मनस् – क्रांति का प्रतीक: पर्युषण पर्व – आचार्य विमलसागरसूरिजी म.सा.

मनस् – क्रांति का प्रतीक: पर्युषण पर्व – आचार्य विमलसागरसूरिजी म.सा.

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पर्युषण जैन श्रमण संस्कृति का आध्यात्मिक पर्व है। यह श्वेताम्बर परंपरा में आठ दिन और दिगम्बर परंपरा में दस दिन तक मनाया जाता है। वैसे, लौकिक पर्व-त्यौहार अच्छे खान-पान, परिधान, नाच-गान और मौज-शोक आदि से संपन्न होते हैं, किंतु पर्युषण पर्व में यह सब नहीं होता। पर्युषण का तात्पर्य है: परपदार्थों से हटना और आत्मभाव में बसना। अंत:करण की मलिनता को दूर करने का पुरुषार्थ ही पर्युषण की लाक्षणिकता है। दृश्यमान जगत् से पर्युषण का विशेष संबंध नहीं है। इसकी सारी महत्ता अंतर्जगत् से है। यह पर्व युग परिवर्तनकारी घटना का संसूचक है। ह्रास पर विकास की, हिंसा पर अहिंसा की और पशुता पर मानवता की विजय का यह पावन प्रतीक है। ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में पर्युषण युगों की अधार्मिक चर्या के बाद धर्म-चेतना के जागरण का संदेश देता है।

वर्षाकाल में नाना प्रकार के जीव-जंतु व कीटाणु उत्पन्न होते हैं, अत: इस दौरान् हिंसा की सर्वाधिक संभावना रहती है। इसीलिए अहिंसक समाज-रचना में आस्था रखते लोग वर्षाकाल में सांसारिक भोग-विलासों और पापजन्य प्रवृत्तियों से यथा संभव निवृत होकर अधिक से अधिक धार्मिक – आध्यात्मिक गतिविधियों से जुड़ते हैं। साधु-सन्यासी भी वर्षाकाल में जुड़ते हैं। साधु-सन्यासी भी वर्षाकाल में यात्राएं बंद कर एक स्थान पर निवास करते हैं। अहिंसा ही इन सबकी पृष्ठभूमि है। विचारणीय है कि हिंसा का संबंध किसी को मारने से नहीं, हमारे विचारों से है, बाह्य जगत् में परिलक्षित होती हिंसा तो आदमी के अन्तर्जगत् में उत्पन्न होते और घूमते विचारों की अभिव्यक्ति मात्र है। गहरे अर्थ में प्रलय और सृष्टि, विकास और ह्रास व सुख और दु:ख – सब अपने भीतर होते हैं। दृश्यजगत् में आकार लेती घटनाएं तो केवल उनकी भौतिक निष्पत्तियां ही हैं, जो कि स्थूल परिणामों के अतिरिक्त अधिक कुछ नहीं है। अंतर्जगत् का परिवर्तन ही वास्तविक क्रांति है। भौतिक कलेवर तो अंतर्मन के बदलते ही अपने आप बदल जाएगा। जीवन की महत्ता आंतरिक संयम और अनुशासन से है। पर्युषण पर्व इसी मनस् – क्रांति का प्र्रतीक है। सारे तथाकथित संबंधों से टूटकर मनुष्य का अपने समीप आना, समग्र अस्तित्व और प्रकृति के समीप आना और इस परम समीपता में सतत निवास करना पर्युषण की सार्थकता है। अहिंसा इस पर्व का भावना पक्ष है और संयम इसका क्रिया पक्ष, किंतु अपने आप में यह पर्व निष्पक्ष है। आज विश्व, देश और समाज – सभी हिंसा से पराजित हैं। निरंतर बढ़ती हिंसा ने जनजीवन का संत्रस्त कर रखा है। माना कि हिंसा की रोकथाम के लिए नये कानून बनाए जा सकते हैं। उनको तोडऩे वाले के लिए कठोर दंड की व्यवस्था निर्धारित की जा सकती है। पुलिस या सेना को तैनात किया जा सकता है। आम आदमी को आत्म-सुरक्षा के साधन मुहैया कराए जा सकते है, किन्तु इससे अधिक कुछ भी किया नहीं जा सकता। वस्तुत: ये सभी उपाय शासन के ही प्रतिफल हैं और शासन परतंत्रता का ही एक रुप है। संपूर्ण स्वतंत्रता तो अनुशासन और संयमी जीवन मं निहित है। जब तक आदमी का भीतरी मन अहिंसक नहीं बन जाता, बाहरी हिंसा जारी ही रहेगी।

हम बाह्य परिवेश को तो बदल रहे हैं, पर अंातरिक व्यवस्था को बदलने का आंशिक प्रयत्न भी नहीं हो रहा। सारी समस्याएं अंतर्मन की है, अत: क्रांति का उद्भव अन्तर् में होना परम आवश्यक है। हृदय परिवर्तन ही इन समस्याओं के स्थायी समाधान का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। हम समाज-क्रांति और राष्ट्र-क्रांति की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, किंतु स्वयं आदमी को, जो कि समाज व राष्ट्र के अस्तित्व का अभिन्न और अपरिहार्य अंग हैं, अगर क्रांत न कर पाए तो अन्य सब कुछ कर देने से भी क्या फर्क पड़ेगा? आज जरुरत है मनस्-क्रांति के द्योतक पर्युषण पर्व की अंतश्चेतना को पकडक़र अपने जीवन में साकार करने की। ह$कीकत में तभी हमारे द्वारा मनाए जाने वाले इस पर्व की महत्ता लोकजीवन में सार्थक बन सकेगी।