खुद से निकटता है पर्युषण पर्व

खुद से निकटता है पर्युषण पर्व

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श्रमण संस्कृति में पर्युषण पर्व को खास महत्व दिया गया है। जहां शेष समस्त पर्व-त्योहारों के पीछे लौकिक कारणों की प्रमुखता है, वहीं पर्युषण पर्व के मूल में आत्म-कल्याण का लक्ष्य छिपा है। यह पर्व भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी से भाद्रपद शुक्ल पंचमी तक चलता है। इस पर्व में साधकों की दृष्टि बाहर से मुडक़र आत्मा पर केंद्रित हो जाती है। वर्ष भर में लगे दोषों को देखकर, समझकर प्रायश्चित व तप के द्वारा आत्मा से दूर किया जाता है। यह पर्व आठ दिनों तक प्रक्षालन किया जाता है। आठ ही दंभ (अहंकार) हैं। आठों दंभों के मैल को दूर करने का प्रावधान है।

पर्युषण शब्द बना है वस् धातु के साथ परि उपसर्ग के मेल से। परि का अर्थ है निकट और वस् का अर्थ है रहना। मनुष्य परिवार के साथ रहता है, परंतु वह स्वयं के साथ नहीं रहता है। आध्यात्मिकों की दृष्टि में मनुष्य की यही त्रासदी है। त्याग, तपस्या, साधना, क्षमा, मैत्री, आत्मअवलोकन, दान और संयम के द्वारा पर्युषण के दिनों में श्रावक स्वयं के निकट जाने का प्रयास करते है। जिन संस्कृति में पर्युषण पर्व भी अनादि से चला आ रहा है। जैसे पक्षी दो पंखों की सहायता से अनंत आकाश में सूखपूर्वक विचरण करता है, वैसे ही गृहस्थ जीवन में भी धन और धर्म रूपी दो पंखों की आवश्यकता है। इन दो पंखों में से किसी एक के अभाव में मनुष्य सुखी जीवन नहीं जी पाता है। पर्युषण पर्व इन दोनों पक्षों में संतुलन बनाकर आत्म कल्याण की राह पर चलने का संदेश देता है। पर्युषण आवश्यक क्यों? दुख मनुष्य को अनादिकाल से अप्रिय रहा है। अप्रिय कैसे छूटे,इसके लिये वह सदैव चिंतनशील व प्रयत्नशील रहा है। वैज्ञानिक अविष्कारों की नीत नूतन खोजें उसी अप्रिय से छूटने के प्रयास है। विज्ञान स्थूल जगत को लक्ष्य बनाकर चलता है और स्थूल जगत से जन्मी सुविधाएं स्थूल देह को ही सुविधायें दे सकती है। अध्यात्म दुख के मूल उद्भाव को नष्ट करता है और पर्युषण उसी अध्यात्म जगत की प्रयोगशाला है। पर्युषण का सीधा संबंध मनुष्य के सभ्य संस्कारों पर टिका है। अहिंसा और करूणा इसके मूल में निहित है। शास्त्रों में साधकों के लिये इन दिनों ऐसी जीवनशैली अपनाने का निर्देश दिया है, जो मनुष्य ही नहीं, प्राणीमात्र के अनुकूल हो, उन्हें अभय देने वाली हो।