतांश में भी पालन हो तो देश मिलावट, चोरबाजारी, मुनाफाखोरी, तस्करी, महंगाई, शोषण और आर्थिक गैर बराबरी के मारक नागपाश से मुक्त हो कर राहत की सांस ले सकेगा और इनके कारण जो लूट खसोट, झगडे हत्या और हिंसक संघर्षों का झमेला निरन्तर चलता रहता है, वह भी समाप्त हो जायेगा।