पर्युषण पर्व मुक्ति का रास्ता दिखाता है

पर्युषण पर्व मुक्ति का रास्ता दिखाता है

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क्षमा का चिंतन व्यक्ति ही श्रेष्ठता की स्वस्थ पहचान है। लोक व्यवहार में द्वेष की आग सुलगती है, विरोधी प्रतिरोध कम होते हैं वहां हिंसा की अनिवार्यता खत्म होती है। व्यक्ति क्षमा के भावों में आ पाए यही इस पर्व की महत्ता है। पर्व पर्युषण मुक्ति पंथी की ओर बढऩे का आदर्श त्यौहार है। यह प्रतिवर्ष अध्यात्म की साधना में आये अवरोधों को दूर हटाना है। मनुष्य में पवित्रता का भाव जगता है जो आत्म पतन से रोकता है। इसे केवल परम्परा तक ही सीमित न रखें। जैन धर्म की महत्ता पर्युषण से व्यक्त होती है। यह अध्यात्म साधन का तत्व है। आठ दिन के महोत्सव में तप त्याग की आराधना होती है। यह चातुर्मास का वास्तविक समापन होता है। जब आधे से अधिक लोग धर्म से गृहस्थी की ओर लौट आते हैं, पर्युषण एक परम्परा का निर्वहन करता है। संवत्सरी उसकी अंतिम कड़ी है। क्षमा वीरस्य भूषणम् का आदर्श चरित्र उस दिन व्यवहार में आते हैं।

जगत के समस्त प्राणियों से क्षमायाचना की जाती है। क्षमा का भाव वास्तव में क्या है? क्षमा की दृष्टि क्या है? समस्त जीवन जगत से क्षमा का तात्पर्य क्या है? ये ऐसे प्रश्न है जिसमें संवत्सरी पर्व की महानता को समझने की सुविधा होती है। यदि इन प्रश्नों के उत्तर सही खोज पाये तो क्षमा की समझ विकसित होती है। क्षमा का भाव व्यक्ति को सरल बना देता है। वह कोई भूल न करे लेकिन हो जाए तो उसे सुधारने की इच्छा ही न करें, बल्कि उसके होने का भी पश्चाताप करें ऐसा जो हो गया, उससे व्यक्ति की हानि हुई, उसे एहसास कराएं कि जाने-अनजाने में ऐसा हो गया। जानते हुए कोई भूल हो गई उसे सुधारेंगे। यह मनुष्य के श्रेष्ट होने की पहचान है, संभावना है। क्रोध प्रमाद या आवेश पर नियंत्रण न होने से जो कुछ होता है, उसे अनभिज्ञता नहीं कहा जा सकता।  व्यक्ति अपने आत्मभाव में जब आ जाये, तब यह समझना आसान होता है कि जानते हुए वह सब कुछ हो गया जो कि नहीं होना चाहिए था। किए हुए कर्मों और कहे हुए शब्दों को वापस लौटाना आसान नहीं होता, लेकिन क्षमा ही दृष्टि उस सम्भावनाओं को तलाशती है। यह जख्म भरने की शुरुआत है। एक व्यक्ति को बोले गये बोल, क्षमा मांगने से सांत्वना का रुप ले लेती है। पीडा की परिधि में न्युनता आती है। क्षमा का चिंतन सर्व व्यापी है, जिन आत्माओं से कभी संवाद नहीं हुआ उनसे भी अपराध की संभावना मानी गई है और अनजाने में उनकी गणना होती है। यह समुहगत होती है, एक जाति विशेष के लोग, एक धर्म और पंथ विशेष के लोग अनुयायी आति आग्रही हो, अन्य जाति, पंथ एवं धर्म की आलोचना करते हैं। वह भावना चाहे अनजाने में ही प्रकट हो गई हो, लेकिन कही तो हुई है। उसे समझकर परिभार्जन की संभावना तो तभी यह स्थिति सहज ही नहीं आ जाती है। अत: समस्त जीव जगत से मांगी गयी क्षमा आत्मा की संभाव में आती है। मन का बोझ घट जाता है, वह भावनाओं में क्षुब्ध हो जाता है। इसके साथ ही आत्मा की ॠजुत एवं सौम्यता बनी रहती है। क्षमा का मैत्रीभाव से अमिट अपनत्व का रिश्ता है। समस्त जीवों के लिए मित्रता रखना, उसके मंगल की कामना करना ही मैत्री भाव है। यह समस्त जगत से जुडने की संभावना चाहे लेकिन उसके अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए आग्रह को करना ही है।