नाड़ोल / Nadol

नाड़ोल / Nadol

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नाडोल का महत्व गोड़वाड़ की पंचतीर्थी का एक तीर्थ होने का साथ ही, यह चौहान वंश के राजाओं का पाटनगर और भंडारियों व कोठारियों का मूल स्थान होने के कारण भी इस नगर को महत्वपूर्ण माना गया है। नाडोल कितना प्राचीन है, यह बात आज भी रहस्य बनी हुई है। प्राचीन ग्रथों एवं शिलालेखों के अनुसार इसके नाम अनेक मिलते हैं जिसमे नडुल, नर्दुलपुर, नन्दपुर आदि मुख्य है। इतिहासकारों को नाड़ोल का इतिहास दसवीं शताब्दी से अधिक पुराना प्राप्त नहीं हो रहा है लेकिन जैन ग्रंथों ने नाडोल को अतिप्राचीन बनाया है। वि.सं. ३०० के पहिले श्री देवसूरि के शिष्य श्री मानदेवसूरी ने नाड़ोल में चातुर्मास किया था जिसमें शाकंभरी में महामारी के उपद्रव को शान्त करने के लिए यहां ‘‘लघु शान्ति स्तवन’’ की रचना कर महामारी को शान्त किया था। इस संबध में कुछ प्राचीन पुस्तकों में शाकंभरी के स्थापन पर तक्षिला का उल्लेख भी मिलता है। नाड़ोल में ही वादिवेताल शांतिसूरिने मुनिचन्द्रसूरि को न्यायशास्त्र का अभ्यास कराया था। ११ वीं शताब्दी में गुर्जर नरेश भीमदेव के समय नाडोल नगर गुजरात के अधीन भी रहने के प्रमाण मिलते हैं। कहते हैं कि नाड़ोल के राजाओं ने चन्द्रावति के मंत्री विमलशाह को सोने का सिंहासन भेंट किया था इसलिए यह स्पष्ट है कि नाडोल में प्राचीनकाल से ही जैनों की घनी बस्ती रही है और यहां के प्राचीन जैन मंदिर इसके साक्षी है। वि.सं. ७०० में श्रीरविप्रभसूरिजीने नेमीनाथ भगवान के मंदिर में प्रतिष्ठा करवाई थी।

नाडोल की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक वैभव की धरोहर: नाडोल के मुख्य मंदिर, बावड़ियां, तालाब, प्राचीनतम अवशेष, गढ़, ऐतिहासिक तथ्य, पुरातत्व एवं सांस्कृतिक वैभव की धरोहर है। प्रसिध्द इतिहासकार कर्नल टॉड ने यहां की बावड़ियों की प्रशंसा में खूब लिखा है। राणीबाव: राव लाखण की पटरानी, जो गढ़पाटन की राजकुमारी थी, उसने अपनी स्मृति में इस बाव का निर्माण करवाया था। यह अष्टकार वास्तुकला के आधार पर निर्मित है7 107 3 43 फीट लंबी-चौड़ी व 70 फीट गहरी यह बाव तीन खंडो, गोखरों, बुर्ज, सीढ़ियों, पगोतियों, बैठक थम्बों पर सुंदर कारीगरी का अद्भुत नमूना है। नारलाई सड़क पर यह सुंदर बाव सहस्त्र वर्षों से अपनी पहचान रखती है। बस स्टैण्ड के उत्तर में कथवारीबाव, पूर्व दिशा में महादेव मंदिर के पास धुआंबाव, जूनाखेड़ा के उत्तर दिशा की ओर, चौकोर पत्थरों के अतुलनीय शिलाखंड से निर्मित मूंगबाव, जूनाखेड़ा से दक्षिण की ओर चारकोनों युक्त लम्बे खड़े प्रस्तर से निर्मित देवकीबाव, रखेश्वर तालाब के पास कमोदनीबाव, तीन मंजिल अनगढ़ पत्थरों का नमूना कारीगरी शोभाबाव, प्राचीन जर्जर शिवमंदिर के पास खोखरीबाव, परमारवंशीय कुंड पत्थरों से निर्मित रखेश्वरकुंड, खारडा रोड पर स्थित सुखबाईबाव, जैन मंदिर के पास सुंदर बनवट की जैन अम्बाबाव, बगीचे के पास स्थित वारीबाव, वि. सं. 1039 में निर्मित, 60 गहरी सीढ़िया, सोनाणा पत्थर की निर्मित आशापुरा लाखणबाव यहा की ऐतिहासिक धरोहर है। गोलेराव तालाब: 200 बीघा जमीन में फैला हुआ, नाडोल का प्राचीन तालाब, पालपर अनेक चबूतरे, छत्रियां, 17वीं शताब्दी के स्मारक, सती के धडे आदि स्वच्छ पानी का तालाब 800 वर्ष प्राचीन है। मुदिर: रिखेश्वर महादेव मंदिर अति प्राचीन है। यहीं पर सम्राट पृथ्वीराज के पिता की मृत्यु हुई थी। सोमनाथ मंदिर 108 फीट ऊंचा है। पातालेश्वर महादेव भारमली नदी के तट पर है, भगवान विष्णु का स्थल मंदिर, गंगालहर मंदिर, सूर्य मंदिर, अंसीबाई की समाधि, गोगामढ़ी, नागो का मंदिर आदि इन्द्रमाल व कागलाव टेकरी 8वीं से 10वीं शताब्दी की है।

nadol_ashapura_matajiश्री आशा माताजी: नाडोल गांव से करीब डेढ़ कि. मी. दूर, श्री आशापुरा माताजी के मंदिर का निर्माण, राजेश्वर महाराज श्री लाखणसी चौहान द्वारा करवाकर, संवत् 1009 के माह सुदि 2 को प्रतिष्ठा करवाई गई। अनेक गोत्र परिवारों की कुलदेवी होने से यहां दर्शनार्थ हमेशा भीड़ रहती हैं।

मार्गदर्शन: नाडोल तीर्थ रानी स्टेशन से 18 कि.मी. वरकाणा से 12 कि.मी. नारलाई तीर्थ से 10 कि.मी. और जोधपुर हवाई अड्डे से करीब 140 कि.मी. दूर स्थित है। मेगा हाईवे पर स्थित होने से, लगातार रोडवेज की बसें मिलती हैं। प्रायवेट बस, टैक्सी व ऑटो की सुंदर व्यवस्था है। आवागमन के सारे साधन यहां से उपलब्ध हैं। सुविधाएं: भोजनशाला के ऊपर छोटी धर्मशाला, मंदिर के पास बड़ी धर्मशाल ामें रहने की सुविधा है। बस स्टैंड के पास रुपमुनि धर्मशाला में 10 कमरे विशाल हाल आदि अच्छी व्यवस्था है। आशापुरी माता मंदिर (2 कि.मी. दूर) ट्रस्ट की बड़ी धर्मशाला है। भोजनशाला की उत्तम व्यवस्था है।

पेढ़ी: श्री जैन श्वेताम्बर देवस्थान पेढ़ी
मु.पो. नाडोल – 306603, मेन बाजार, सूरजपोल के पास, तह.-देसुरी, जिला – पाली, राजस्थान